ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ननु नागलोकगमनादयः सातवाहनप्रभृतीनां श्रूयन्ते, तदलो- कसामान्यप्रभावातिशयवर्णने किमनौचित्यं सर्वोर्वीभरणक्षमाणां क्ष्मा- भुजामिति । नतदस्ति ; न वयं ब्रूमो यत्प्रभावातिशयवर्णनममुचितं राज्ञाम्, किं तु केवलमानुषाश्रयेण योत्पाद्यवस्तुकथा क्रियते तस्यां दिव्यमौचित्यं न योजनीयम् । दिव्यमानुष्यायां तु कथायामुभयौचित्य- योजनमविरुद्धमेव । यथा पाण्ड्वादिकथायाम् । सातवाहनादिषु तु येषु यावदपदानं श्रूयते तेषु तावन्मात्रमनुगम्यमानमनुगुणत्वेन प्रतिभासते। व्यतिरिक्तं तु तेषामेवोपनिबध्यमानमनुचितम् । तदयमत्र परमार्थः— अनौचित्यादृते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम् । प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥ (शंका) सातवाहन प्रभृति (राजाओं) के नागलोकगमन आदि (कार्य) सुने जाते हैं, तो समस्त पृथिवी के भरण में समर्थ राजाओं के अलोकसामान्य अति- शय प्रभाव के वर्णन में क्या वह अनौचित्य है ! (समाधान) यह नहीं है; हम नहीं कहते हैं कि राजाओं के अतिशय प्रभाव का वर्णन अनुचित है, किन्तु केवलमानुष के आश्रय से जो उत्पाद्य (कल्पित) वस्तुकथा रची जाती है उसमें दिव्य औचित्य की योजना नहीं करनी चाहिए । परन्तु दिव्यमानुष कथा में उभय प्रकार के औचित्य का योजन अविरुद्ध ही है। जैसे पाण्डु आदि की कथा में। किन्तु जिन सातवाहन आदि में जितना अपदान (पूर्व वृत्तान्त) सुना जाता है उनमें उतने मात्र तक अनुगमन करना अनुकूल रूप से मालूम पड़ता है। परन्तु उनका ही उससे व्यतिरिक्त का वर्णन अनुचित हो जाता है। तो यह यहां परमार्थ है— 'अनौचित्य को छोड़ कर कोई दूसरा रसभङ्ग का कारण नहीं है, और प्रसिद्ध औचित्य का योजन रस की परा उपनिषद् है।' लोचनम् व्यतिरिक्तं त्विति । अधिकमित्यर्थः । एतदुक्तं भवति—यत्र विनेयानां प्रतीतिखण्डना न जायते तादृग्वर्णनीयम् । तत्र केवलमानुषस्य एकपदे सप्ताणँवलङ्घनमसम्भाव्यमानतयाऽनृतमिति हृदये- स्फुरदुपदेश्यस्य चतुर्वर्गोपायस्याप्यलीकतां बुद्धौ निवेशयति । रामादेस्तु तथा- व्यतिरिक्त—। अर्थात् अधिक। यह कहा गया—जहां विनेय (शिक्षणीय) जनों की प्रतीति खण्डित नहीं होती, उस प्रकार का वर्णन करना चाहिए। वहां केवल मानुष का एक छलांग में सात समुद्र लांघ जाना असम्भाव्यमान होने के कारण 'अनृत' के रूप में हृदय में प्रतीत होता हुआ उपदेश्य चतुर्वर्ग के उपाय की भी अलीकता को बुद्धि में निविष्ट करता है। परन्तु राम