भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

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३५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
इत्येवमादयः । तदाश्रयेणापि सङ्घटना विशेषवती भवति । तत्र मुक्त-
केषु रससन्धाभिनिवेशिनः कवेस्तदाश्रयमौचित्यम् । तच्च दर्शितमेव ।
अन्यत्र कामचारः ।
प्रकार हैं। उनके आश्रय से भी सङ्घटना विशेष प्रकार की होती है। उनमें से
मुक्तकों में रस के निबन्धन में अभिनिवेश रखने वाले कवि का रस के आश्रित
औचित्य है। उसे दिखा ही चुके हैं। अन्यत्र स्वतन्त्रता है।
लोचनम्
क्रियासमाप्तिकृता भेदा इति द्वन्द्वेन निर्दिष्टाः । अवान्तरक्रियासमाप्तावपि वसन्त-
वर्णनादिरेकवर्णनीयोद्देशेन प्रवृत्तः पर्यायबन्धः । एकं धर्मादिपुरुषार्थमुद्दिश्य
प्रकारवैचित्र्येणानन्तवृत्तान्तवर्णनप्रकारा परिकथा । एकदेशवर्णना खण्ड-
कथा । समस्तफलान्तेतिवृत्तवर्णना सकलकथा । द्वयोरपि प्राकृतप्रसिद्धत्वाद्
द्वन्द्वेन निर्देशः । पूर्वेषां तु मुक्तकादीनां भाषायामनियमः । महाकाव्यरूपः
पुरुषार्थफलः समस्तवस्तुवर्णनाप्रबन्धः सर्गबन्धः संस्कृत एव । अभिनेयार्थं
दशरूपकं नाटिकात्रोटकरासकप्रकरणिकाद्यवान्तरप्रपञ्चसहितमनेकभाषाम्या-
मिश्ररूपम् । आख्यायिकोच्छ्वासादिना वक्त्रापरवक्त्रादिना च युक्ता ।
कथा तद्विरहिता । उभयोरपि गद्यबन्धस्वरूपतया द्वन्द्वेन निर्देशः । आदिग्रह-
णाच्चम्पूः । यथाह दण्डी-'गद्यपद्यमयी चम्पूः' इति । अन्यत्रेति । रसबन्धान-
भिनिवेशे ।
अवान्तर क्रिया के समाप्त होने पर भी वसन्त-वर्णन आदि एक वर्णनीय के उद्देश्य से
प्रवृत्त (काव्य) 'पर्यायबन्ध' होता है। धर्म आदि एक पुरुषार्थ के उद्देश्य से विभिन्न
प्रकारों से अनन्त वृत्तान्तों के वर्णन का प्रकार 'परिकथा' होती है। एकदेश
(किसी प्रसिद्ध कथा के एक भाग) का वर्णन 'खण्डकथा' होती है। समस्त फल-
पर्यन्त इतिवृत्त का वर्णन 'सकलकथा' होती है । (खण्डकथा और सकलकथा इन)
दोनों के प्राकृत में प्रसिद्ध होने के कारण द्वन्द्व समास द्वारा निर्देश है। किन्तु 'मुक्तक'
आदि पहले प्रभेदों की भाषा में नियम नहीं। महाकाव्यरूप पुरुषार्थ फल वाला
एवं समस्त वस्तुओं के वर्णनों वाला प्रबन्ध संस्कृत में ही होता है। अभिनेयार्थ
दशरूपक नाटिका, त्रोटक, रासक, प्रकरणिका आदि अवान्तर प्रपञ्चसहित, अनेक
भाषाओं का मिलाजुला रूप है। आख्यायिका उच्छ्वास आदि से और वक्त्र और
अपरवक्त्र आदि से युक्त होती है। कथा उनसे विरहित होती है। दोनों (आख्यायिका
और कथा) का भी गद्यबन्ध स्वरूप होने के कारण द्वन्द्व समास से निर्देश है।
'आदि' ग्रहण से 'चम्पू' । जैसा दण्डी ने कहा है—'गद्यपद्यमयी चम्पूः' । अन्यत्र—।
अर्थात् रस के निबन्धन का अभिनिवेश जहाँ नहीं है।