भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 425

तृतीय उद्योतः ३६५ ध्वन्यालोकः सभ्यत्वात्तत्र परिहार इति चेत्—न; यद्यभिनयस्यैवंविषयस्यासभ्यता तत्काव्यस्यैवंविषयस्य सा केन निवार्यते ? तस्मादभिनेयार्थेऽनभिनेयार्थे वा काव्ये यदुत्तमप्रकृते राजादेरुत्तमप्रकृतिभिर्नायिकाभिः सह ग्राम्य- सम्भोगवर्णनं तत्पित्रोः सम्भोगवर्णनमिव सुतरामसभ्यम् । तथैवो- त्तमदेवतादिविषयम् । न च सम्भोगशृङ्गारस्य सुरतलक्षण एवैकः प्रकारः, यावदन्ये- ऽपि प्रभेदाः परस्परप्रेमदर्शनादयः सम्भवन्ति, ते कस्मादुत्तमप्रकृति- विषये न वर्ण्यन्ते ? तस्मादुत्साहवद्रतावपि प्रकृत्यौचित्यमनुसर्तव्यम् । तथैव विस्मयादिषु । यस्त्वेवंविधे विषये महाकवीनाप्यसमीक्ष्यकारिता लक्ष्ये दृश्यते स दोष एव । स तु शक्तितिरस्कृतत्वात्तेषां न लक्ष्यत इत्युक्तमेव । अनुभावौचित्यं तु भरतादौ प्रसिद्धमेव । इयत्तूच्यते—भरतादिविरचितां स्थितिं चानुवर्तमानैन महाकवि- अभिनय की असभ्यता हो तो इस प्रकार के विषय के काव्य की उस (असभ्यता) का कौन निवारण कर सकता है ? इस लिए अभिनेयार्थ अथवा अनभिनेयार्थ काव्य में जो उत्तमप्रकृति राजा आदि का उत्तमप्रकृति नायिकाओं के साथ ग्राम्य सम्भोग का वर्णन है वह पिता-माता के सम्भोगवर्णन की भांति सुतरां असभ्य है । उसी प्रकार उत्तम देवता आदि के सम्बन्ध का । सम्भोग शृङ्गार का सुरत रूप एक ही प्रकार नहीं है, परस्पर प्रेम, दर्शन आदि अन्य प्रभेद भी हो सकते हैं । उत्तम प्रकृति के विषय में उन्हें क्यों नहीं वर्णन करते हैं ? इस कारण उत्साह की भांति रति में भी प्रकृत्यौचित्य का अनुसरण करना चाहिए । उसी प्रकार विस्मय आदि में । परन्तु जो कि इस प्रकार के विषय में महा- कवियों की भी असमीक्ष्यकारिता देखी जाती है वह दोष ही है । किन्तु शक्तितिरस्कृत होने के कारण उनका वह लक्षित नहीं होता, यह कह ही चुके हैं । अनुभाव का औचित्य तो भरत आदि में प्रसिद्ध ही है । परन्तु इतना कहते हैं—भरत आदि द्वारा रचित मर्यादा का अनुवर्तन करते लोचनम् प्रकृत्यौचित्यमेव विभावानुभावादिषु बहुतरं प्रमाणीकृतं 'स्थैर्येणोत्तममध्य- माधमानां नीचानां सम्भ्रमेण' इत्यादि वदता । इयत्त्विति । लक्षणज्ञत्वं लक्ष्यपरिशीलनमदृष्टप्रसादोदितस्वप्रतिभाशालित्वं पर विभाव, अनुभाव आदि में प्रकृत्यौचित्य को ही बहुत प्रकार से प्रमाणित किया है । परन्तु इतना—। लक्षणज्ञता, लक्ष्य के परिशीलन, अदृष्ट (अर्थात् देवता आदि) की