भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 680 में से

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पृष्ठ 419

तृतीय उद्योतः ३५९ ध्वन्यालोकः यिकायामपि शोभते । नाटकादावप्यसमासैव न रौद्रवीरादिवर्णने । विषयापेक्षं त्वौचित्यं प्रमाणतोऽपकृष्यते प्रकृष्यते च । तथा ह्याख्यायि- कायां नात्यन्तमसमासा स्वविषयेऽपि नाटकादौ नातिदीर्घसमासा चेति सङ्घटनाया दिगनुसर्तव्या ॥ ९ ॥ इदानीमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिः प्रबन्धात्मा रामायणमहाभार- तादौ प्रकाशमानः प्रसिद्ध एव । तस्य तु यथा प्रकाशनं तत्प्रतिपाद्यते- विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः । विधिः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा ॥ १० ॥ असमासा ही होती है, रौद्र, वीर आदि के वर्णन में नहीं । किन्तु विषयगत औचित्य प्रमाण के अनुसार घट जाता है और बढ़ जाता है । जैसा कि आख्यायिका में अपने विषय में भी अत्यन्त असमासा और नाटक आदि में अतिदीर्घसमासा नहीं होनी चाहिए । इस प्रकार सङ्घटना की दिशा का अनुसरण करना चाहिए ॥ ९ ॥ अब, प्रबन्ध रूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि रामायण, महाभारत आदि में प्रकाश- मान प्रसिद्ध ही है, किन्तु उसका जैसे प्रकाशन है उसे प्रतिपादन करते हैं— विभाव, ( स्थायी ) भाव, अनुभाव, सञ्चारी के औचित्य से सुन्दर, वृत्त ( ऐतिहासिक ) अथवा उत्प्रेक्षित ( कल्पित ) कथाशरीर का निर्माण ॥ १० ॥ लोचनम् षणम् । असमासैवति । सर्वत्रैवेति शेषः । तथा हि वाक्याभिनयलक्षणे 'चूर्ण- पादैः प्रसन्नैः' इत्यादि मुनिरभ्यधात् । अत्रापवादमाह—न चेति । नाटकादा- विति । स्वविषयेऽपीति सम्बन्धः ॥ ६ ॥ एवं सङ्घटनायां चालक्ष्यक्रमो दीप्यत इति निर्णीतम् । प्रबन्धे दीप्यत इति तु निर्विवादसिद्धोऽयमर्थ इति नात्र वक्तव्यं किञ्चिदस्ति । केवलं कविसहृ- दयान् व्युत्पादयितुं रसव्यञ्जने येतिकर्तव्यता प्रबन्धस्य सा निरूप्येत्याशये- नाह—इदानीमिति । इदानीं तत्प्रकारजातं प्रतिपाद्यत इति सम्बन्धः । प्रथमं व्याख्यान करते हैं—किन्तु उसमें—। 'सब प्रकार से' यह क्रियाविशेषण है । असमासा ही—। सर्वत्र ही, यह शेष है । जैसा कि वाक्याभिनय के लक्षण में मुनि ने 'चूर्णपादैः प्रसन्नैः' इत्यादि कहा है । यहां अपवाद कहते हैं—नहीं—। नाटक आदि में—। 'अपने विषय में भी' यह सम्बन्ध है ॥ ९ ॥ इस प्रकार सङ्घटना में भी अलक्ष्यक्रम दीप्त होता है यह निर्णय किया । प्रबन्ध में भी दीप्त होता है यह तो निर्विवाद सिद्ध बात है, अतः इस सम्बन्ध में कुछ वक्तव्य नहीं है । केवल कवियों और सहृदयों को व्युत्पन्न करने के लिए रस के व्यञ्जन में जो प्रबन्ध की इतिकर्तव्यता ( प्रकार ) है वह निरूपणीय है, इस आशय से कहते हैं— अब—। अब उन प्रकारों का प्रतिपादन करते हैं, यह सम्बन्ध है । पहला तो—।