ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रतिपाद्यस्तदा तत्प्रतीतौ व्यवधायका विरोधिनश्च सर्वात्मनैव परि- हार्याः। एवं च दीर्घसमासा सङ्घटना समासानामनेकप्रकारसम्भावनया कदाचिद्रसप्रतीतिं व्यवदधातीति तस्यां नात्यन्तमभिनिवेशः शोभते। विशेषतोऽभिनेयार्थे काव्ये, ततोऽन्यत्र च विशेषतः करुणविप्रलम्भशृङ्गा- रयोः। तयोर्हि सुकुमारतरत्वात् स्वल्पायामप्यस्वच्छतायां शब्दार्थयोः प्रतीतिर्मन्थरीभवति। रसान्तरे पुनः प्रतिपाद्ये रौद्रादौ मध्यमसमासा होता है तब उसकी प्रतीति में व्यवधायक और विरोधी सब प्रकार से ही परिहार्य होते हैं। और इस प्रकार दीर्घसमासा सङ्घटना समासों के अनेक प्रकारों की सम्भावना के कारण कदाचित् रस की प्रतीति का व्यवधान करती है, इसलिए उसमें अत्यन्त अभिनिवेश शोभा नहीं देता। विशेषतः अभिनेयार्थ काव्य में, और उससे अतिरिक्त में विशेषतः करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में। क्योंकि उन दोनों के सुकुमारतर होने के कारण थोड़ी भी अस्वच्छता होने पर शब्द-अर्थ की प्रतीति मन्थर (शिथिल) हो जाती है। और रौद्र आदि दूसरे रसों के प्रतिपादन में मध्यमसमासा सङ्घटना लोचनम् इति। न्यायोपपत्त्येत्यर्थः। तत्प्रतीताविति। तदास्वादे ये व्यवधायका आस्वाद- विघ्नरूपा विरोधिनश्च तद्विपरीतास्वादमया इत्यर्थः। सम्भावनयेति। अनेकप्रकारः सम्भाव्यते सङ्घटना तु सम्भावनायां प्रयोक्त्रीति द्वौ णिचौ। विशेषतोऽभिने- यार्थेति। अनुटितेन व्यङ्ग्येन तावत्समासार्थाभिनयो न शक्यः कर्तुम्। काका- दयोऽन्तरप्रसादगानादयश्च। तत्र दुष्प्रयोज्या बहुतरसन्देहप्रसरा च तत्र प्रति- पत्तिर्न नाट्येऽनुरूपा स्यात्। प्रत्यक्षरूपत्वात्तस्या इति भावः। अन्यत्र चेति। अनभिनेयार्थेऽपि। मन्थरीभवतीति। आस्वादो विघ्नितत्वात्प्रतिहन्यत इत्यर्थः। तस्या दीर्घसमाससङ्घटनायाः य आक्षेपस्तेन विना यो न भवति व्यङ्ग्याभि- उपपत्ति से। उसकी प्रतीति में—। अर्थात् उसके आस्वाद में जो व्यवधायक और आस्वाद के विघ्नरूप विरोधी हैं, उसके विपरीत आस्वादमय। सम्भावना के कारण—। अनेक प्रकार सम्भावित होती है, और सङ्घटना सम्भावना में प्रयोजककर्त्री है, इस- लिए दो 'णिच्' हैं। विशेषतः अभिनेयार्थ—। बिना व्यङ्ग्य अर्थ के तोड़े समासार्थ का अभिनय नहीं किया जा सकता। काकु आदि और बीच में प्रसन्न करने के लिए गान आदि। भाव यह कि वहां यह दुष्प्रयोज्य है और नाट्य में बहुत सन्देहों से भरी प्रतिपत्ति अनुरूप नहीं होती। क्योंकि वह प्रत्यक्षरूप होती है। और उससे अतिरिक्त में—। अनभिनेयार्थ में भी। मन्थर हो जाती है—विघ्नित हो जाने के कारण आस्वाद प्रति- हत हो जाता है। उस दीर्घसमाससङ्घटना के आक्षेप के बिना जो व्यङ्ग्य का अभि-