भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 680 में से

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पृष्ठ 403

तृतीय उद्योतः ३४३ ध्वन्यालोकः अभ्युपगते वा वाक्यव्यङ्ग्यत्वे रसादीनां न नियता काचित्स- ङ्घटना तेषामाश्रयत्वं प्रतिपद्यत इत्यनियतसङ्घटनाः शब्दा एव गुणानां या रस आदि को वाक्यव्यङ्ग्य मान लेने पर कोई नियत सङ्घटना उनका ( गुणों का ) आश्रय नहीं होती है, इसलिए जिनकी सङ्घटना नियत नहीं है ऐसे लोचनम् वर्णव्यङ्ग्यो हि यावद्रस उक्तस्तावदवाचकस्यापि पदस्य श्रवणमात्रावसेयेन स्वसौभाग्येन वर्णवदेव यद्रसाभिव्यक्तिहेतुत्वं स्फुटमेव लभ्यत इति तदेव माधुर्यादीति किं सङ्घटनया ? तथा च पद्व्यङ्ग्यो यावद्ध्वनिरुक्तस्तावच्छुद्ध- स्यापि पदस्य स्वार्थस्मारकत्वेनापि रसाभिव्यक्तियोग्यार्थावभासकत्वमेव माधुर्यादीति तत्रापि कः सङ्घटनाया उपयोगः । ननु वाक्यव्यङ्ग्ये ध्वनौ तर्ह्यवश्यमनुप्रवेष्टव्यं सङ्घटनया स्वसौन्दर्यं वाच्य- सौन्दर्यं वा, तया विना कुत इत्याशङ्क्याह—अभ्युपगत इति । वाशब्दोऽपि- शब्दार्थे, वाक्यव्यङ्ग्यत्वेऽपीत्यत्र योज्यः । एतदुक्तं भवति-अनुप्रविशतु तत्र सङ्घटना, न हि तस्याः सन्निधानं प्रत्याचक्ष्महे । किं तु माधुर्यस्य न नियता सङ्घटना आश्रयो वा स्वरूपं वा तया विना वर्णपदव्यङ्ग्ये रसादौ भावान्मा- धुर्यादेः वाक्यव्यङ्ग्येऽपि तादृशीं सङ्घटनां विहायापि वाक्यस्य तद्रसव्यञ्ज- कत्वात् सङ्घटना सन्निहितापि रसव्यक्तावप्रयोजिकेति । तस्मादौपचारिकत्वेऽपि शब्दाश्रया एव गुणा इत्युपसंहरति-शब्दा एवेति । वर्ण से व्यङ्ग्य भी कहा जा चुका है तब तो अवाचक भी पद का श्रवणमात्र से निर्धारणीय अपने सौभाग्य के कारण वर्ण की ही भांति जो रसाभिव्यक्ति का हेतुत्व स्पष्ट ही प्राप्त ( प्रतीत ) होता है, वही माधुर्य आदि है, सङ्घटना से क्या ? जैसा कि जब कि ध्वनि पदव्यङ्ग्य भी कहा गया है तब शुद्ध भी पद का स्वार्थ के स्मारक होने के कारण भी रसाभिव्यक्ति के योग्य अर्थ का अवभासकत्व ही माधुर्य आदि है, वहां भी सङ्घटना का कौन उपयोग है ? यह आशङ्का करके कि वाक्यव्यङ्ग्य ध्वनि में अवश्य ही सङ्घटना को अनुप्रवेश करना चाहिए, उसके बिना अपना ( वाक्य का ) सौन्दर्य अथवा वाच्य का सौन्दर्य कैसे होगा ?, कहते हैं—या रस आदि को—। 'या' शब्द 'भी' ('अपि') शब्द के अर्थ में है, यहां लगाना चाहिए 'वाक्यव्यङ्ग्य होने पर भी' । बात यह कही गई—वहां संघ- टना प्रवेश करे, हम उसके सन्निधान का प्रत्याख्यान नहीं करते । किन्तु नियत संघटना माधुर्य का आश्रय अथवा स्वरूप नहीं है, क्योंकि उस सङ्घटना के बिना भी वर्णपद- व्यङ्ग्य रसादि में ( माधुर्य ) रहता है । माधुर्यादि के वाक्यव्यङ्ग्य में उस प्रकार की सङ्घटना को छोड़कर भी वाक्य उस रस का व्यञ्जक होता है, सङ्घटना सन्निहित होकर भी रस की व्यञ्जना में प्रयोजक नहीं है । इस कारण औपचारिक होने पर भी गुण शब्द के आश्रित ही हैं, इस प्रकार उपसंहार करते हैं—शब्द ही ।