भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 426

३६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रबन्धांश्च पर्यालोचयता स्वप्रतिभां चानुसरता कविनावहितचेतसा भूत्वा विभावाद्यौचित्यांशपरित्यागे परः प्रयत्नो विधेयः । औचि- त्यवतः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा ग्रहो व्यञ्जक इत्यनेनैतत् प्रतिपादयति—यदितिहासादिषु कथासु रसवतीषु विविधासु सती- ष्वापि यत्तत्र विभावाद्यौचित्यवत्कथाशरीरं तदेव ग्राह्यं नेतरत् । वृत्ता- दपि च कथाशरीरादुत्प्रेक्षिते विशेषतः प्रयत्नवता भवितव्यम् । तत्र ह्यनवधानात्स्खलतः कवेरव्युत्पत्तिसम्भावना महती भवति । परिकरश्लोकश्चात्र— कथाशरीरमुत्पाद्यवस्तु कार्यं तथा तथा । यथा रसमयं सर्वमेव तत्प्रतिभासते ॥ हुए, महाकवियों के प्रबन्धों के पर्यालोचन करते हुए और अपनी प्रतिभा का अनुसरण करते हुए कवि को चित्त को अवहित करके विभाव आदि के औचित्य के अंश के परित्याग में खूब प्रयत्न करना चाहिए । वृत्त ( ऐतिहासिक ) अथवा उत्प्रेक्षित ( कल्पित ) औचित्ययुक्त कथाशरीर का ग्रहण व्यञ्जक होता है, इससे यह प्रतिपादन करते हैं कि इतिहास आदि रसीली कथाओं के विविध होने पर भी जो वहां विभाव आदि के औचित्य से युक्त कथाशरीर है उसे ही ग्रहण करना चाहिए, इतर को नहीं । वृत्त ( ऐतिहासिक ) कथाशरीर से भी विशेष रूप से उत्प्रेक्षित (कल्पित कथाशरीर) में प्रयत्नशील होना चाहिए । क्योंकि वहां अनवधान के कारण स्खलित होते हुए कवि की अव्युत्पत्ति की सम्भावना बहुत होती है । और यहां परिकर-श्लोक है— कथाशरीर को उस-उस प्रकार कल्पित करना चाहिए जिस प्रकार सभी वह रसमय मालूम पड़े ।' लोचनम् चानुसर्तव्यमिति संक्षेपः । रसवतीष्वित्यनादरे सप्तमी । रसत्त्वं चाविवेचक- जनाभिमानाभिप्रायेण मन्तव्यम् । विभावाद्यौचित्येन हि विना का रसवत्ता । कवेरिति । न हि तत्रेतिहासवशादेव मया निबद्धमिति जात्युत्तरमपि सम्भ- प्रसन्नता से उत्पन्न निजी प्रतिभाशालित्व का अनुसरण करना चाहिए, यह संक्षेप है । 'रसीली कथाओं में' यहां अनादर में सप्तमी है । 'रसीली होना' अविवेचक जनों के अभिमान के अभिप्राय से मानना चाहिए । विभावादि के औचित्य के बिना रसीलापन ( रसवत्ता ) कैसा ? कवि की—। वहां ( स्वयं उत्प्रेक्षित कथाशरीर में ) इतिहास के वश से ही मैंने निबन्धन किया है यह असमीचीन उत्तर भी नहीं सम्भव है । वहां—।