ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३५७ ध्वन्यालोकः यिकाकथयोस्तु गद्यनिबन्धनबाहुल्याद्गद्ये च छन्दोबन्धाभिन्नप्रस्थान- त्वादिह नियमे हेतुरकृतपूर्वोऽपि मनाक्क्रियते ॥ ७ ॥ एतद्यथोक्तमौचित्यमेव तस्या नियामकम् । सर्वत्र गद्यबन्धेऽपि छन्दोनियमवर्जिते ॥ ८ ॥ यदेतदौचित्यं वक्तृवाच्यगतं सङ्घटनाया नियामकमुक्तमेतदेव गद्ये छन्दोनियमवर्जितेऽपि विषयापेक्षं नियमहेतुः । तथा ह्यत्रापि यदा कविः कविनिबद्धो वा वक्ता रसभावरहितस्तदा कामचारः । रसभाव- समन्विते तु वक्तरि पूर्वोक्तमेवानुसर्तव्यम् । तत्रापि च विषयौचित्य- मेव । आख्यायिकायां तु भूम्ना मध्यमसामासादीर्घसमासे एव सङ्घटने । गद्यस्य विकटबन्धाश्रयेण छायावत्त्वात् । तत्र च तस्य प्रकृष्यमाण- बाहुल्य होने से और गद्य में छन्दोबन्ब से अतिरिक्त प्रस्थान होने से पहले नियामक हेतु न किए जाने पर भी थोड़ा (निर्देश) करते हैं ॥ ७ ॥ यही यथोक्त औचित्य सर्वत्र छन्द के नियमों से वर्जित गद्यबन्ध में भी उसका नियामक होता है ॥ ८ ॥ जो यह वक्तृगत और वाच्यगत औचित्य सङ्घटना का नियामक कहा गया है, यही छन्द के नियमों से वर्जित गद्य में भी विषयगत औचित्यसहित नियामक होता है। जैसा कि यहाँ भी जब कवि अथवा कविनिबद्ध वक्ता रसभाव से रहित होता है तब स्वतन्त्रता होती है। किन्तु रसभाव से समन्वित वक्ता के होने पर पूर्वोक्त का ही अनुसरण करना चाहिए। उसमें भी विषयगत औचित्य ही होता है। किन्तु आख्यायिका में अधिकांश मध्यमसमासा और दीर्घसमासा सङ्घटनाएं ही होती हैं। क्योंकि गद्य विकट रचना के कारण सुन्दर होता है, क्योंकि उसका उसमें प्रकर्ष लोचनम् रसतात्पर्यं यथा रघुवंशादि । अन्ये तु संस्कृतप्राकृतयोर्द्वयोरिति व्याचक्षते, तत्र तु रसतात्पर्यं साधीय इति यदुक्तं तत्किमपेक्ष्येति नेयार्थं स्यात् ॥ ७ ॥ विषयापेक्षमिति । गद्यबन्धस्य भेदा एव विषयत्वेनानुमन्तव्याः ॥ ८ ॥ व्याख्यान करते हैं 'संस्कृत, प्राकृत दोनों में'। उस व्याख्यान में जो कि (ग्रन्थ में) 'रस में तात्पर्य अच्छा होता है' कहा है, वह किस अपेक्षा से ? इस लिए नेयार्थ... (असमर्थ) होगा ॥ ७ ॥ विषयगत औचित्य—। गद्यरचना के भेद ही विषय रूप से मानने चाहिए ॥८॥