ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३६७ ध्वन्यालोकः तत्र चाभ्युपायः सम्यग्विभावाद्यौचित्यानुसरणम् । तच्च दर्शि- तमेव । किञ्च— सन्ति सिद्धरसप्रख्या ये च रामायणादयः । कथाश्रया न तैर्योज्या स्वेच्छा रसविरोधिनी ॥ तेषु हि कथाश्रयेषु तावत्स्वेच्छैव न योज्या । यदुक्तम्—'कथा- मार्गे न चाल्पोऽप्यतिक्रमः' । स्वेच्छापि यदि योज्या तद्रसविरोधिनी न योज्या । सम्यक् प्रकार से विभाव आदि के औचित्य का अनुसरण वहां उपाय है । और उसे दिखाया ही है । और भी— 'सिद्धरस रूप में प्रख्यात रामायण आदि जो कथा के आश्रय हैं उनके साथ रस के प्रतिकूल अपनी इच्छा की योजना नहीं करनी चाहिए ।' उन कथा के आश्रयों में अपनी इच्छा की ही योजना नहीं करनी चाहिए । क्योंकि कहा है—'कथा के मार्ग में थोड़ा भी अतिक्रम नहीं है' । यदि अपनी इच्छा की भी योजना करे तो रस के प्रतिकूल ( इच्छा ) की योजना न करे । लोचनम् वति । तत्र चेति । रसमयत्वसम्पादने । सिद्धेति । सिद्धः आस्वादमात्रशेषो न तु भावनीयो रसो येषु । कथानामाश्रया इतिहासाः, तैरितिहासार्थैः तैस्सह स्वेच्छा न योज्या । सहार्थश्चात्र विषयविषयिभाव इति व्याचष्टे—तेष्विति सप्तम्या । स्वेच्छा तेषु न योज्या, कथञ्चिद्वा यदि योज्यते तत्तत्प्रसिद्धरसविरुद्धा न योज्या । यथा रामस्य धीरललितत्वयोजनेन नाटिकानायकत्वं कश्चित्कुर्या- दिति त्वत्यन्तासमञ्जसम् । यदुक्तमिति । रामाभ्युदये यशोवर्मणा—'स्थित- रसमयता के सम्पादन में । सिद्ध— । सिद्ध अर्थात् आस्वादमात्र शेष, न कि भावनीय रस है जिनमें । कथाओं के आश्रय अर्थात् इतिहास, उन इतिहास के अर्थों के साथ अपनी इच्छा की योजना नहीं करनी चाहिए । और 'साथ' का अर्थ यहां विषय-विषयी- भाव है यह व्याख्यान करते हैं—'उन कथा के आश्रयों में' इस सप्तमी से । अपनी इच्छा की उनमें योजना नहीं करनी चाहिए, अथवा यदि किसी प्रकार योजना करते हैं तो उस प्रसिद्ध रस के विरुद्ध योजना नहीं करनी चाहिए । जैसे राम को धीरललित बनाकर कोई ( कवि ) नाटिका का नायक बनाये तो अत्यन्त असमञ्जस होगा । क्योंकि कहा है—। 'रामाभ्युदय' में यशोवर्मा ने—'स्थितमिति यथा शय्याम्' । कालिदास—।