भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 420

३६० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इतिवृत्तवशायातां त्यक्त्वाऽननुगुणां स्थितिम् । उत्प्रेक्ष्याऽप्यन्तराभीष्टरसोचितकथोन्नयः ॥ ११ ॥ सन्धिसन्ध्यङ्गघटनं रसाभिव्यक्त्यपेक्षया । न तु केवलया शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया ॥ १२ ॥ उद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा । रसस्यारब्धविश्रान्तेरनुसन्धानमङ्गिनः ॥ १३ ॥ अलङ्कृतीनां शक्तावप्यानुरूप्येण योजनम् । प्रबन्धस्य रसादीनां व्यञ्जकत्वे निबन्धनम् ॥ १४ ॥ प्रबन्धोऽपि रसादीनां व्यञ्जक इत्युक्तं तस्य व्यञ्जकत्वे निबन्ध- नम् । प्रथमं तावद्विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः कथाशरीरस्य इतिवृत्त के वश आई हुई (रस के) प्रतिकूल स्थिति को छोड़ कर कल्पना करके भी बीच में अभीष्ट रस के उचित कथा का उन्नयन ॥ ११ ॥ सन्धि और सन्धि के अङ्गों का योजन रस की अभिव्यक्ति की अपेक्षा से (होना चाहिए) न कि केवल शास्त्र की मर्यादा को सम्पन्न करने की इच्छा से ॥ १२ ॥ अवसर पर (रस का) उद्दीपन और प्रशमन, तथा बीच में आरब्ध होकर विश्रान्त होते हुए अङ्गी (प्रधान) रस का अनुसन्धान ॥ १३ ॥ शक्ति (सामर्थ्य) होने पर भी अलङ्कारों का योजन अनुरूपता से (करना चाहिए); यह प्रबन्ध के रसादिव्यञ्जक होने में हेतु है ॥ १४ ॥ प्रबन्ध भी रसादि का व्यञ्जक होता है, यह कह चुके हैं, उसके व्यञ्जक होने में हेतु । पहला (हेतु) तो विभाव, (स्थायी) भाव, अनुभाव, सञ्चारो के औचित्य से सुन्दर कथाशरीर का निर्माण अर्थात् यथायोग्य प्रतिपादनार्थ अभीष्ट रस, भाव आदि की लोचनम् तावदिति प्रबन्धस्य व्यञ्जकत्वे ये प्रकारास्ते क्रमेणैवोपयोगिनः । पूर्वं हि कथा- परीक्षा । तत्राधिकावापः फलपर्यन्ततानयनम्, रसं प्रति जागरणम्, तदुचित- विभावादिवर्णनेऽलङ्कारौचित्यमिति । तत्क्रमेण पञ्चकं व्याचष्टे—विभावेत्या- प्रबन्ध के व्यञ्जक होने में जो प्रकार हैं वे क्रम से ही उपयोगी हैं। पहले कथा की परीक्षा, उसमें अधिक ग्रहण अर्थात् फलपर्यन्त पहुंचाना, रसके प्रति जागरण, उसके उचित विभाव आदि के वर्णन में अलङ्कार का औचित्य । क्रम से उस पञ्चक का व्याख्यान करते हैं—'विभाव' इत्यादि द्वारा । उसका औचित्य—। अर्थात् शृङ्गार के वर्णन की इच्छा वाले को उस प्रकार की कथा का आश्रयण करना चाहिए जिसमें ऋतु,