भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 423

तृतीय उद्योतः ३६३ ध्वन्यालोकः अत एव च भरते प्रख्यातवस्तुविषयत्वं प्रख्यातोदात्तनायकत्वं च नाटकस्यावश्यककर्तव्यतयोपन्यस्तम् । तेन हि नायकौचित्यानौचि- त्यविषये कविर्न व्यामुह्यति । यस्तूत्पाद्यवस्तु नाटकादि कुर्यात्तस्याप्र- सिद्धानुचितनायकस्वभाववर्णने महान् प्रमादः । ननु यद्युत्साहादिभाववर्णने कथञ्चिद्दिव्यमानुष्याद्यौचित्यपरीक्षा क्रियते तत्क्रियताम्, रत्यादौ तु किं तया प्रयोजनम् ? रतिर्हि भारत- वर्षोचितेनैव व्यवहारेण दिव्यानामपि वर्णनीयेति स्थितिः । नैवम्; तत्रौचित्यातिक्रमेण सुतरां दोषः । तथा ह्यधमप्रकृत्यौचित्येनोत्तम- प्रकृतेः शृङ्गारोपनिबन्धने का भवेन्नोपहास्यता । त्रिविधं प्रकृत्यौचि- त्यं भारते वर्षेऽप्यस्ति शृङ्गारविषयम् । यत्तु दिव्यमौचित्यं तत्तत्रानुप- इसी लिए भरत ने नाटक का प्रख्यात वस्तुविषय वाला होना और प्रख्यात उदात्त नायक वाला होना, अवश्यकर्तव्यरूप से उपन्यस्त किया है । इस कारण नायक के औचित्य-अनौचित्य के विषय में कवि व्यामोह प्राप्त नहीं करता । परन्तु जो (कवि) कल्पित कथावस्तु वाले नाटक आदि बनाता है उसका अप्रसिद्ध एवं अनुचित नायक-स्वभाव के वर्णन में महान् प्रमाद है । (शङ्का) यदि उत्साह आदि भावों के वर्णन में किसी प्रकार दिव्य, मानुष्य आदि औचित्य की परीक्षा करते हैं तो कीजिए, परन्तु रत्यादि में उससे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि यह नियम है कि दिव्यों की भी रति का वर्णन भारतवर्ष के उचित व्यवहार से ही करना चाहिए । (समाधान) ऐसा नहीं; उसमें औचित्य के अतिक्रम से सुतरां दोष होगा। जैसा कि अधम-प्रकृति के औचित्य से उत्तमप्रकृति के शृङ्गार के निबन्धन में क्या उपहास्यता न होगी ? भारतवर्ष में भी शृङ्गार के विषय का प्रकृत्यौ- लोचनम् विधमपि चरितं पूर्वप्रसिद्धिपरम्परोपचितसम्प्रत्ययोपारूढमसत्यतया न चकास्ति । अत एव तस्यापि यदा प्रभावान्तरमुत्प्रेक्ष्यते तदा तादृशमेव । न त्वसम्भावना- पदं वर्णनीयमिति । तेन हीति । प्रख्यातोदात्तनायकवस्तुत्वेन । व्यामुह्यतीति किं वर्णयेयमिति । यस्त्विति कविः । महान् प्रमाद इति । तेनोत्पाद्यवस्तु नाट- आदि का उस प्रकार का भी चरित पूर्वप्रसिद्धि की परम्परा से उपचित विश्वास द्वारा उपारूढ होने के कारण असत्य रूप से नहीं प्रतीत होता । अतएव जब उसके भी अन्य प्रभाव की कल्पना करेंगे तब उसी प्रकार होगा । असम्भावना के स्थान का वर्णन नहीं करना चाहिए । इस कारण—। प्रख्यात उदात्त नायक की कथा होने के कारण । व्यामोह प्राप्त करता है—क्या वर्णन करूँ ? जो कवि । महान् प्रमाद—। इस लिए