भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

३६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कारकमवेति चेत्--न वयं दिव्यमौचित्यं शृङ्गारविषयमन्यत्किञ्चिद्- ब्रूमः । किं तर्हि ? भारतवर्षविषये यथोत्तमानायकेषु राजादिषु शृङ्गा- रोपनिवन्धस्तथा दिव्याश्रयोऽपि शोभते । न च राजादिषु प्रसिद्ध- ग्राम्यशृङ्गारोपनिवन्धनं प्रसिद्धं नाटकादौ, तथैव देवेषु तत्परिहर्तव्य- म् । नाटकादेरभिनेयार्थत्वादभिनयस्य च सम्भोगशृङ्गारविषयस्या- चित्य तीन प्रकार का है । जो कि दिव्य औचित्य है वह उसमें उपकारक ही नहीं, यदि यह कहो तो हम शृङ्गार के विषय के दिव्य औचित्य को कुछ अतिरिक्त नहीं कहते हैं । तो क्या है ? भारतवर्ष देश में जैसे उत्तम नायक राजा आदि में शृङ्गार का निबन्धन शोभा देता है उसी प्रकार दिव्य के सम्बन्ध में भी । नाटक आदि में राजा आदि के सम्बन्ध में प्रसिद्ध ग्राम्य शृङ्गार का उपनिबन्धन प्रसिद्ध नहीं है, उसी प्रकार देवताओं के सम्बन्ध में उसका परिहार कर देना चाहिए । नाटक आदि अभि- नेयार्थ होते हैं, और उनमें सम्भोग शृङ्गार के विषय के अभिनय का असभ्य होने के कारण परिहार है यदि यहाँ कहो तो नहीं क्योंकि यदि इस प्रकार के विषय के लोचनम् कादि न निरूपितं मुनिनेति न कर्तव्यमिति तात्पर्यम् । आदिशब्दः प्रकारे, डिमादेः प्रसिद्धदेवचरितस्य संग्रहार्थः । अन्यस्तु—'उपलक्षणमुक्तो बहुव्रीहिरिति प्रकरणमत्रोक्तमि'त्याह । 'नाटि- कादि' इति वा पाठः । तत्रादिग्रहणं प्रकारसूचकम्, तेन मुनिनिरूपिते नाटिका- लक्षणे 'प्रकरणनाटकयोगादुत्पाद्यं वस्तु नायको नृपतिः' इत्यत्र यथासंख्येन प्रख्यातोदात्तनृपतिनायकत्वं बोद्धव्यमिति भावः । कथं तर्हि सम्भोगशृङ्गारः कविना निबध्यतामित्याशङ्क्याह—न चेति । तथैवेति । मुनिनापि स्थाने स्थाने उत्पाद्य ( कल्पित ) कथानक वाले नाटक आदि का मुनि ने निरूपण नहीं किया है, अतः नहीं करना चाहिए, यह तात्पर्य है । 'आदि' शब्द 'प्रकार' के अर्थ में है, 'डिम' आदि प्रसिद्ध देवचरित के सङ्ग्रहार्थ है । अन्य ( व्याख्याकार ) तो कहते हैं कि उपलक्षण रूप में बहुव्रीहि समास कहा गया है, अतः यहां 'प्रकरण' कहा गया है ( प्रकार या सादृश्य नहीं ) । अथवा 'नाटिकादि' यह पाठ है । वहां 'आदि' ग्रहण 'प्रकार' का सूचक है, इस लिए मुनि द्वारा निरूपित 'नाटिका' के लक्षण में 'प्रकरण और नाटक को मिला कर कथावस्तु उत्पाद्य ( कल्पित ) होता है और नायक राजा होता है' यहां क्रम से प्रख्यात एवं उदात्त राजा का नाय- कत्व समझना चाहिए, यह भाव है । कैसे कवि द्वारा सम्भोग शृङ्गार का उपनिबन्धन हो ? यह आशङ्का करके कहते हैं—सम्भोग शृङ्गार का—। उसी प्रकार—। 'स्थैर्य से उत्तम, मध्यम, अधम तथा नीचों के सम्भ्रम से' इत्यादि' कहते हुए मुनि ने भी स्थान-स्थान