ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३५१ ध्वन्यालोकः सङ्घटना कदाचिद्धीरोद्धतनायकसम्बन्धव्यापाराश्रयेण दीर्घसमासापि वा तदाक्षेपाविनाभावरसोचितवाच्यापेक्षया न विगुणा भवतीति सापि नात्यन्तं परिहार्या। सर्वासु च सङ्घटनासु प्रसादाख्यो गुणो व्यापी। स हि सर्वरससाधारणः सर्वसङ्घटनासाधारणश्चेत्युक्तम्। प्रसादातिक्रमे ह्यस- मासापि सङ्घटना करुणविप्रलम्भशृङ्गारौ न व्यनक्ति। तदपरित्यागे च मध्यमसमासापि न न प्रकाशयति। तस्मात्सर्वत्र प्रसादोऽनुसर्तव्यः। अत एव च 'यो यः शस्त्रं विभर्ति' इत्यादौ यद्योजसः स्थितिर्नेष्यते अथवा दीर्घसमासा भी कभी धीरोद्धत नायक के सम्बन्ध या व्यापार के सहारे, उसके आक्षेप के बिना न हो सकने वाले इसके उचित वाच्य की अपेक्षा से विगुण (प्रतिकूल) नहीं होती, इसलिए वह भी अत्यन्त परिहार्य नहीं है। और सभी सङ्घटनाओं में प्रसाद नाम का गुण व्याप्त रहने वाला है। क्योंकि वह सर्वरससाधारण और सर्वसङ्घटनासाधारण कहा गया है। प्रसाद के बिना असमासा भी सङ्घटना करुण और शृङ्गार को व्यक्त नहीं करती है और उसके होने पर मध्यमसमासा भी सङ्घटना नहीं प्रकाशित करती है यह बात नहीं। इसलिए सर्वत्र प्रसाद का अनुसरण करना चाहिए। और इसलिए ही 'यो यः शस्त्रं विभर्ति' इत्यादि में यदि ओजस् की स्थिति लोचनम् व्यञ्जकस्तादृशो रसोचितो रसव्यञ्जकतयोपादीयमानो वाच्यस्तस्य यासावपेक्षा दीर्घसमाससङ्घटनां प्रति सा अवैगुण्ये हेतुः। नायकस्याक्षेपो व्यापार इति यद्व्याख्यातं तन्न श्लिष्यतीत्यलम्। व्यापीति। या काचित्सङ्घटना सा तथा कर्तव्या, यथा वाच्ये झटिति भवति प्रतीतिरिति यावत्। उक्तमिति। 'समर्प- कत्वं काव्यस्य यत्तु' इत्यादिना। न व्यनक्तीति। व्यञ्जकस्य स्ववाच्यस्यैवा- त्यायनादिति भावः। तदिति। प्रसादस्यापरित्यागे अभीष्टत्वादत्रार्थे स्वकण्ठे- व्यञ्जक नहीं होता उस प्रकार का रसोचित अर्थात् रस के व्यञ्जक रूप से उपादीयमान वाच्य है उसकी जो यह अपेक्षा दीर्घसमाससङ्घटना के प्रति है वह अप्रातिकूल्य में हेतु है। नायक का आक्षेप अर्थात् व्यापार यह जो व्याख्यान किया गया है वह मेल जैसे नहीं खाता अतः ठीक नहीं। व्याप्त रहने वाला—। मतलब कि जो कोई सङ्घटना है वह उस प्रकार करनी चाहिए जिस प्रकार कि वाच्य अर्थ में प्रतीति झट हो जाय। कहा गया है—। 'समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु' इत्यादि द्वारा। व्यक्त नहीं करती है—। भाव यह कि क्योंकि व्यञ्जक अपने वाच्य का ही प्रत्यायन नहीं कर पाता। उसके—। प्रसाद के होने पर अभीष्ट होता है, इस अर्थ में अपने कण्ठ से 'अन्वय-व्यतिरेक' कह