ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३५५ ध्वन्यालोकः मुक्तकेषु प्रबन्धेष्विव रसबन्धाभिनिवेशिनः कवयो दृश्यन्ते । यथा ह्यमरुकस्य कवेर्मुक्ताकाः शृङ्गाररसस्यन्दिनः प्रबन्धायमानाः प्रसिद्धा एव । सन्दानितकादिषु तु विकटनिबन्ध नौचित्यान्मध्यमसमासादीर्घ- समासे एव रचने । प्रबन्धाश्रयेषु यथोक्तप्रबन्धौचित्यमेवानुसर्तव्यम् । प्रबन्धों की भाँति मुक्तकों में कवि लोग रस के निबन्धन का अभिनिवेश रखने वाले देखे जाते हैं । जैसा कि कवि अमरुक के मुक्तक शृङ्गार रस की वर्षा करने वाले एवं प्रबन्ध काव्य सदृश प्रसिद्ध ही हैं । किन्तु सन्दानितक आदि में विकट निबन्धन के औचित्य से मध्यम समासा और दीर्घसमासा ही रचनाएं हैं। प्रबन्ध के आश्रित ( काव्यों ) में यथोक्त प्रबन्ध के औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिए । पर्याय- लोचनम् ननु मुक्तके विभावादिसङ्घटना कथं येन तदायत्तो रसः स्यादित्याश- ङ्क्याह—मुक्तकेष्विति । अमरुकस्येति । कथमपि कृतप्रत्यापत्तौ प्रिये स्खलितोत्तरे विरहकृशया कृत्वा व्याजप्रकलितमश्रुतम् । असहनसखीश्रोत्रप्राप्तिं विशङ्क्य ससम्भ्रमं विवलितदृशा शून्ये गेहे समुच्छ्वसितं ततः ॥ इत्यत्र हि श्लोके स्फुटैव विभावादिसम्पत्प्रतीतिः । विकटेति । असमासायां हि सङ्घटनायां मन्थररूपा प्रतीतिः साकाङ्क्षा सती चिरेण क्रियापदं दूरवर्त्य- नुधावन्ती वाच्यप्रतीतावेव विश्रान्ता सती न रसत्तत्त्वचर्वणायोग्या स्यादिति भावः । प्रबन्धाश्रयेष्विति । सन्दानितकादिषु कुलकान्तेषु । यदि वा प्रबन्धेऽपि मुक्तकस्यास्तु सद्भावः, पूर्वापरनिरपेक्षेणापि हि येन रसचर्वणा क्रियते तद्देव मुक्तक में विभावादि की सङ्घटना कैसे होगी जिससे उसके अधीन रस होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—मुक्तकों में—। अमरुक के—। 'गोत्रस्खलन के अपराधी प्रिय के होने पर किसी प्रकार विश्वास दिलाने पर विरह से कृश नायिका ने ( पुनः समागम की आशा से ) बहाना करके अनसुनी कर दिया, फिर न सहन करने वाली सखी के कानों में ( बात के ) पहुँच जाने के प्रमाद से व्याकुल हो सूने घर में आँखें झुका कर के उच्छ्वास लेने लगी ।' इस श्लोक में स्पष्ट ही विभावादि-सम्पत् की प्रतीति होती है । विकट—। भाव यह कि असमासा सङ्घटना में मन्थररूप प्रतीति देर तक दूरवर्ती क्रियापद का अनुधावन करती हुई वाच्य की प्रतीति में ही विश्रान्त होती हुई इस तत्त्व की चर्वणा के योग्य नहीं होगी । प्रबन्ध के आश्रित—। सन्दानितक आदि में कुलक पर्यन्त में । अथवा प्रबन्ध में भी मुक्तक का सद्भाव माना जाय । पूर्वापर-निरपेक्ष जिस ( श्लोक ) से रसचर्वणा की जाय वह मुक्तक है । जैसे ( मेघदूत का ) 'त्वामालिख्य प्रणयकुपिताम्'