ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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३४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
व्यङ्ग्यविशेषानुगता आश्रयाः । ननु माधुर्ये यदि नामैवमुच्यते तदुच्य-
ताम् ; ओजसः पुनः कथमियतसङ्घटनशब्दाश्रयत्वम् । न ह्यसमासा
सङ्घटना कदाचिदोजस आश्रयतां प्रतिपद्यते । उच्यते—यदि न प्रसि-
द्विमात्रग्रहदूषितं चेतस्तदत्रापि न न ब्रूमः । ओजसः कथमसमासा
सङ्घटना नाश्रयः । यतो रौद्रादीन् हि प्रकाशयतः काव्यस्य दीप्तिरो-
ज इति प्राक्प्रतिपादितम् । तच्चौजो यद्यसमासायामपि सङ्घटनायां स्या-
त्को दोषो भवेत् । न चाचारुत्वं सहृदयहृदयसंवेद्यमस्ति । तस्मादनि-
यतसङ्घटनशब्दाश्रयत्वे गुणानां न काचित्क्षतिः । तेषां तु चक्षुरादी-
शब्द ही व्यङ्ग्यविशेष से अनुगत होकर गुणों के आश्रय हैं । ( शंका ) यदि माधुर्य
के विषय में इस प्रकार कहते हैं तो कह सकते हैं; परन्तु ओजस् का नियत सङ्घटना
से रहित शब्दों का आश्रयत्व कैसे बन सकता है ? क्योंकि असमासा सङ्घटना कभी
ओजस् का आश्रय नहीं बन सकती । ( उत्तर ) कहते हैं—यदि प्रसिद्धिमात्र के प्रति
आग्रह से मन दूषित नहीं है तो हम यहाँ भी नहीं नहीं कहतें । असमासा सङ्घटना
ओजस् की आश्रय कैसे नहीं ? क्योंकि रौद्र आदि को प्रकाशित करते हुए काव्य
की दीप्ति 'ओजस्' है, यह पहले प्रतिपादन कर चुके हैं । और वह ओजस् यदि
असमासा सङ्घटना में भी हो तो क्या दोष होगा । सहृदय द्वारा संवेद्य कोई अचारुत्व
भी तो नहीं । इस कारण गुणों के नियत सङ्घटना से रहित शब्दों के आश्रय होने से
लोचनम्
नन्विति । वाक्यव्यङ्ग्यध्वन्यभिप्रायेणेदं मन्तव्यमिति केचित् ।
वयं तु ब्रूमः-वर्णपदव्यङ्ग्येऽप्योजसि रौद्रादिस्वभावे वर्णपदानामेकाकिनां
स्वसौन्दर्यमपि न तादृगुन्मीलति यावद्यावत्तानि सङ्घटनाङ्कितानि न कृतानी-
ति सामान्येनैवायं पूर्वपक्ष इति । प्रकाशयत इति 'लक्षणहेत्वोः' इति शतृप्रत्ययः ।
रौद्रादिप्रकाशनाल्लक्ष्यमाणमोज इति भावः । नचेति । चशब्दो हेतौ । यस्मात्
‘यो यः शस्त्रम्’ इत्यादौ नाचारुत्वं प्रतिभाति तस्मादित्यर्थः । तेषान्विति गुणा-
शङ्का—कुछ लोगों के अनुसार वाक्यव्यङ्ग्य ध्वनि के अभिप्राय से यह मानना
चाहिए । परन्तु हम कहते हैं—रौद्रादिस्वभाव ओजस् के वर्णपदव्यङ्ग्य होने पर भी
अकेले वर्णपदों का अपना सौन्दर्य भी तबतक उस प्रकार नहीं उन्मीलित होता जबतक
वे ( वर्णपद ) सङ्घटना से अङ्कित नहीं किए जाते हैं, यह सामान्यरूप से पूर्वपक्ष है ।
'प्रकाशयतः' ( प्रकाशित करते हुए ) 'लक्षणहेत्वोः' ( पा. सू. ३. २. १२६ ) इस सूत्र से
शतृप्रत्यय है । भाव यह कि, रौद्र आदि के प्रकाशन से सम्यक् लक्षित होता हुआ ओजस् ।
और गुण—। 'और' ( च ) शब्द हेतु अर्थ में । अर्थात् जिस कारण 'यो यः शस्त्रम्'