भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 428

३६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इदमपरं प्रबन्धस्य रसाभिव्यञ्जकत्वे निवन्धनम् । इतिवृत्तवशा- यातां कश्चिद्रसाननुगुणां स्थितिं त्यक्त्वा पुनरुत्प्रेक्ष्याप्यन्तराभीष्ट- रसोचितकथोन्नयो विधेयः यथा कालिदासप्रबन्धेषु । यथा च सर्व- सेनविरचिते हरिविजये । यथा च मदीय एवार्जुनचरिते महाकाव्ये । कविना काव्यमुपनिबध्नता सर्वात्मना रसपरतन्त्रेण भवितव्यम् । तत्रे- तिवृत्ते यदि रसाननुगुणां स्थितिं पश्येत्तदेमां भङ्क्त्वापि स्वतन्त्रतया रसानुगुणं कथान्तरमुत्पादयेत् । न हि कवेरितिवृत्तमात्रनिर्वहणेन किञ्चित्प्रयोजनम्, इतिहासादेव तत्सिद्धेः । रसादिव्यञ्जकत्वे प्रबन्धस्य चेदमन्यन्मुख्यं निबन्धनं, यत्सन्धीनां प्रबन्ध के रसाभिव्यञ्जक होने में यह दूसरा निबन्धन है। इतिहास के प्रसङ्ग से आई किसी प्रकार की रस के प्रतिकूल स्थिति को छोड़ कर पुनः उत्प्रेक्षा करके भी बीच में अभीष्ट रस के उचित कथा का उन्नयन कर लेना चाहिए, जैसे कालिदास आदि के प्रबन्धों में। और जैसे सर्वसेन-विरचित 'हरिविजय' में। और जैसे मेरे ही 'अर्जुनचरित महाकाव्य' में। काव्य का निर्माण करते हुए कवि को सब प्रकार से रस के अधीन होना चाहिए। उस इतिवृत्त में यदि रस के प्रतिकूल स्थिति देखे तब उसे तोड़ कर भी स्वतन्त्र रूप से रसके अनुकूल कथान्तर का उत्पादन करे। क्योंकि कवि का इतिवृत्त मात्र के निर्वहण से कुछ प्रयोजन नहीं है, क्योंकि इतिहास से ही उसकी सिद्धि हो जाती है। प्रबन्ध के रसादिव्यञ्जक होने में अन्य मुख्य कारण यह है कि मुख, प्रतिमुख, लोचनम् मिति यथा शय्याम्' कालिदासेति । रघुवंशेऽजादीनां राज्ञां विवाहादिवर्णनं नेतिहासेषु निरूपितम्। हरिविजये कान्तानुनयनाङ्गत्वेन पारिजातहरणादि- निरूपितमितिहासेष्वदृष्टमपि । तथार्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालविजयादि वर्ण- तमितिहासाप्रसिद्धम् । एतदेव युक्तमित्याह—कविनेति । सन्धीनामिति । इह प्रभुसम्मितेभ्यः श्रुतिस्मृतिप्रभृतिभ्यः कर्तव्यमिदमित्याज्ञामात्रपरमार्थेभ्यः 'रघुवंश' में अज आदि राजाओं के विवाह का वर्णन इतिहासों में निरूपित नहीं है। 'हरिविजय' में प्रियतमा के अनुनयन के अङ्ग रूप से पारिजातहरण आदि का निरूपण किया गया है (जो) इतिहास में देखा भी नहीं गया। उस प्रकार 'अर्जुनचरित' में इतिहास में अप्रसिद्ध अर्जुन द्वारा पाताल-विजय आदि का वर्णन किया गया है। यही ठीक है यह कहते हैं—कवि को—। सन्धियों—। यहां प्रभुसम्मित श्रुति, स्मृति प्रभृति 'यह करना चाहिए' वह आज्ञामात्र परमार्थ वाले शास्त्रों से जो व्युत्पत्ति प्राप्त नहीं हैं और