ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३५३ ध्वन्यालोकः वक्तृवाच्यगतौचित्ये सत्यपि विषयाश्रयमन्यदौचित्यं सङ्घटनां नियच्छति। यतः काव्यस्य प्रभेदा मुक्तकं संस्कृतप्राकृतापभ्रंश- निबद्धम्। सन्दानितकविशेषककलापककुलकानि। पर्यायबन्धः परिकथा खण्डकथा-सकलकथे सर्गबन्धोऽभिनेयार्थमाख्यायिका-कथे वक्तृगत और वाच्यगत औचित्य के होने पर भी विषय के आश्रित दूसरा औचित्य सङ्घटना को नियमन करता है। क्योंकि काव्य के प्रभेद संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश में निबद्ध मुक्तक, सन्दानितक, विशेषक, कलापक, कुलक, पर्यायबन्ध, परिकथा, खण्डकथा और सकलकथा, सर्गबन्ध, अभिनेयार्थ, आख्यायिका, कथा आदि इस लोचनम् विशेष उक्तः। यथा हि सेनाद्यात्मकसङ्घातनिवेशी पुरुषः कातरोऽपि तदौचि- त्यादनुगुणतयैवास्ते तथा काव्यवाक्यमपि सङ्घातविशेषात्मकसन्दानितका- दिमध्यनिविष्टं तदौचित्येन वर्तते। मुक्तकं तु विषयशब्देन यदुक्तं तत्सङ्घाता- भावेन स्वातन्त्र्यमात्रं प्रदर्शयितुं स्वप्रतिष्ठितमाकाशमिति यथा। अपिशब्देने- दमाह—सत्यपि वक्तृवाच्यौचित्ये विषयौचित्यं केवलं तारतम्यभेदमात्रव्या- पृतम्, न तु विषयौचित्येन वक्तृवाच्यौचित्यं निवार्यत इति। मुक्तकमिति। मुक्तमन्येनानालिङ्गितं तस्य सञ्ज्ञायां कन्। तेन स्वतन्त्रतया परिसमाप्तनिरा- काङ्क्षार्थमपि प्रबन्धमध्यवर्ति न मुक्तकमित्युच्यते। मुक्तकस्यैव विशेषणं संस्कृतेत्यादि। क्रमभावित्वात्तथैव निर्देशः। द्वाभ्यां क्रियासमाप्तौ सन्दानित- कम्। त्रिभिर्विशेषकम्। चतुर्भिः कलापकम्। पञ्चप्रभृतिभिः कुलकम्। इति 'सङ्घातविशेष' कहा गया है। जैसे कोई सेना आदि रूप सङ्घात में रहने वाला कातर भी पुरुष उसके औचित्य के कारण अनुगुणरूप (अकातर रूप) से ही है उसी प्रकार सङ्घातविशेष रूप सन्दानितक आदि के बीच रहने वाला काव्यवाक्य भी उसके (वचन के) औचित्य से होता है। परन्तु 'विषय' शब्द से जो कहा है उसके सङ्घात के अभाव के कारण स्वप्रतिष्ठित आकाश की भाँति स्वातन्त्र्यमात्र को दिखाने के लिए मुक्तक (को कहा) है। 'भी' शब्द से यह कहते हैं—वक्तृगत औचित्य और वाच्यगत औचित्य के होने पर भी विषयगत औचित्य केवल तारतम्य भेद मात्र का प्रयोजक है, न कि विषयगत औचित्य से वक्तृगत और वाच्यगत औचित्य निवारण किए जाते हैं। मुक्तक—। मुक्त अर्थात् अन्य से अनालिङ्गित, संज्ञा में 'कन्'। इसलिए स्वतन्त्र रूप से निराकांक्ष अर्थ से रहित भी प्रबन्ध के बीच रहने वाला 'मुक्तक' नहीं कहलाता। संस्कृत० इत्यादि 'मुक्तक' का ही विशेषण है। क्रम से होने के कारण उसी प्रकार निर्देश है। दो (पद्यों) से क्रिया के समाप्त हो जाने पर 'सन्दानितक' होता है, तीन से 'विशेषक', चार से 'कलापक', पाँच प्रभृति से 'कुलक'। इस प्रकार क्रिया की समाप्तिप्रयुक्त भेद द्वन्द्व समास द्वारा निर्दिष्ट हैं। २३ ध्व०