ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३४७ ध्वन्यालोकः सीयते । तथा हि शक्तिरहितेन कविना एवंविधे विषये शृङ्गार उपनि- बध्यमानः स्फुटमेव दोषत्वेन प्रतिभासते । नन्वस्मिन् पक्षे 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति' इत्यादौ किमचारुत्वम् ? अप्रतीयमानमेवारोपयामः । तस्माद् गुणव्यतिरिक्तत्वे गुणरूपत्वे गुणरूपत्वे च सङ्घटनाया अन्यः कश्चिन्नियमहेतुर्वक्तव्य इत्युच्यते । —तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ॥ ६ ॥ तत्र वक्ता कविः कविनिबद्धो वा, कविनिबद्धश्चापि रसभावरहितो रसभावसमन्वितो वा, रसोऽपि कथानायकाश्रयस्तद्विपक्षाश्रयो वा, कथानायकश्च धीरोदात्तादिभेदभिन्नः पूर्वस्तदनन्तरो वेति विकल्पाः । कि शक्तिरहित कवि के द्वारा इस प्रकार के विषय में उपनिबध्यमान शृङ्गार स्पष्ट ही दोषरूप से मालूम पड़ता है । ( प्रश्न ) इस पक्ष में 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति' इत्यादि में अचारुत्व क्या है ? प्रतीत न होते हुए अचारुत्व का आरोप करते हैं । इसलिए गुण से व्यतिरिक्त होने और गुणरूप होने में सङ्घटना का अन्य कोई नियम हेतु कहना चाहिए, अतः कहते हैं— उसके नियमन में हेतु वक्ता और वाच्य का औचित्य है ॥ ६ ॥ उनमें से वक्ता कवि अथवा कविनिबद्ध हो सकता है, और कविनिबद्ध भी रसभावरहित अथवा रसभावसमन्वित हो सकता है, रस भी कथानायक के आश्रित अथवा उसके विपक्षके आश्रित हो सकता है और कथानायक धीरोदात्त आदि भेद से लोचनम् कारिकाकारेणेति भूतप्रत्ययः । वक्ष्यते हि—'अनौचित्यादृते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम्' इत्यादि । अप्रतीयमानमेवेति । पूर्वापरपरामर्शविवेकशालिभिरपीत्य- र्थः । गुणव्यतिरिक्तत्व इति । व्यतिरेकपञ्चे हि सङ्घटनाया नियमहेतुरेव नास्ति ऐक्यपक्षेऽपि न रसो नियमहेतुरित्यन्यो वक्तव्यः । तन्नियम इति कारिकावशेषः । कथां नयति स्वकर्त्तव्याङ्गभावमिति कथाना- यको यो निर्वहणे फलभागी । धीरोदात्तादीति । धर्मयुद्धवीरप्रधानो धीरोदात्तः । यहां भी । दिखाया ही है—। कारिकाकार ने, यह भूतप्रत्यय है । कहेंगे—'अनौचित्य के अतिरिक्त कोई रसभङ्ग का कारण नहीं' इत्यादि । प्रतीत न होते हुए—। अर्थात् पूर्वापर के परामर्श के विवेक वालों द्वारा भी । गुण से व्यतिरिक्त होने में—। व्यतिरेक ( भेद ) पक्ष में सङ्घटना का नियमहेतु ही नहीं है, ऐक्य ( अभेद ) पक्ष में भी रस नियमहेतु नहीं है, अतः अन्य कहना चाहिए । उसके नियमन में यह कारिका का अवशेष है । कथा को अपने कर्त्तव्य का अङ्गत्व प्राप्त कराता है अतः कथानायक है, जो निर्वहण में फल प्राप्त करता है । धीरोदात्त आदि—। धर्मवीर, युद्धवीर-प्रधान धीरो-