ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३४५ ध्वन्यालोकः नामिव यथास्वं विषयनियमितस्य स्वरूपस्य न कदाचिद्व्यभिचारः। तस्मादन्ये गुणा अन्या च सङ्घटना। न च सङ्घटनामाश्रिता गुणा इत्येकं दर्शनम्। अथवा सङ्घटनारूपा एव गुणाः। यतूक्तम्—'सङ्घटनावद्गुणानामप्यनियतविषयत्वं प्राप्नोति। लक्ष्ये व्यभिचारदर्शनात्' इति। तत्राप्येतदुच्यते-यत्र लक्ष्ये परिकल्पित- विषयव्यभिचारस्तद्विरूपमेवास्तु। कथमचारुत्वं तादृशे विषये सहृदयानां नावभातीति चेत् ? कविशक्तितिरोहितत्वात्। द्विविधो हि दोषः- कवेरव्युत्पत्तिकृतोऽशक्तिकृतश्च। तत्राव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्तितिर- स्कृतत्वात् कदाचिन्न लक्ष्यते। यस्त्वशक्तिकृतो दोषः स झटिति प्रतीयते। परिकरश्लोकश्चात्र— कोई क्षति नहीं। परन्तु उन (गुणों) का चक्षु आदि की भाँति, अपने-अपने विषय- नियमित स्वरूप का कभी व्यभिचार नहीं है। इस कारण गुण अन्य हैं और सङ्घटना अन्य है। और, गुण सङ्घटना के आश्रित नहीं है यह एक दर्शन (सिद्धान्त) है। अथवा सङ्घटना रूप ही गुण हैं। जो कि कहा है—'सङ्घटना की भांति गुणों का भी अनियत-विषयत्व प्राप्त होगा, क्योंकि लक्ष्य में व्यभिचार देखा जाता है। वहाँ भी यह कहते हैं—'जिस लक्ष्य में परिकल्पित विषय (के नियम) का व्यभिचार है, वह विरूप ही (दूषित ही) होगा। यदि यह कहो कि उस प्रकार के विषय में सहृदयों को अचारुत्व कैसे नहीं होता तो (उत्तर है कि) कवि की शक्ति द्वारा (दोष के) तिरोहित हो जाने के कारण। क्योंकि दोष दो प्रकार का है—कवि की अव्युत्पत्ति द्वारा कृत और अशक्ति द्वारा कृत। उनमें अव्युत्पत्तिकृत दोष शक्ति से तिरस्कृत हो जाने के कारण कभी लक्षित नहीं होता। परन्तु जो अशक्तिकृत दोष है वह झट प्रतीत हो जाता है। यहां परिकर-श्लोक भी है— लोचनम् नाम्। यथास्वमिति। 'शृङ्गार एव परमो मनःप्रह्लादनो रसः' इत्यादिना च विषयनियम उक्त एव। अथवेति। रसाभिव्यक्तावेतदेव सामर्थ्यं शब्दानां यत्त- त्था तथा सङ्घटमानत्वमिति भावः। इत्यादि में अचारुत्व प्रतीत नहीं होता उस कारण। परन्तु उनका अर्थात् गुणों का। अपने अपने—। 'शृङ्गार ही मन को परम आह्लादित करने वाला रस है' इत्यादि द्वारा भी विषयनियम कहा जा चुका ही है। अथवा—। भाव यह कि रसाभिव्यक्ति में गुणों की इतनी ही सामर्थ्य है जो उस उस प्रकार सङ्घटमानत्व है।