ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यं च ध्वन्यात्मरसाङ्गं रसाभासाङ्गं वा, अभिनेयार्थमनभिनेयार्थं वा, उत्तमप्रकृत्याश्रयं तदितराश्रयं वेति बहुप्रकारम् । तत्र यदा कविरपगत- भिन्न पूर्व अथवा उसके बाद का हो सकता है, इस प्रकार विकल्प हैं । और वाच्य भी ध्वनिरूप रस का अङ्ग, अथवा रसाभास का अङ्ग, अभिनेयार्थ अथवा अनभिनेयार्थ, उत्तम प्रकृति के आश्रित अथवा उससे इतर के आश्रित, बहुत प्रकार का लोचनम् वीररौद्रप्रधानो धीरोद्धतः । वीरशृङ्गारप्रधानो धीरललितः । दानधर्मवीरशान्त- प्रधानो धीरप्रशान्त इति चत्वारो नायकाः क्रमेण सात्त्वत्यारभटीकैशिकीभार- तीलक्षणवृत्तिप्रधानाः । पूर्वः कथानायकस्तदनन्तर उपनायकः । विकल्पा इति । वक्तृभेदा इत्यर्थः । वाच्यमिति । ध्वन्यात्मा ध्वनिस्वभावो यो रसस्तस्याङ्गं व्य- ङ्गकमित्यर्थः । अभिनेयो वागङ्गसत्त्वाहार्यैराभिमुख्यं साक्षात्कारप्रायं नेयोऽर्थो व्यङ्ग्यरूपो ध्वनिस्वभावो यस्य तदभिनेयार्थं वाच्यं, स एव हि काव्यार्थ इत्यु- च्यते । तस्यैव चाभिनयेन योगः। यदाह मुनिः-'वागङ्गसत्त्वोपेतान् काव्यार्थान् भावयन्ति' इत्यादि तत्र तत्र । रसाभिनयानान्तरीकतया तु तद्विभावादिरूपतया वाच्योऽर्थोऽभनीयत इति वाच्यमभिनेयार्थमित्येषैव युक्ततरा वाचोयुक्तिः । न त्वत्र व्यपदेशिवद्भावो व्याख्येयः, यथान्यैः । तदितरेति । मध्यमप्रकृत्याश्रयमध- मप्रकृत्याश्रयं चेत्यर्थः । एवं वक्तृभेदान्वाच्यभेदांश्चाभिधाय तद्गतमौचित्यं नि- यामकमाह—तत्रेति । रचनाया इति सङ्घटनायाः । रसभावहीनोऽनाविष्टस्ता- दात्त । वीररौद्रप्रधान धीरोद्धत । वीरशृङ्गारप्रधान धीरललित । दानधर्मवीरशान्त- प्रधान धीरप्रशान्त, ये चार नायक क्रम से सात्त्वती, आरभटी, कैशिकी, भारतीरूप वृत्तिप्रधान होते हैं । पूर्व कथानायक, उसके बाद उपनायक । विकल्प— । अर्थात् वक्तृभेद । वाच्य— । ध्वनिरूप अर्थात् ध्वनिस्वभाव जो रस उसका अङ्ग अर्थात् व्यञ्जक । अभिनेय अर्थात् वाणी, अङ्ग, सत्त्व, आहार्य द्वारा आभिमुख्य अर्थात् साक्षा- त्कारप्राय पहुंचाया गया अर्थ व्यङ्ग्यरूप ध्वनिस्वभाव है जिसका वह अभिनेयार्थ वाच्य, वही 'काव्यार्थ' कहा जाता है । उसी का अभिनय के साथ सम्बन्ध है । क्योंकि मुनि ने कहा है—'वाणी, अङ्ग और सत्त्व से उपेत काव्यार्थों का भावन करते हैं', इत्यादि वहां-वहां । रसाभिनय का नान्तरीयक (अविनाभाव, अत्यावश्यक) होने से उसके (रस के) विभाव आदि रूप होने के कारण वाच्य अर्थ अभिनीत होता है, इस प्रकार वाच्य अभिनेयार्थ है यही कहने का ढङ्ग अच्छा है, न कि यहां व्यपदेशिवद्भाव ('राहोः शिरः' की भांति भेदविवक्षा) व्याख्यान के योग्य है, जैसा कि अन्य लोगों ने (व्याख्यान किया है) । उससे इतर— । अर्थात् मध्यम प्रकृति के आश्रित और उत्तम प्रकृति के आश्रित । इस प्रकार वक्ता के भेदों और वाच्य के भेदों का अभिधान करके नियामक तद्गत औचित्य को कहते हैं—उनमें से— । रचना की अर्थात् सङ्घटना की