भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

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पृष्ठ 418

३५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
त्वात् । कथायां तु विकटबन्धप्राचुर्येऽपि गद्यस्य रसबन्धोक्तमौचित्य-
मनुसर्तव्यम् ॥ ८ ॥
रसबन्धोक्तमौचित्यं भाति सर्वत्र संश्रिता ।
रचना विषयापेक्षं तत्तु किञ्चिद्विभेदवत् ॥ ९ ॥
अथवा पद्यवद्गद्यबन्धेऽपि रसबन्धोक्तमौचित्यं सर्वत्र संश्रिता रचना
भवति । तत्तु विषयापेक्षं किञ्चिद्विशेषवद्भवति, न तु सर्वाकारम् । तथा
हि गद्यबन्धेऽप्यतिदीर्घसमासा रचना न विप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोराख्या-
होता है। किन्तु कथा में गद्य की विकट रचना के प्राचुर्य होने पर भी रस के
निबन्धन के उक्त औचित्य का अनुसरण करना चाहिए ॥ ८ ॥
रसबन्ध में कहे गए औचित्य के सर्वत्र आश्रित रचना शोभा देती है, किन्तु
विषयगत (औचित्य) के अनुसार उसमें कुछ भेद हो जाता है ॥ ९ ॥
अथवा पद्य की भांति गद्यबन्ध में भी रसबन्ध में कहे गए औचित्य के सर्वत्र
आश्रित रचना शोभा देती है, किन्तु उसमें विषयगत (औचित्य) के अनुसार कुछ
विशेष हो जाता है, सब प्रकार से नहीं। जैसा कि गद्यबन्ध में भी दीर्घसमासा रचना
विप्रलम्भ शृङ्गार और करुण में आख्यायिका में भी नहीं शोभा देती। नाटक आदि में
लोचनम्
स्थितपक्षन्तु दर्शयति—रसबन्धोक्तमिति । वृत्तौ च वाशब्दोऽस्यैव पक्षस्य
स्थितिद्योतकः । यथा—
स्त्रियो नरपतिर्वह्निर्विषं युक्त्या निषेवितम् ।
स्वार्थाय यदि वा दुःखसम्भारायैव केवलम् ॥ इति ।
रचना सङ्घटना । तर्हि विषयौचित्यं सर्वथैव त्यक्तं नेत्याह—तदेव रसौ-
चित्यं विषयं सहकारितयापेक्ष्य किञ्चिद्विभेदोऽवान्तरवैचित्र्यं विद्यते यस्य
सम्पाद्यत्वेन तादृशं भवति । एतद्व्याचष्टे–तत्त्विति । सर्वाकारमिति क्रियाविशे-
स्थितपक्ष को दिखाते हैं—रसबन्ध में कहे गए—। वृत्ति में 'अथवा' शब्द इसी
पक्ष की स्थिति का द्योतक है। जैसे—
स्त्रियो नरपतिर्वह्निर्विषं युक्त्या निषेवितम् ।
स्वार्थाय यदि वा दुःखसम्भारायैव केवलम् ॥
स्त्री, राजा, अग्नि और विष युक्तिपूर्वक सेवन किए जाने पर स्वार्थ के लिए होते
हैं, अथवा केवल दुःखसम्भार के लिए ही होते हैं।
रचना अर्थात् सङ्घटना । तो विषयगत औचित्य को सर्वथा नहीं छोड़ा है, यह
कहते हैं—वही रस का औचित्य विषय को सहकारी रूप से अपेक्षा करके कुछ विभेद
अर्थात् अवान्तर-वैचित्र्य है जिसका सम्पाद्य रूप से उस प्रकार का होता है। इसका