ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः पर्यायबन्धे पुनरसमासामध्यमसमासे एव सङ्घटने । कदाचिदर्थौचित्या- श्रयेण दीर्घसमासायामपि सङ्घटनायां परुषा ग्राम्या च वृत्तिः परिह- र्त्तव्या । परिकथायां कामचारः, तत्रेतिवृत्तमात्रोपन्यासेन नात्यन्तं- रसबन्धाभिनिवेशात् । खण्डकथासकलकथयोस्तु प्राकृतप्रसिद्धयोः कुलका- दिनिबन्धनभूयस्त्वादीर्घसमासायामपि न विरोधः । वृत्त्यौचित्यं तु यथा- रसमनुसर्तव्यम् । सर्गबन्धे तु रसतात्पर्ये यथारसमौचित्यमन्यथा तु कामचारः, द्वयोरपि मार्गयोः सर्गबन्धविधायिनां दर्शनाद्रसतात्पर्यं साधीयः । अभिनेयार्थे तु सर्वथा रसबन्धेऽभिनिवेशः कार्यः । आख्या- बन्ध में असमसा और मध्यमसमासा ही सङ्घटनाए हैं। कभी अर्थ के औचित्य के आश्रय से दीर्घसमासा भी सङ्घटना में परुषा और ग्राम्या वृत्ति को छोड़ देना चाहिए । परिकथा में स्वतन्त्रता है, क्योंकि उसमें केवल इतिवृत्त के वर्णन होने से रस के निबन्धन का अभिनिवेश अत्यन्त नहीं होता। किन्तु प्राकृत में प्रसिद्ध खण्डकथा और सकलकथा में कुलक आदि के निबन्धन के आधिक्य के कारण दीर्घसमासा होने पर भी विरोध नहीं। किन्तु इसके अनुसार वृत्तियों का औचित्य अनुसरण करना चाहिए। किन्तु रस में तात्पर्य वाले सर्गबन्ध में रस के अनुसार औचित्य है, अन्यथा स्वतन्त्रता है। सर्गबन्ध के निर्माता दोनों मार्गों में देखे जाते हैं, (किन्तु) रस में तात्पर्य अच्छा होता है। परन्तु अभिनेयार्थ में सर्वथा रस के निबन्धन में अभिनिवेश करना चाहिए। आख्यायिका और कथा में तो गद्य के निबन्धन का लोचनम् मुक्तकम् । यथा—'त्वामालिख्य प्रणयकुपिताम्' इत्यादिश्लोकः । कदाचिदिति । रौद्रादिविषये । नात्यन्तमिति । रसबन्धे यो नात्यन्तमभिनिवेशस्तस्मादिति सङ्गतिः । वृत्त्यौचित्यमिति । परुषोपनागरिकाग्राम्याणां वृत्तीनामौचित्यं यथाप्र- बन्धं यथारसं च । अन्यथेति । कथामात्रतात्पर्ये वृत्तिष्वपि कामचारः। द्वयोरपीति सप्तमी । कथातात्पर्ये सर्गबन्धो यथा भट्टजयन्तकस्य कादम्बरीकथासारम् । इत्यादि श्लोक । कभी अर्थात् रौद्र आदि के विषय में। अत्यन्त नहीं—। रस के निबन्धन में जो अत्यन्त अभिनिवेश नहीं है उससे यह सङ्गति है। वृत्तियों का औचित्य—। परुषा, उपनागरिका, ग्राम्या वृत्तियों का प्रबन्ध के अनुसार और रस के अनुसार औचित्य । अन्यथा—। कथामात्र में तात्पर्य होने पर वृत्तियों में भी स्वतन्त्रता है। दोनों मार्गों में, यह सप्तमी है। कथा के तात्पर्य में सर्गबन्ध, जैसे भट्ट जयन्तक का कादम्बरी-कथासार; रस में तात्पर्य, जैसे रघुवंश आदि। अन्य (व्याख्याकार)