भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

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३५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
तत्प्रसादाख्य एव गुणो न माधुर्यम् । न चाचारुत्वम्; अभिप्रेतरस-
प्रकाशनात् । तस्माद्गुणाव्यतिरिक्तत्वे गुणव्यतिरिक्तत्वे वा सङ्घटनाया
यथोक्तौचित्याद्विषयनियमोऽस्तीति तस्या अपि रसव्यञ्जकत्वम् ।
तस्याश्च रसाभिव्यक्तिनिमित्तभूताया योऽयमनन्तरोक्तो नियमहेतुः स
एव गुणानां नियतो विषय इति गुणाश्रयेण व्यवस्थानेमप्यविरुद्धम् ।
विषयाश्रयमप्यन्यदौचित्यं तां नियच्छति ।
काव्यप्रभेदाश्रयतः स्थिता भेदवती हि सा ॥ ७ ॥
अभिमत नहीं है [तो (वहां) प्रसाद ही गुण है माधुर्य नहीं। अभिप्रेत रस के
प्रकाशन हो जाने से अचारुत्व नहीं है। इसलिए गुण से अतिरिक्त न होने अथवा
गुण से अतिरिक्त होने में सङ्घटना का यथोक्त औचित्य के कारण विषयनियम है,
अतः उसका भी रसव्यञ्जकत्व है। और रस की अभिव्यक्ति में निमित्तभूत उस
(सङ्घटना) का जो यह अभी कहा गया नियमहेतु है वही गुणों का नियत विषय है,
इसलिए गुण के आश्रित रूप से (सङ्घटना के) व्यवस्थापन में भी विरोध नहीं ॥५-६॥
विषय के आश्रित भी दूसरा औचित्य उसका नियमन करता है, काव्य के प्रभेदों
के अनुसार वह भिन्न होती है ॥ ७ ॥
लोचनम्
नान्वयव्यतिरेकावुक्तौ । न माधुर्यमिति । ओजोमाधुर्ययोरन्योन्याभावरूपत्वं प्राङ्-
निरूपितमिति तयोः सङ्करोऽत्यन्तं श्रुतिबाह्य इति भावः । अभिप्रेतेति । प्रसादे-
नैव स रसः प्रकाशितः न न प्रकाशित इत्यर्थः । तस्मादिति । यदि गुणाः
सङ्घटनैकरूपास्तथापि गुणनियम एव सङ्घटनाया नियमः । गुणाधीन सङ्घ-
टनापक्षेऽप्येवम् । सङ्घटनाश्रयगुणपक्षेऽपि सङ्घटनाया नियामकत्वेन
यद्वक्तृवाच्यौचित्यं हेतुत्वेनोक्तं तद्गुणानामपि नियमहेतुरिति पक्षत्रयेऽपि न
कश्चिद्विप्लव इति तात्पर्यम् ॥ ५-६ ॥
नियामकान्तरमप्यस्तीत्याह-विषयाश्रयमिति । विषयशब्देन सङ्घात-
दिए । माधुर्य नहीं—। भाव यह कि ओजस् और माधुर्य का अन्योन्याभावरूपत्व पहले
निरूपण किया जा चुका है, अतः उनको संकर अत्यन्त श्रुतिबाह्य (कभी सुना
नहीं गया) है। अभिप्रेत-। प्रसाद से ही वह रस प्रकाशित है, अर्थात् नहीं प्रकाशित
है यह बात नहीं। इसलिए-। यदि गुण सङ्घटना रूप हैं तथापि गुणनियम ही
सङ्घटना का नियम है। गुण के अधीन सङ्घटना के पक्ष में भी इसी प्रकार है।
सङ्घटना के आश्रित गुण के पक्ष में भी सङ्घटना के नियामक होने से जो वक्तृगत
और वाच्यगत औचित्य को हेतुरूप से कहा है वह गुणों का भी नियमहेतु है, इस
प्रकार तीनों पक्षों में भी कोई विप्लव नहीं है, यह तात्पर्य है ॥ ५-६ ॥
दूसरा नियामक भी है यह कहते हैं-विषय के आश्रित-। 'विषय' शब्द से