भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

३४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ‘अव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्त्या संव्रियते कवेः । यस्त्वशक्तिकृतस्तस्य स झटित्यवभासते ॥’ तथा हि—महाकवीनामप्युत्तमदेवताविषयप्रसिद्धसंभोगशृङ्गारनिब- न्धनाद्यनौचित्यं शक्तितिरस्कृतत्वात् ग्राम्यत्वेन न प्रतिभासते । यथा कुमारसम्भवे देवीसम्भोगवर्णनम् । एवमादौ च विषये यथौचित्या- त्यागस्तथा दर्शितमेवाग्रे । शक्तितिरस्कृतत्वं चान्वयव्यतिरेकाभ्यामव- 'कवि की अव्युत्पत्ति द्वारा कृत दोष शक्ति से ढंक जाता है, परन्तु जो उसकी अशक्ति द्वारा कृत है वह झट प्रतीत हो जाता है।' जैसा कि—महाकवियों का भी उत्तम देवता के सम्बन्ध में प्रसिद्ध सम्भोग शृङ्गार का निबन्धन आदि अनौचित्य शक्ति से तिरस्कृत होने के कारण ग्राम्य रूप से नहीं प्रतिभासित होता। जैसे, 'कुमारसम्भव' में देवी का सम्भोगवर्णन।—और इत्यादि प्रकार के विषय में जैसा औचित्य का त्याग नहीं है इस प्रकार आगे दिखाया ही है। और शक्ति द्वारा तिरस्कृतत्व अन्वय-व्यतिरेक द्वारा निश्चित होता है। जैसा लोचनम् शक्तिः प्रतिभानं वर्णनीयवस्तुविषयनूत्तनोल्लेखशालित्वम् । व्युत्पत्तिस्तदुप- योगिसमस्तवस्तुपौर्वापर्यपरामर्शकौशलम् । तस्येति कवेः । अनौचित्यमिति । आस्वादयितॄणां यः चमत्काराविघातस्तदेव रससर्वस्वम् आस्वादायत्तत्वात् । उत्तमदेवतासंभोगपरामर्शे च पितृसंभोग इव लज्जातङ्कादिना कश्चमत्कारा- वकाश इत्यर्थः । शक्तितिरस्कृतत्वादिति । संभोगोऽपि ह्यसौ वर्णितस्तथा प्रतिभानवता कविना यथा तत्रैव विश्रान्तं हृदयं पौर्वापर्यपरामर्शं कर्तुं न ददा- ति यथा निर्व्याजपराक्रमस्य पुरुषस्याविषयेऽपि युध्यमानस्य तावत्तस्मिन्नवसरे साधुवादो वितीर्यते न तु पौर्वापर्यपरामर्शो तथात्रापीति भावः । दर्शितमेवेति । शक्ति अर्थात् प्रतिभान, अर्थात् वर्णनीय वस्तु के सम्बन्ध में नई बात की उल्लेख- शालिता। व्युत्पत्ति अर्थात् उस (वर्णनीय) के उपयोगी समस्त वस्तुओं के पौर्वापर्य- पूर्वक परामर्श में कौशल। उसकी अर्थात् कवि की। अनौचित्य—। आस्वाद करने वालों के जो चमत्कार का अविघात है वही आस्वाद के अधीन होने के कारण रस- सर्वस्व है। अर्थात् उत्तमदेवता के सम्भोग के परामर्श में पितृसम्भोग की भांति कौन सा चमत्कार का अवकाश है! शक्ति द्वारा तिरस्कृत होने के कारण—। भाव यह कि प्रतिभानयुक्त कवि द्वारा वह सम्भोग भी उस प्रकार वर्णित है जैसे कि उसीमें विश्रान्त हृदय को पौर्वापर्य का परामर्श करने नहीं देता, जिस प्रकार कोई निर्व्याज पराक्रम वाला व्यक्ति जब बिना विषय के भी युद्ध करने लगता है उस अवसर में साधुवाद वितरण किया जाता है न कि पौर्वापर्य के परामर्श में (प्रवृत्ति होती है) उस प्रकार