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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

तृतीय उद्योतः ३४९

ध्वन्यालोकः

रसभावो वक्ता तदा रचनायाः कामचारः । यदापि कविनिबद्धो वक्ता
रसभावरहितस्तदा स एव; यदा तु कविः कविनिबद्धो वा वक्ता रस-
भावसमन्वितो रसश्च प्रधानाश्रितत्वाद् ध्वन्यात्मभूतस्तदा नियमेनैव
तत्रासमासामध्यसमासे एव सङ्घटने । करुणविप्रलम्भशृङ्गारयोस्त्व-
समासैव सङ्घटना । कथमिति चेत्; उच्यते-रसो यदा प्राधान्येन
हो सकता है । उनमें से जब कवि रसभावरहित वक्ता हो तब रचना की
स्वतन्त्रता है, और जब कविनिबद्ध वक्ता रसभावरहित हो तब वही है; परन्तु जब
कवि अथवा कविनिबद्ध वक्ता रसभावसमन्वित हो, और रस प्रधान के आश्रित
होने के कारण ध्वनिरूप हो चुका हो तब नियमतः ही वहाँ असमासा और मध्य-
समासा ही सङ्घटनाएं होंगी । परन्तु करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में असमासा ही
सङ्घटना होगी । यदि कहो 'कैसे ?' तो कहते हैं-रस जब प्राधान्य से प्रतिपाद्य

लोचनम्

पक्षादिरुदासीनोऽपीतिवृत्ताङ्गतया यद्यपि प्रधानरसानुयाय्येव, तथापि तावति
रसादिहीन इत्युक्तम् । स एवेति कामचारः । एवं शुद्धवक्त्रौचित्यं विचार्य वाच्यौ-
चित्त्येन सह तदेवाह-यदा त्विति । कविर्यद्यपि रसाविष्ट एव वक्ता युक्तः ।
अन्यथा 'स एव वीतरागश्चेत्' इति स्थित्या नीरसमेव काव्यं स्यात् । तथापि
यदा यमकादिचित्रदर्शनप्रधानोऽसौ भवति, तदा 'रसादिहीन' इत्युक्तम् । नि-
यमेन रसभावसमन्वितो वक्ता न तु कथञ्चिदपि तटस्थः । रसश्च ध्वन्यात्मभूत
एव न तु रसवदलङ्कारप्रायः । तदासमासामध्यसमासे एव सङ्घटने, अन्यथा
तु दीर्घसमासापीत्येवं योज्यम् । तेन नियमशब्दस्य द्वयोश्चैवकारयोः पौनरुक्त्य-
मनाशङ्क्यम् । कथमिति चेदिति । किं धर्मसूत्रकारवचनमेतदिति भावः । उच्यत-
रसभावहीन अनाविष्ट तापस आदि उदासीन भी इतिवृत्त के अङ्ग रूप से यद्यपि
प्रधान रस का अनुयायी ही होता है तथापि उतने में (अपने आप में) रसादि से हीन
होता है यह कहा है। वही-। स्वतन्त्रता । इस प्रकार शुद्ध वक्ता के औचित्य को
विचार करके वाच्यौचित्य के साथ उसी को कहते हैं-परन्तु जब-। कवि यद्यपि
रसाविष्ट ही वक्ता ठीक होता है । अन्यथा 'वही वीतराग हो' इस स्थिति के अनुसार
काव्य नीरस ही होगा, तथापि वह जब यमक आदि चित्र देखने में लग जाता है तब
'रसादिहीन' हो जाता है, यह कहा है । नियमतः वक्ता रसभावसमन्वित होता है न
कि किसी प्रकार भी उसे तटस्थ होना चाहिए । और रस ध्वनि का रूप ही होना
चाहिए, न कि रसवदलङ्कार । ऐसी स्थिति में असमासा और मध्यमसमासा ही सङ्घट-
नाएं होंगी, अन्यथा दीर्घसमासा भी होगी, इस प्रकार (ग्रन्थ) को लगाना चाहिए ।
इसलिए 'नियम' शब्द का और दो 'ही' (एवकार) का प्रयोग आशंकनीय नहीं हैं ।
कैसे ?-भाव यह कि क्या यह धर्मसूत्रकार का वचन है ! कहते हैं-। अर्थात् न्याय की