ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३६१ ध्वन्यालोकः विधिर्यथायथं प्रतिपिपादयिषितरसभावाद्यपेक्षया य उचितो विभावो भावोऽनुभावः सञ्चारी वा तदौचित्यचारुणः कथाशरीरस्य विधिर्व्य- ञ्जकत्वे निबन्धनमेकम् । तत्र विभावौचित्यं तावत्प्रसिद्धम् । भावौचि- त्यं तु प्रकृत्यौचित्यात् । प्रकृतिर्ह्युत्तममध्यमाधमभावेन दिव्यमानुषादि- भावेन च विभेदिनी । तां यथायथमनुसृत्यासङ्कीर्णः स्थायी भाव उपनिबध्यमान औचित्यभाग् भवति । अन्यथा तु केवलमानुषाश्रयेण दिव्यस्य केवलदिव्याश्रयेण वा केवलमानुषस्योत्साहादय उपनिबध्य- माना अनुचिता भवन्ति । तथा च केवलमानुषस्य राजादेर्वर्णने सत्ता- र्णवलङ्घनादिलक्षणा व्यापारा उपनिबध्यमानाः सौष्ठवभृतोऽपि नीरसा एव नियमेन भवन्ति, तत्र त्वनौचित्यमेव हेतुः । अपेक्षा से जो विभाव, (स्थायी) भाव, अनुभाव अथवा सञ्चारी है, उसके औचित्य से सुन्दर कथाशरीर का निर्माण व्यञ्जक होने में एक हेतु है । उनमें विभाव का औचित्य प्रसिद्ध है । भाव का औचित्य प्रकृति के औचित्य से होता है । प्रकृति उत्तम, मध्यम, अधम भाव से और दिव्य, मानुष आदि भाव से विभिन्न होती है । उसे यथायोग्य अनुसरण करके असङ्कीर्ण स्थायी भाव उपनिबध्यमान होकर औचित्य- युक्त होता है । अन्यथा केवल मानुष के आश्रय से दिव्य के अथवा केवल दिव्य के आश्रय से केवलमानुष के उत्साह आदि उपनिबध्यमान होकर अनुचित होते हैं । जैसा कि केवलमानुष राजा आदि के वर्णन में सात समुद्रों का पार करना आदि रूप व्यापार उपनिबध्यमान होकर सौष्ठवयुक्त होने पर भी नीरस ही नियमतः होते हैं, उसमें तो अनौचित्य ही हेतु है । लोचनम् दिना । तदौचित्येति । शृङ्गारवर्णनेच्छुना तादृशी कथा संश्रयणीया यस्यामृतु- माल्यादेर्विभावस्य लीलादेरनुभावस्य हर्षधृत्यादेः सञ्चारिणः स्फुट एव सद्भाव इत्यर्थः । प्रसिद्धमिति । लोके भरतशास्त्रे च । व्यापार इति । तद्विषयोत्साहो- पलक्षणमेतत् । स्थाय्यौचित्यं हि व्याख्येयत्वेनोपक्रान्तं नानुभावौचित्यम् । सौष्ठवभृतोऽपीति । वर्णनामहिम्नेत्यर्थः । तत्र त्विति नीरसत्वे । माल्य आदि विभाव का, लीला आदि अनुभाव का, हर्ष, धृति आदि सञ्चारी का स्पष्ट ही सद्भाव हो । प्रसिद्ध—। लोक में और भरतशास्त्र में । व्यापार—। उस विषय के उत्साह का यह उपलक्षण है । क्योंकि स्थायी का औचित्य व्याख्येय रूप से उपक्रान्त है न कि अनुभाव का औचित्य । सौष्ठवयुक्त होने पर भी—। अर्थात् वर्णना की महिमा से । उसमें तो—। अर्थात् नीरसत्व में ।