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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

३५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
त्वात् । कथायां तु विकटबन्धप्राचुर्येऽपि गद्यस्य रसबन्धोक्तमौचित्य-
मनुसर्तव्यम् ॥ ८ ॥
रसबन्धोक्तमौचित्यं भाति सर्वत्र संश्रिता ।
रचना विषयापेक्षं तत्तु किञ्चिद्विभेदवत् ॥ ९ ॥
अथवा पद्यवद्गद्यबन्धेऽपि रसबन्धोक्तमौचित्यं सर्वत्र संश्रिता रचना
भवति । तत्तु विषयापेक्षं किञ्चिद्विशेषवद्भवति, न तु सर्वाकारम् । तथा
हि गद्यबन्धेऽप्यतिदीर्घसमासा रचना न विप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोराख्या-
होता है। किन्तु कथा में गद्य की विकट रचना के प्राचुर्य होने पर भी रस के
निबन्धन के उक्त औचित्य का अनुसरण करना चाहिए ॥ ८ ॥
रसबन्ध में कहे गए औचित्य के सर्वत्र आश्रित रचना शोभा देती है, किन्तु
विषयगत (औचित्य) के अनुसार उसमें कुछ भेद हो जाता है ॥ ९ ॥
अथवा पद्य की भांति गद्यबन्ध में भी रसबन्ध में कहे गए औचित्य के सर्वत्र
आश्रित रचना शोभा देती है, किन्तु उसमें विषयगत (औचित्य) के अनुसार कुछ
विशेष हो जाता है, सब प्रकार से नहीं। जैसा कि गद्यबन्ध में भी दीर्घसमासा रचना
विप्रलम्भ शृङ्गार और करुण में आख्यायिका में भी नहीं शोभा देती। नाटक आदि में
लोचनम्
स्थितपक्षन्तु दर्शयति—रसबन्धोक्तमिति । वृत्तौ च वाशब्दोऽस्यैव पक्षस्य
स्थितिद्योतकः । यथा—
स्त्रियो नरपतिर्वह्निर्विषं युक्त्या निषेवितम् ।
स्वार्थाय यदि वा दुःखसम्भारायैव केवलम् ॥ इति ।
रचना सङ्घटना । तर्हि विषयौचित्यं सर्वथैव त्यक्तं नेत्याह—तदेव रसौ-
चित्यं विषयं सहकारितयापेक्ष्य किञ्चिद्विभेदोऽवान्तरवैचित्र्यं विद्यते यस्य
सम्पाद्यत्वेन तादृशं भवति । एतद्व्याचष्टे–तत्त्विति । सर्वाकारमिति क्रियाविशे-
स्थितपक्ष को दिखाते हैं—रसबन्ध में कहे गए—। वृत्ति में 'अथवा' शब्द इसी
पक्ष की स्थिति का द्योतक है। जैसे—
स्त्रियो नरपतिर्वह्निर्विषं युक्त्या निषेवितम् ।
स्वार्थाय यदि वा दुःखसम्भारायैव केवलम् ॥
स्त्री, राजा, अग्नि और विष युक्तिपूर्वक सेवन किए जाने पर स्वार्थ के लिए होते
हैं, अथवा केवल दुःखसम्भार के लिए ही होते हैं।
रचना अर्थात् सङ्घटना । तो विषयगत औचित्य को सर्वथा नहीं छोड़ा है, यह
कहते हैं—वही रस का औचित्य विषय को सहकारी रूप से अपेक्षा करके कुछ विभेद
अर्थात् अवान्तर-वैचित्र्य है जिसका सम्पाद्य रूप से उस प्रकार का होता है। इसका

तृतीय उद्योतः ३५९ ध्वन्यालोकः यिकायामपि शोभते । नाटकादावप्यसमासैव न रौद्रवीरादिवर्णने । विषयापेक्षं त्वौचित्यं प्रमाणतोऽपकृष्यते प्रकृष्यते च । तथा ह्याख्यायि- कायां नात्यन्तमसमासा स्वविषयेऽपि नाटकादौ नातिदीर्घसमासा चेति सङ्घटनाया दिगनुसर्तव्या ॥ ९ ॥ इदानीमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिः प्रबन्धात्मा रामायणमहाभार- तादौ प्रकाशमानः प्रसिद्ध एव । तस्य तु यथा प्रकाशनं तत्प्रतिपाद्यते- विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः । विधिः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा ॥ १० ॥ असमासा ही होती है, रौद्र, वीर आदि के वर्णन में नहीं । किन्तु विषयगत औचित्य प्रमाण के अनुसार घट जाता है और बढ़ जाता है । जैसा कि आख्यायिका में अपने विषय में भी अत्यन्त असमासा और नाटक आदि में अतिदीर्घसमासा नहीं होनी चाहिए । इस प्रकार सङ्घटना की दिशा का अनुसरण करना चाहिए ॥ ९ ॥ अब, प्रबन्ध रूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि रामायण, महाभारत आदि में प्रकाश- मान प्रसिद्ध ही है, किन्तु उसका जैसे प्रकाशन है उसे प्रतिपादन करते हैं— विभाव, ( स्थायी ) भाव, अनुभाव, सञ्चारी के औचित्य से सुन्दर, वृत्त ( ऐतिहासिक ) अथवा उत्प्रेक्षित ( कल्पित ) कथाशरीर का निर्माण ॥ १० ॥ लोचनम् षणम् । असमासैवति । सर्वत्रैवेति शेषः । तथा हि वाक्याभिनयलक्षणे 'चूर्ण- पादैः प्रसन्नैः' इत्यादि मुनिरभ्यधात् । अत्रापवादमाह—न चेति । नाटकादा- विति । स्वविषयेऽपीति सम्बन्धः ॥ ६ ॥ एवं सङ्घटनायां चालक्ष्यक्रमो दीप्यत इति निर्णीतम् । प्रबन्धे दीप्यत इति तु निर्विवादसिद्धोऽयमर्थ इति नात्र वक्तव्यं किञ्चिदस्ति । केवलं कविसहृ- दयान् व्युत्पादयितुं रसव्यञ्जने येतिकर्तव्यता प्रबन्धस्य सा निरूप्येत्याशये- नाह—इदानीमिति । इदानीं तत्प्रकारजातं प्रतिपाद्यत इति सम्बन्धः । प्रथमं व्याख्यान करते हैं—किन्तु उसमें—। 'सब प्रकार से' यह क्रियाविशेषण है । असमासा ही—। सर्वत्र ही, यह शेष है । जैसा कि वाक्याभिनय के लक्षण में मुनि ने 'चूर्णपादैः प्रसन्नैः' इत्यादि कहा है । यहां अपवाद कहते हैं—नहीं—। नाटक आदि में—। 'अपने विषय में भी' यह सम्बन्ध है ॥ ९ ॥ इस प्रकार सङ्घटना में भी अलक्ष्यक्रम दीप्त होता है यह निर्णय किया । प्रबन्ध में भी दीप्त होता है यह तो निर्विवाद सिद्ध बात है, अतः इस सम्बन्ध में कुछ वक्तव्य नहीं है । केवल कवियों और सहृदयों को व्युत्पन्न करने के लिए रस के व्यञ्जन में जो प्रबन्ध की इतिकर्तव्यता ( प्रकार ) है वह निरूपणीय है, इस आशय से कहते हैं— अब—। अब उन प्रकारों का प्रतिपादन करते हैं, यह सम्बन्ध है । पहला तो—।

३६० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इतिवृत्तवशायातां त्यक्त्वाऽननुगुणां स्थितिम् । उत्प्रेक्ष्याऽप्यन्तराभीष्टरसोचितकथोन्नयः ॥ ११ ॥ सन्धिसन्ध्यङ्गघटनं रसाभिव्यक्त्यपेक्षया । न तु केवलया शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया ॥ १२ ॥ उद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा । रसस्यारब्धविश्रान्तेरनुसन्धानमङ्गिनः ॥ १३ ॥ अलङ्कृतीनां शक्तावप्यानुरूप्येण योजनम् । प्रबन्धस्य रसादीनां व्यञ्जकत्वे निबन्धनम् ॥ १४ ॥ प्रबन्धोऽपि रसादीनां व्यञ्जक इत्युक्तं तस्य व्यञ्जकत्वे निबन्ध- नम् । प्रथमं तावद्विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः कथाशरीरस्य इतिवृत्त के वश आई हुई (रस के) प्रतिकूल स्थिति को छोड़ कर कल्पना करके भी बीच में अभीष्ट रस के उचित कथा का उन्नयन ॥ ११ ॥ सन्धि और सन्धि के अङ्गों का योजन रस की अभिव्यक्ति की अपेक्षा से (होना चाहिए) न कि केवल शास्त्र की मर्यादा को सम्पन्न करने की इच्छा से ॥ १२ ॥ अवसर पर (रस का) उद्दीपन और प्रशमन, तथा बीच में आरब्ध होकर विश्रान्त होते हुए अङ्गी (प्रधान) रस का अनुसन्धान ॥ १३ ॥ शक्ति (सामर्थ्य) होने पर भी अलङ्कारों का योजन अनुरूपता से (करना चाहिए); यह प्रबन्ध के रसादिव्यञ्जक होने में हेतु है ॥ १४ ॥ प्रबन्ध भी रसादि का व्यञ्जक होता है, यह कह चुके हैं, उसके व्यञ्जक होने में हेतु । पहला (हेतु) तो विभाव, (स्थायी) भाव, अनुभाव, सञ्चारो के औचित्य से सुन्दर कथाशरीर का निर्माण अर्थात् यथायोग्य प्रतिपादनार्थ अभीष्ट रस, भाव आदि की लोचनम् तावदिति प्रबन्धस्य व्यञ्जकत्वे ये प्रकारास्ते क्रमेणैवोपयोगिनः । पूर्वं हि कथा- परीक्षा । तत्राधिकावापः फलपर्यन्ततानयनम्, रसं प्रति जागरणम्, तदुचित- विभावादिवर्णनेऽलङ्कारौचित्यमिति । तत्क्रमेण पञ्चकं व्याचष्टे—विभावेत्या- प्रबन्ध के व्यञ्जक होने में जो प्रकार हैं वे क्रम से ही उपयोगी हैं। पहले कथा की परीक्षा, उसमें अधिक ग्रहण अर्थात् फलपर्यन्त पहुंचाना, रसके प्रति जागरण, उसके उचित विभाव आदि के वर्णन में अलङ्कार का औचित्य । क्रम से उस पञ्चक का व्याख्यान करते हैं—'विभाव' इत्यादि द्वारा । उसका औचित्य—। अर्थात् शृङ्गार के वर्णन की इच्छा वाले को उस प्रकार की कथा का आश्रयण करना चाहिए जिसमें ऋतु,

तृतीय उद्योतः ३६१ ध्वन्यालोकः विधिर्यथायथं प्रतिपिपादयिषितरसभावाद्यपेक्षया य उचितो विभावो भावोऽनुभावः सञ्चारी वा तदौचित्यचारुणः कथाशरीरस्य विधिर्व्य- ञ्जकत्वे निबन्धनमेकम् । तत्र विभावौचित्यं तावत्प्रसिद्धम् । भावौचि- त्यं तु प्रकृत्यौचित्यात् । प्रकृतिर्ह्युत्तममध्यमाधमभावेन दिव्यमानुषादि- भावेन च विभेदिनी । तां यथायथमनुसृत्यासङ्कीर्णः स्थायी भाव उपनिबध्यमान औचित्यभाग् भवति । अन्यथा तु केवलमानुषाश्रयेण दिव्यस्य केवलदिव्याश्रयेण वा केवलमानुषस्योत्साहादय उपनिबध्य- माना अनुचिता भवन्ति । तथा च केवलमानुषस्य राजादेर्वर्णने सत्ता- र्णवलङ्घनादिलक्षणा व्यापारा उपनिबध्यमानाः सौष्ठवभृतोऽपि नीरसा एव नियमेन भवन्ति, तत्र त्वनौचित्यमेव हेतुः । अपेक्षा से जो विभाव, (स्थायी) भाव, अनुभाव अथवा सञ्चारी है, उसके औचित्य से सुन्दर कथाशरीर का निर्माण व्यञ्जक होने में एक हेतु है । उनमें विभाव का औचित्य प्रसिद्ध है । भाव का औचित्य प्रकृति के औचित्य से होता है । प्रकृति उत्तम, मध्यम, अधम भाव से और दिव्य, मानुष आदि भाव से विभिन्न होती है । उसे यथायोग्य अनुसरण करके असङ्कीर्ण स्थायी भाव उपनिबध्यमान होकर औचित्य- युक्त होता है । अन्यथा केवल मानुष के आश्रय से दिव्य के अथवा केवल दिव्य के आश्रय से केवलमानुष के उत्साह आदि उपनिबध्यमान होकर अनुचित होते हैं । जैसा कि केवलमानुष राजा आदि के वर्णन में सात समुद्रों का पार करना आदि रूप व्यापार उपनिबध्यमान होकर सौष्ठवयुक्त होने पर भी नीरस ही नियमतः होते हैं, उसमें तो अनौचित्य ही हेतु है । लोचनम् दिना । तदौचित्येति । शृङ्गारवर्णनेच्छुना तादृशी कथा संश्रयणीया यस्यामृतु- माल्यादेर्विभावस्य लीलादेरनुभावस्य हर्षधृत्यादेः सञ्चारिणः स्फुट एव सद्भाव इत्यर्थः । प्रसिद्धमिति । लोके भरतशास्त्रे च । व्यापार इति । तद्विषयोत्साहो- पलक्षणमेतत् । स्थाय्यौचित्यं हि व्याख्येयत्वेनोपक्रान्तं नानुभावौचित्यम् । सौष्ठवभृतोऽपीति । वर्णनामहिम्नेत्यर्थः । तत्र त्विति नीरसत्वे । माल्य आदि विभाव का, लीला आदि अनुभाव का, हर्ष, धृति आदि सञ्चारी का स्पष्ट ही सद्भाव हो । प्रसिद्ध—। लोक में और भरतशास्त्र में । व्यापार—। उस विषय के उत्साह का यह उपलक्षण है । क्योंकि स्थायी का औचित्य व्याख्येय रूप से उपक्रान्त है न कि अनुभाव का औचित्य । सौष्ठवयुक्त होने पर भी—। अर्थात् वर्णना की महिमा से । उसमें तो—। अर्थात् नीरसत्व में ।

३६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ननु नागलोकगमनादयः सातवाहनप्रभृतीनां श्रूयन्ते, तदलो- कसामान्यप्रभावातिशयवर्णने किमनौचित्यं सर्वोर्वीभरणक्षमाणां क्ष्मा- भुजामिति । नतदस्ति ; न वयं ब्रूमो यत्प्रभावातिशयवर्णनममुचितं राज्ञाम्, किं तु केवलमानुषाश्रयेण योत्पाद्यवस्तुकथा क्रियते तस्यां दिव्यमौचित्यं न योजनीयम् । दिव्यमानुष्यायां तु कथायामुभयौचित्य- योजनमविरुद्धमेव । यथा पाण्ड्वादिकथायाम् । सातवाहनादिषु तु येषु यावदपदानं श्रूयते तेषु तावन्मात्रमनुगम्यमानमनुगुणत्वेन प्रतिभासते। व्यतिरिक्तं तु तेषामेवोपनिबध्यमानमनुचितम् । तदयमत्र परमार्थः— अनौचित्यादृते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम् । प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥ (शंका) सातवाहन प्रभृति (राजाओं) के नागलोकगमन आदि (कार्य) सुने जाते हैं, तो समस्त पृथिवी के भरण में समर्थ राजाओं के अलोकसामान्य अति- शय प्रभाव के वर्णन में क्या वह अनौचित्य है ! (समाधान) यह नहीं है; हम नहीं कहते हैं कि राजाओं के अतिशय प्रभाव का वर्णन अनुचित है, किन्तु केवलमानुष के आश्रय से जो उत्पाद्य (कल्पित) वस्तुकथा रची जाती है उसमें दिव्य औचित्य की योजना नहीं करनी चाहिए । परन्तु दिव्यमानुष कथा में उभय प्रकार के औचित्य का योजन अविरुद्ध ही है। जैसे पाण्डु आदि की कथा में। किन्तु जिन सातवाहन आदि में जितना अपदान (पूर्व वृत्तान्त) सुना जाता है उनमें उतने मात्र तक अनुगमन करना अनुकूल रूप से मालूम पड़ता है। परन्तु उनका ही उससे व्यतिरिक्त का वर्णन अनुचित हो जाता है। तो यह यहां परमार्थ है— 'अनौचित्य को छोड़ कर कोई दूसरा रसभङ्ग का कारण नहीं है, और प्रसिद्ध औचित्य का योजन रस की परा उपनिषद् है।' लोचनम् व्यतिरिक्तं त्विति । अधिकमित्यर्थः । एतदुक्तं भवति—यत्र विनेयानां प्रतीतिखण्डना न जायते तादृग्वर्णनीयम् । तत्र केवलमानुषस्य एकपदे सप्ताणँवलङ्घनमसम्भाव्यमानतयाऽनृतमिति हृदये- स्फुरदुपदेश्यस्य चतुर्वर्गोपायस्याप्यलीकतां बुद्धौ निवेशयति । रामादेस्तु तथा- व्यतिरिक्त—। अर्थात् अधिक। यह कहा गया—जहां विनेय (शिक्षणीय) जनों की प्रतीति खण्डित नहीं होती, उस प्रकार का वर्णन करना चाहिए। वहां केवल मानुष का एक छलांग में सात समुद्र लांघ जाना असम्भाव्यमान होने के कारण 'अनृत' के रूप में हृदय में प्रतीत होता हुआ उपदेश्य चतुर्वर्ग के उपाय की भी अलीकता को बुद्धि में निविष्ट करता है। परन्तु राम

तृतीय उद्योतः ३६३ ध्वन्यालोकः अत एव च भरते प्रख्यातवस्तुविषयत्वं प्रख्यातोदात्तनायकत्वं च नाटकस्यावश्यककर्तव्यतयोपन्यस्तम् । तेन हि नायकौचित्यानौचि- त्यविषये कविर्न व्यामुह्यति । यस्तूत्पाद्यवस्तु नाटकादि कुर्यात्तस्याप्र- सिद्धानुचितनायकस्वभाववर्णने महान् प्रमादः । ननु यद्युत्साहादिभाववर्णने कथञ्चिद्दिव्यमानुष्याद्यौचित्यपरीक्षा क्रियते तत्क्रियताम्, रत्यादौ तु किं तया प्रयोजनम् ? रतिर्हि भारत- वर्षोचितेनैव व्यवहारेण दिव्यानामपि वर्णनीयेति स्थितिः । नैवम्; तत्रौचित्यातिक्रमेण सुतरां दोषः । तथा ह्यधमप्रकृत्यौचित्येनोत्तम- प्रकृतेः शृङ्गारोपनिबन्धने का भवेन्नोपहास्यता । त्रिविधं प्रकृत्यौचि- त्यं भारते वर्षेऽप्यस्ति शृङ्गारविषयम् । यत्तु दिव्यमौचित्यं तत्तत्रानुप- इसी लिए भरत ने नाटक का प्रख्यात वस्तुविषय वाला होना और प्रख्यात उदात्त नायक वाला होना, अवश्यकर्तव्यरूप से उपन्यस्त किया है । इस कारण नायक के औचित्य-अनौचित्य के विषय में कवि व्यामोह प्राप्त नहीं करता । परन्तु जो (कवि) कल्पित कथावस्तु वाले नाटक आदि बनाता है उसका अप्रसिद्ध एवं अनुचित नायक-स्वभाव के वर्णन में महान् प्रमाद है । (शङ्का) यदि उत्साह आदि भावों के वर्णन में किसी प्रकार दिव्य, मानुष्य आदि औचित्य की परीक्षा करते हैं तो कीजिए, परन्तु रत्यादि में उससे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि यह नियम है कि दिव्यों की भी रति का वर्णन भारतवर्ष के उचित व्यवहार से ही करना चाहिए । (समाधान) ऐसा नहीं; उसमें औचित्य के अतिक्रम से सुतरां दोष होगा। जैसा कि अधम-प्रकृति के औचित्य से उत्तमप्रकृति के शृङ्गार के निबन्धन में क्या उपहास्यता न होगी ? भारतवर्ष में भी शृङ्गार के विषय का प्रकृत्यौ- लोचनम् विधमपि चरितं पूर्वप्रसिद्धिपरम्परोपचितसम्प्रत्ययोपारूढमसत्यतया न चकास्ति । अत एव तस्यापि यदा प्रभावान्तरमुत्प्रेक्ष्यते तदा तादृशमेव । न त्वसम्भावना- पदं वर्णनीयमिति । तेन हीति । प्रख्यातोदात्तनायकवस्तुत्वेन । व्यामुह्यतीति किं वर्णयेयमिति । यस्त्विति कविः । महान् प्रमाद इति । तेनोत्पाद्यवस्तु नाट- आदि का उस प्रकार का भी चरित पूर्वप्रसिद्धि की परम्परा से उपचित विश्वास द्वारा उपारूढ होने के कारण असत्य रूप से नहीं प्रतीत होता । अतएव जब उसके भी अन्य प्रभाव की कल्पना करेंगे तब उसी प्रकार होगा । असम्भावना के स्थान का वर्णन नहीं करना चाहिए । इस कारण—। प्रख्यात उदात्त नायक की कथा होने के कारण । व्यामोह प्राप्त करता है—क्या वर्णन करूँ ? जो कवि । महान् प्रमाद—। इस लिए

३६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कारकमवेति चेत्--न वयं दिव्यमौचित्यं शृङ्गारविषयमन्यत्किञ्चिद्- ब्रूमः । किं तर्हि ? भारतवर्षविषये यथोत्तमानायकेषु राजादिषु शृङ्गा- रोपनिवन्धस्तथा दिव्याश्रयोऽपि शोभते । न च राजादिषु प्रसिद्ध- ग्राम्यशृङ्गारोपनिवन्धनं प्रसिद्धं नाटकादौ, तथैव देवेषु तत्परिहर्तव्य- म् । नाटकादेरभिनेयार्थत्वादभिनयस्य च सम्भोगशृङ्गारविषयस्या- चित्य तीन प्रकार का है । जो कि दिव्य औचित्य है वह उसमें उपकारक ही नहीं, यदि यह कहो तो हम शृङ्गार के विषय के दिव्य औचित्य को कुछ अतिरिक्त नहीं कहते हैं । तो क्या है ? भारतवर्ष देश में जैसे उत्तम नायक राजा आदि में शृङ्गार का निबन्धन शोभा देता है उसी प्रकार दिव्य के सम्बन्ध में भी । नाटक आदि में राजा आदि के सम्बन्ध में प्रसिद्ध ग्राम्य शृङ्गार का उपनिबन्धन प्रसिद्ध नहीं है, उसी प्रकार देवताओं के सम्बन्ध में उसका परिहार कर देना चाहिए । नाटक आदि अभि- नेयार्थ होते हैं, और उनमें सम्भोग शृङ्गार के विषय के अभिनय का असभ्य होने के कारण परिहार है यदि यहाँ कहो तो नहीं क्योंकि यदि इस प्रकार के विषय के लोचनम् कादि न निरूपितं मुनिनेति न कर्तव्यमिति तात्पर्यम् । आदिशब्दः प्रकारे, डिमादेः प्रसिद्धदेवचरितस्य संग्रहार्थः । अन्यस्तु—'उपलक्षणमुक्तो बहुव्रीहिरिति प्रकरणमत्रोक्तमि'त्याह । 'नाटि- कादि' इति वा पाठः । तत्रादिग्रहणं प्रकारसूचकम्, तेन मुनिनिरूपिते नाटिका- लक्षणे 'प्रकरणनाटकयोगादुत्पाद्यं वस्तु नायको नृपतिः' इत्यत्र यथासंख्येन प्रख्यातोदात्तनृपतिनायकत्वं बोद्धव्यमिति भावः । कथं तर्हि सम्भोगशृङ्गारः कविना निबध्यतामित्याशङ्क्याह—न चेति । तथैवेति । मुनिनापि स्थाने स्थाने उत्पाद्य ( कल्पित ) कथानक वाले नाटक आदि का मुनि ने निरूपण नहीं किया है, अतः नहीं करना चाहिए, यह तात्पर्य है । 'आदि' शब्द 'प्रकार' के अर्थ में है, 'डिम' आदि प्रसिद्ध देवचरित के सङ्ग्रहार्थ है । अन्य ( व्याख्याकार ) तो कहते हैं कि उपलक्षण रूप में बहुव्रीहि समास कहा गया है, अतः यहां 'प्रकरण' कहा गया है ( प्रकार या सादृश्य नहीं ) । अथवा 'नाटिकादि' यह पाठ है । वहां 'आदि' ग्रहण 'प्रकार' का सूचक है, इस लिए मुनि द्वारा निरूपित 'नाटिका' के लक्षण में 'प्रकरण और नाटक को मिला कर कथावस्तु उत्पाद्य ( कल्पित ) होता है और नायक राजा होता है' यहां क्रम से प्रख्यात एवं उदात्त राजा का नाय- कत्व समझना चाहिए, यह भाव है । कैसे कवि द्वारा सम्भोग शृङ्गार का उपनिबन्धन हो ? यह आशङ्का करके कहते हैं—सम्भोग शृङ्गार का—। उसी प्रकार—। 'स्थैर्य से उत्तम, मध्यम, अधम तथा नीचों के सम्भ्रम से' इत्यादि' कहते हुए मुनि ने भी स्थान-स्थान

तृतीय उद्योतः ३६५ ध्वन्यालोकः सभ्यत्वात्तत्र परिहार इति चेत्—न; यद्यभिनयस्यैवंविषयस्यासभ्यता तत्काव्यस्यैवंविषयस्य सा केन निवार्यते ? तस्मादभिनेयार्थेऽनभिनेयार्थे वा काव्ये यदुत्तमप्रकृते राजादेरुत्तमप्रकृतिभिर्नायिकाभिः सह ग्राम्य- सम्भोगवर्णनं तत्पित्रोः सम्भोगवर्णनमिव सुतरामसभ्यम् । तथैवो- त्तमदेवतादिविषयम् । न च सम्भोगशृङ्गारस्य सुरतलक्षण एवैकः प्रकारः, यावदन्ये- ऽपि प्रभेदाः परस्परप्रेमदर्शनादयः सम्भवन्ति, ते कस्मादुत्तमप्रकृति- विषये न वर्ण्यन्ते ? तस्मादुत्साहवद्रतावपि प्रकृत्यौचित्यमनुसर्तव्यम् । तथैव विस्मयादिषु । यस्त्वेवंविधे विषये महाकवीनाप्यसमीक्ष्यकारिता लक्ष्ये दृश्यते स दोष एव । स तु शक्तितिरस्कृतत्वात्तेषां न लक्ष्यत इत्युक्तमेव । अनुभावौचित्यं तु भरतादौ प्रसिद्धमेव । इयत्तूच्यते—भरतादिविरचितां स्थितिं चानुवर्तमानैन महाकवि- अभिनय की असभ्यता हो तो इस प्रकार के विषय के काव्य की उस (असभ्यता) का कौन निवारण कर सकता है ? इस लिए अभिनेयार्थ अथवा अनभिनेयार्थ काव्य में जो उत्तमप्रकृति राजा आदि का उत्तमप्रकृति नायिकाओं के साथ ग्राम्य सम्भोग का वर्णन है वह पिता-माता के सम्भोगवर्णन की भांति सुतरां असभ्य है । उसी प्रकार उत्तम देवता आदि के सम्बन्ध का । सम्भोग शृङ्गार का सुरत रूप एक ही प्रकार नहीं है, परस्पर प्रेम, दर्शन आदि अन्य प्रभेद भी हो सकते हैं । उत्तम प्रकृति के विषय में उन्हें क्यों नहीं वर्णन करते हैं ? इस कारण उत्साह की भांति रति में भी प्रकृत्यौचित्य का अनुसरण करना चाहिए । उसी प्रकार विस्मय आदि में । परन्तु जो कि इस प्रकार के विषय में महा- कवियों की भी असमीक्ष्यकारिता देखी जाती है वह दोष ही है । किन्तु शक्तितिरस्कृत होने के कारण उनका वह लक्षित नहीं होता, यह कह ही चुके हैं । अनुभाव का औचित्य तो भरत आदि में प्रसिद्ध ही है । परन्तु इतना कहते हैं—भरत आदि द्वारा रचित मर्यादा का अनुवर्तन करते लोचनम् प्रकृत्यौचित्यमेव विभावानुभावादिषु बहुतरं प्रमाणीकृतं 'स्थैर्येणोत्तममध्य- माधमानां नीचानां सम्भ्रमेण' इत्यादि वदता । इयत्त्विति । लक्षणज्ञत्वं लक्ष्यपरिशीलनमदृष्टप्रसादोदितस्वप्रतिभाशालित्वं पर विभाव, अनुभाव आदि में प्रकृत्यौचित्य को ही बहुत प्रकार से प्रमाणित किया है । परन्तु इतना—। लक्षणज्ञता, लक्ष्य के परिशीलन, अदृष्ट (अर्थात् देवता आदि) की

३६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रबन्धांश्च पर्यालोचयता स्वप्रतिभां चानुसरता कविनावहितचेतसा भूत्वा विभावाद्यौचित्यांशपरित्यागे परः प्रयत्नो विधेयः । औचि- त्यवतः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा ग्रहो व्यञ्जक इत्यनेनैतत् प्रतिपादयति—यदितिहासादिषु कथासु रसवतीषु विविधासु सती- ष्वापि यत्तत्र विभावाद्यौचित्यवत्कथाशरीरं तदेव ग्राह्यं नेतरत् । वृत्ता- दपि च कथाशरीरादुत्प्रेक्षिते विशेषतः प्रयत्नवता भवितव्यम् । तत्र ह्यनवधानात्स्खलतः कवेरव्युत्पत्तिसम्भावना महती भवति । परिकरश्लोकश्चात्र— कथाशरीरमुत्पाद्यवस्तु कार्यं तथा तथा । यथा रसमयं सर्वमेव तत्प्रतिभासते ॥ हुए, महाकवियों के प्रबन्धों के पर्यालोचन करते हुए और अपनी प्रतिभा का अनुसरण करते हुए कवि को चित्त को अवहित करके विभाव आदि के औचित्य के अंश के परित्याग में खूब प्रयत्न करना चाहिए । वृत्त ( ऐतिहासिक ) अथवा उत्प्रेक्षित ( कल्पित ) औचित्ययुक्त कथाशरीर का ग्रहण व्यञ्जक होता है, इससे यह प्रतिपादन करते हैं कि इतिहास आदि रसीली कथाओं के विविध होने पर भी जो वहां विभाव आदि के औचित्य से युक्त कथाशरीर है उसे ही ग्रहण करना चाहिए, इतर को नहीं । वृत्त ( ऐतिहासिक ) कथाशरीर से भी विशेष रूप से उत्प्रेक्षित (कल्पित कथाशरीर) में प्रयत्नशील होना चाहिए । क्योंकि वहां अनवधान के कारण स्खलित होते हुए कवि की अव्युत्पत्ति की सम्भावना बहुत होती है । और यहां परिकर-श्लोक है— कथाशरीर को उस-उस प्रकार कल्पित करना चाहिए जिस प्रकार सभी वह रसमय मालूम पड़े ।' लोचनम् चानुसर्तव्यमिति संक्षेपः । रसवतीष्वित्यनादरे सप्तमी । रसत्त्वं चाविवेचक- जनाभिमानाभिप्रायेण मन्तव्यम् । विभावाद्यौचित्येन हि विना का रसवत्ता । कवेरिति । न हि तत्रेतिहासवशादेव मया निबद्धमिति जात्युत्तरमपि सम्भ- प्रसन्नता से उत्पन्न निजी प्रतिभाशालित्व का अनुसरण करना चाहिए, यह संक्षेप है । 'रसीली कथाओं में' यहां अनादर में सप्तमी है । 'रसीली होना' अविवेचक जनों के अभिमान के अभिप्राय से मानना चाहिए । विभावादि के औचित्य के बिना रसीलापन ( रसवत्ता ) कैसा ? कवि की—। वहां ( स्वयं उत्प्रेक्षित कथाशरीर में ) इतिहास के वश से ही मैंने निबन्धन किया है यह असमीचीन उत्तर भी नहीं सम्भव है । वहां—।

तृतीय उद्योतः ३६७ ध्वन्यालोकः तत्र चाभ्युपायः सम्यग्विभावाद्यौचित्यानुसरणम् । तच्च दर्शि- तमेव । किञ्च— सन्ति सिद्धरसप्रख्या ये च रामायणादयः । कथाश्रया न तैर्योज्या स्वेच्छा रसविरोधिनी ॥ तेषु हि कथाश्रयेषु तावत्स्वेच्छैव न योज्या । यदुक्तम्—'कथा- मार्गे न चाल्पोऽप्यतिक्रमः' । स्वेच्छापि यदि योज्या तद्रसविरोधिनी न योज्या । सम्यक् प्रकार से विभाव आदि के औचित्य का अनुसरण वहां उपाय है । और उसे दिखाया ही है । और भी— 'सिद्धरस रूप में प्रख्यात रामायण आदि जो कथा के आश्रय हैं उनके साथ रस के प्रतिकूल अपनी इच्छा की योजना नहीं करनी चाहिए ।' उन कथा के आश्रयों में अपनी इच्छा की ही योजना नहीं करनी चाहिए । क्योंकि कहा है—'कथा के मार्ग में थोड़ा भी अतिक्रम नहीं है' । यदि अपनी इच्छा की भी योजना करे तो रस के प्रतिकूल ( इच्छा ) की योजना न करे । लोचनम् वति । तत्र चेति । रसमयत्वसम्पादने । सिद्धेति । सिद्धः आस्वादमात्रशेषो न तु भावनीयो रसो येषु । कथानामाश्रया इतिहासाः, तैरितिहासार्थैः तैस्सह स्वेच्छा न योज्या । सहार्थश्चात्र विषयविषयिभाव इति व्याचष्टे—तेष्विति सप्तम्या । स्वेच्छा तेषु न योज्या, कथञ्चिद्वा यदि योज्यते तत्तत्प्रसिद्धरसविरुद्धा न योज्या । यथा रामस्य धीरललितत्वयोजनेन नाटिकानायकत्वं कश्चित्कुर्या- दिति त्वत्यन्तासमञ्जसम् । यदुक्तमिति । रामाभ्युदये यशोवर्मणा—'स्थित- रसमयता के सम्पादन में । सिद्ध— । सिद्ध अर्थात् आस्वादमात्र शेष, न कि भावनीय रस है जिनमें । कथाओं के आश्रय अर्थात् इतिहास, उन इतिहास के अर्थों के साथ अपनी इच्छा की योजना नहीं करनी चाहिए । और 'साथ' का अर्थ यहां विषय-विषयी- भाव है यह व्याख्यान करते हैं—'उन कथा के आश्रयों में' इस सप्तमी से । अपनी इच्छा की उनमें योजना नहीं करनी चाहिए, अथवा यदि किसी प्रकार योजना करते हैं तो उस प्रसिद्ध रस के विरुद्ध योजना नहीं करनी चाहिए । जैसे राम को धीरललित बनाकर कोई ( कवि ) नाटिका का नायक बनाये तो अत्यन्त असमञ्जस होगा । क्योंकि कहा है—। 'रामाभ्युदय' में यशोवर्मा ने—'स्थितमिति यथा शय्याम्' । कालिदास—।

३६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इदमपरं प्रबन्धस्य रसाभिव्यञ्जकत्वे निवन्धनम् । इतिवृत्तवशा- यातां कश्चिद्रसाननुगुणां स्थितिं त्यक्त्वा पुनरुत्प्रेक्ष्याप्यन्तराभीष्ट- रसोचितकथोन्नयो विधेयः यथा कालिदासप्रबन्धेषु । यथा च सर्व- सेनविरचिते हरिविजये । यथा च मदीय एवार्जुनचरिते महाकाव्ये । कविना काव्यमुपनिबध्नता सर्वात्मना रसपरतन्त्रेण भवितव्यम् । तत्रे- तिवृत्ते यदि रसाननुगुणां स्थितिं पश्येत्तदेमां भङ्क्त्वापि स्वतन्त्रतया रसानुगुणं कथान्तरमुत्पादयेत् । न हि कवेरितिवृत्तमात्रनिर्वहणेन किञ्चित्प्रयोजनम्, इतिहासादेव तत्सिद्धेः । रसादिव्यञ्जकत्वे प्रबन्धस्य चेदमन्यन्मुख्यं निबन्धनं, यत्सन्धीनां प्रबन्ध के रसाभिव्यञ्जक होने में यह दूसरा निबन्धन है। इतिहास के प्रसङ्ग से आई किसी प्रकार की रस के प्रतिकूल स्थिति को छोड़ कर पुनः उत्प्रेक्षा करके भी बीच में अभीष्ट रस के उचित कथा का उन्नयन कर लेना चाहिए, जैसे कालिदास आदि के प्रबन्धों में। और जैसे सर्वसेन-विरचित 'हरिविजय' में। और जैसे मेरे ही 'अर्जुनचरित महाकाव्य' में। काव्य का निर्माण करते हुए कवि को सब प्रकार से रस के अधीन होना चाहिए। उस इतिवृत्त में यदि रस के प्रतिकूल स्थिति देखे तब उसे तोड़ कर भी स्वतन्त्र रूप से रसके अनुकूल कथान्तर का उत्पादन करे। क्योंकि कवि का इतिवृत्त मात्र के निर्वहण से कुछ प्रयोजन नहीं है, क्योंकि इतिहास से ही उसकी सिद्धि हो जाती है। प्रबन्ध के रसादिव्यञ्जक होने में अन्य मुख्य कारण यह है कि मुख, प्रतिमुख, लोचनम् मिति यथा शय्याम्' कालिदासेति । रघुवंशेऽजादीनां राज्ञां विवाहादिवर्णनं नेतिहासेषु निरूपितम्। हरिविजये कान्तानुनयनाङ्गत्वेन पारिजातहरणादि- निरूपितमितिहासेष्वदृष्टमपि । तथार्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालविजयादि वर्ण- तमितिहासाप्रसिद्धम् । एतदेव युक्तमित्याह—कविनेति । सन्धीनामिति । इह प्रभुसम्मितेभ्यः श्रुतिस्मृतिप्रभृतिभ्यः कर्तव्यमिदमित्याज्ञामात्रपरमार्थेभ्यः 'रघुवंश' में अज आदि राजाओं के विवाह का वर्णन इतिहासों में निरूपित नहीं है। 'हरिविजय' में प्रियतमा के अनुनयन के अङ्ग रूप से पारिजातहरण आदि का निरूपण किया गया है (जो) इतिहास में देखा भी नहीं गया। उस प्रकार 'अर्जुनचरित' में इतिहास में अप्रसिद्ध अर्जुन द्वारा पाताल-विजय आदि का वर्णन किया गया है। यही ठीक है यह कहते हैं—कवि को—। सन्धियों—। यहां प्रभुसम्मित श्रुति, स्मृति प्रभृति 'यह करना चाहिए' वह आज्ञामात्र परमार्थ वाले शास्त्रों से जो व्युत्पत्ति प्राप्त नहीं हैं और

तृतीय उद्योतः ३६९

लोचनम् शास्त्रेभ्यो ये न व्युत्पन्नाः, न चाप्यस्येदं वृत्तमुष्मात्कर्मण इत्येवं युक्तियुक्तक- र्मफलसम्बन्धप्रकटनकारिभ्यो मित्रसम्मितेभ्य इतिहासशास्त्रेभ्यो लब्धव्युत्प- त्तयः, अथ चावश्यं व्युत्पाद्याः प्रजार्थसम्पादनयोग्यताक्रान्ता राजपुत्रप्रायास्ते- षां हृदयानुप्रवेशमुखेन चतुर्वर्गोपायव्युत्पत्तिराधेया। हृदयानुप्रवेशश्च रसास्वा- दमय एव। स च रसश्चतुर्वर्गोपायव्युत्पत्तिनान्तरीयकविभावादिसंयोगप्रसा- दोपन्नत इत्येवं रसोचितविभावाद्युपनिबन्धे रसास्वादवैवश्यमेव स्वरसभावि- न्यां व्युत्पत्तौ प्रयोजकमिति प्रीतिरेव व्युत्पत्तेः प्रयोजिका। प्रीत्यात्मा च रस- स्तदेव नाट्यं नाट्यमेव वेद इत्यस्मदुपाध्यायः। न चैते प्रीतिव्युत्पत्ती भिन्न- रूपे एव, द्वयोरप्येकविषयत्वात्। विभावाद्यौचित्यमेव हि सत्यतः प्रीतेर्निदा- नमित्यसकृदवोचाम। विभावादीनां तद्रसोचितानां यथास्वरूपवेदनं फलप- र्यन्तीभूततया व्युत्पत्तिरित्युच्यते। फलं च नाम यददृष्टवशाद्देवताप्रसादादन्यतो वा जायते। न च तदुपदेश्यम्, तत उपाये व्युत्पत्त्ययोगात्। तेनोपायक्रमेण प्रवृत्तस्य सिद्धिः अनुपायद्वारेण प्रवृत्तस्य नाश इत्येवं नायकप्रतिनायकगत- त्वेनार्थानर्थोपायव्युत्पत्तिः कार्या। उपायश्च कर्त्राश्रीयमाणः पञ्चावस्था भजते। तद्यथा-स्वरूपं, स्वरूपात्किञ्चिदुच्छूनतां, कार्यसम्पादनयोग्यतां, प्रतिबन्धोपनिपातेनाशङ्क्यमानतां, निवृत्तप्रतिपक्षतायां बाधकबाधनेन सुदृढ-

'इस कर्म से इसका यह फल हुआ' इस प्रकार युक्तिपूर्वक कर्म और फल के सम्बन्ध को प्रकट करने वाले मित्रसम्मित इतिहासशास्त्रों से व्युत्पत्ति प्राप्त नहीं हैं अथ च व्युत्पत्ति प्राप्त कराने योग्य हैं एवं प्रजा के कार्य करने की योग्यता रखते हैं उन राजपुत्रों के हृदय में अनुप्रवेश के प्रकार से चतुर्वर्ग के उपाय की व्युत्पत्ति का आधान करना चाहिए। हृदय में अनुप्रवेश रसास्वाद रूप ही होता है। और वह रस चतुर्वर्ग के उपाय की व्युत्पत्ति के नान्तरीयक ( आनुषङ्गिक फल ) वाले विभावादिसंयोग के कारण प्राप्त होता है, इस प्रकार रसोचित विभाव आदि के उपनिबन्धन में रसास्वाद का वैवश्य ही स्वभावतः होने वाली व्युत्पत्ति में प्रयोजक है, अतः प्रीति ही व्युत्पत्ति की प्रयोजिका है। प्रीति रूप रस है, वही नाट्य है, नाट्य ही वेद है यह हमारे उपाध्याय ( का कथन है)। और ये प्रीति एवं व्युत्पत्ति भिन्न रूप नहीं हैं, क्योंकि दोनों का विषय एक है। कई बार हम कह चुके हैं कि विभावादि का औचित्य ही ठीक रूप से प्रीति का निदान है। उस रस के उचित विभावादि का फलपर्यन्तीभूत रूप से स्वरूप के संवेदन को 'व्युत्पत्ति' कहते हैं। और 'फल' वह है जो अदृष्टवश, देवता के प्रसाद से अथवा अन्य से उत्पन्न होता है। वह उपदेश्य नहीं है, क्योंकि उससे उपाय में व्युत्पत्ति नहीं होती। इस कारण उपायक्रम से प्रवृत्त की सिद्धि और अनुपाय द्वारा प्रवृत्त का नाश होता है, इस प्रकार नायक और प्रतिनायकगत अर्थ और अनर्थ की व्युत्पत्ति करनी चाहिए। कर्ता द्वारा आश्रीयमाण उपाय पांच अवस्थाओं को प्राप्त करता है—स्वरूप ( अर्थात् उपाय के अनुष्ठान की अवस्था ), स्वरूप से कुछ उच्छूनता ( अर्थात् कुछ पोषण ), कार्य के सम्पादन की योग्यता, प्रतिबन्धक के आगमन से ( कार्यसिद्धि में ) आशङ्क्य-

२४ ध्व०

३७० सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम् फलपर्यन्तताम् । एवमार्त्तिसहिष्णूनां विप्रलम्भभीरूणां प्रेक्षापूर्वकारिणां तावदेवं कारणोपादानम् । ता एवंविधाः पञ्चावस्थाः कारणगता मुनिनोक्ताः— संसाध्ये फलयोगे तु व्यापारः कारणस्य यः । तस्यानुपूर्व्या विज्ञेयाः पञ्चावस्थाः प्रयोक्तृभिः ॥ प्रारम्भश्च प्रयत्नश्च तथा प्राप्तेश्च सम्भवः । नियता च फलप्राप्तिः फलयोगश्च पञ्चमः ॥ इति । एवं या एताः कारणस्यावस्थास्तत्सम्पादकं यत्कर्त्तुरितिवृत्तं पञ्चधा विभक्तम् । त एव मुखप्रतिमुखगर्भावमर्शनिर्वहणाख्या अन्वर्थनामानः पञ्च सन्धय इतिवृत्तखण्डाः, सन्धीयन्त इति कृत्वा । तेषामपि सन्धीनां स्वनिर्वाहं प्रति तथा क्रमदर्शनादवान्तरभिन्ना इतिवृत्तभागाः । सन्ध्यङ्गानि-‘उपक्षेपः परिकरः परिन्यासो विलोभनम्' इत्यादीनि । अर्थप्रकृतयोऽत्रैवान्तर्भूताः । तथा हि स्वायत्तसिद्धेर्बीजं बिन्दुः कार्यमिति तिस्रः। बीजेन सर्वव्यापाराः बिन्दुनानुसन्धानं कार्येण निर्वाहः सन्दर्शनप्रार्थना- व्यवसायरूपा ह्येतास्तिस्रोऽर्थसम्पाद्ये कर्तुः प्रकृतयः स्वभावविशेषाः । स चवा- यत्तसिद्धित्वे तु सचिवस्य तदर्थमेव वा स्वार्थमेव वा स्वार्थमपि वा प्रवृत्तत्वेन मानता, प्रतिपक्षता (प्रतिकूलता) के न रहने पर बाधक के बाधन द्वारा सुदृढ़ फल- पर्यन्तता । इस प्रकार कष्ट के सहिष्णु, विप्रलम्भ (कार्य की असिद्धि) के भीरु, समझ- बूझकर कार्य करने वालों के कारणों का उपादान है। उन इस प्रकार के कारणगत पांच अवस्थाओं को मुनि ने कहा है— फलयोग के साध्य होने में कारण का जो व्यापार है उसकी आनुपूर्वी से पांच अवस्थाएं प्रयोक्ताओं को जाननी चाहिएँ—आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्ति का सम्भव, नियत फलप्राप्ति और फलयोग । (भरतनाट्य० २१, ७, ९) इस प्रकार जो ये कारण की अवस्थाएं हैं उनको सम्पन्न करने वाला जो कर्ता का इतिवृत्त है वह पांच प्रकार से विभक्त है। वे ही मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श, निर्वहण नामक यथार्थ नामों वाली पांच 'सन्धियां' इतिवृत्त-खण्ड हैं, 'सन्धान की जाती हैं' यह (व्युत्पत्ति) करके । उन सन्धियों के भी स्वनिर्वाह (फल) के प्रति उस प्रकार क्रम देखने से अवान्तरभिन्न इतिवृत्त-भाग हैं। सन्धि के अङ्ग—उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, विलोभन इत्यादि । अर्थप्रकृतियां इसी में अन्तर्भूत हैं। जैसा कि अपने अधीन सिद्धि वाले (कर्ता) की बीज, बिन्दु और कार्य ये तीन हैं। बीज से समस्त व्यापार, बिन्दु से अनुसन्धान और कार्य से निर्वाह विवक्षित हैं, सन्दर्शन, प्रार्थना, व्यवसाय रूप ये तीन सम्पाद्य अर्थ में कर्ता की प्रकृतियां अर्थात् स्वभावविशेष हैं। परन्तु (कर्ता अर्थात् नायक के) सचिव के अधीन सिद्धिवाला होने पर सचिव के उसके (कर्ता के) लिए अथवा अपने लिए अथवा अपने लिए भी प्रवृत्त होने पर प्रकीर्ण और प्रसिद्ध होने के कारण प्रकरी, पताका

तृतीय उद्योतः ३७१

लोचनम्
प्रकीर्णत्वप्रसिद्धत्वाभ्यां प्रकरीपताकाव्यपदेश्यतयोभयप्रकारसम्बन्धी व्यापार-
विशेषः प्रकरीपताकाशब्दाभ्यामुक्त इति । एवं प्रस्तुतफलनिर्व्हाणान्तस्या-
धिकारिकस्य वृत्तस्य पञ्चसन्धित्वं पूर्णसन्ध्यङ्गता च सर्वजनव्युत्पत्तिदायिनी
निबन्धनीया । प्रासङ्गिके त्वितिवृत्ते नायं नियम इत्युक्तम्—
'प्रासङ्गिके परार्थत्वान्न ह्येष नियमो भवेत्'
इति मुनिना । एवं स्थिते रत्नावल्यां धीरललितस्य नायकस्य धर्माविरुद्ध-
सम्भोगसेवायाम नौचित्याभावात्प्रत्युत न निस्सुखः स्यादिति श्लाघ्यत्वात्पृथ्वी-
राज्यमहाफलान्तरानुबन्धिकन्यालाभफलोद्देशेन प्रस्तावनोपक्रमे पञ्चापि
सन्धयोऽवस्थापञ्चकसहिताः समुचितसन्ध्यङ्गपरिपूर्णा अर्थप्रकृतियुक्ता दर्शिता
एव । 'प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनो वृद्धिहेतौ' इति हि बीजादेव प्रभृति 'विश्रान्त-
विग्रहकथः' इति 'राज्यं निर्जितशत्रु' इति च वचोभिः 'उपभोगसेवावसरोऽयम्'
इत्युपक्षेपात्प्रभृति हि निरूपितम् । एतत्तु समस्तसन्ध्यङ्गस्वरूपं तत्पाठपृष्ठे
प्रदर्श्यमानमतितमां ग्रन्थगौरवमावहति । प्रत्येकेन तु प्रदर्श्यमानं पूर्वापरानु-
सन्धानवन्ध्यतया केवलं संमोहदायि भवतीति न विततम् । अस्यार्थस्य
यत्नावधेयत्वेनेष्टत्वात्स्वकण्ठेन यो व्यतिरेक उक्तो 'न तु केवलया' इति
के नाम से उभय प्रकार के सम्बन्ध वाला व्यापार विशेष 'प्रकरी' और 'पताका' शब्द
से कहा गया है । इस प्रकार प्रस्तुत फल के निर्वाह करने तक आधिकारिक कथानक
का पञ्चसन्धित्व और पूर्णसन्ध्यङ्गता सब लोगों को व्युत्पत्ति देनेवाली निबन्धनीय है ।
परन्तु प्रासङ्गिक इतिवृत्त ( कथानक ) में यह नियम नहीं है, यह कहा है—
'परार्थ होने के कारण 'प्रासङ्गिक' में यह नियम लागू नहीं होगा' । मुनि ने ।
ऐसी स्थिति में 'रत्नावली' में धीरललित नायक की धर्मविरुद्ध सम्भोग की सेवा में
अनौचित्य के अभाव के कारण, प्रत्युत 'सुखरहित न हो' इस दृष्टि से श्लाघ्य होने के
कारण, पृथ्वीराज्य के महाफल के बीच में प्राप्त कन्यालाभ के फल के उद्देश्य से प्रस्ता-
वना के उपक्रम में समुचित सन्ध्यङ्गों से युक्त, अर्थप्रकृतियों से युक्त एवं पांच अवस्थाओं
से युक्त पांचों सन्धियां दिखाई गई ही हैं । 'प्रारम्भेऽस्मिन् स्वामिनो वृद्धिहेतोः' इस
बीज से ही लेकर 'विश्रान्तविग्रहकथः' और 'राज्यं निर्जितशत्रु' इन कथनों से, 'उपभोग-
सेवावसरोऽयम्' इस 'उपक्षेप' से लेकर निरूपण किया है । परन्तु इन समस्त सन्धियों के
अङ्गों का स्वरूप ( रत्नावली के पाठों पर ) दिखाने से अत्यधिक ग्रन्थगौरव होगा ।
और एक-एक ( उदाहरण मात्र ) दिखाने पर पूर्वापर के अनुसन्धान के न हो पाने से
केवल सम्मोह उत्पन्न होगा, अतः विस्तार नहीं किया है । इस बात ( रसाभिव्यक्ति
की अपेक्षा से सन्धिसन्ध्यङ्गघटन ) को यत्नपूर्वक अवधेय रूप से इष्ट होने के कारण जो
व्यतिरेक 'न कि केवल०' यह कहा है उसका उदाहरण कहते हैं—न कि—। 'केवल'

३७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
मुखप्रतिमुखगर्भावमर्शनिर्वहणाख्यानां तदङ्गानां चोपक्षेपादीनां घटनं
रसाभिव्यक्त्यपेक्षया, यथा रत्नावल्याम्; न तु केवलं शास्त्रस्थिति-
सम्पादनेच्छया । यथा वेणीसंहारे विलासाख्यस्य प्रतिमुखसन्ध्यङ्ग-
स्य प्रकृतरसनिबन्धाननुगुणमपि द्वितीयेऽङ्के भरतमतानुसरणमात्रेच्छया
घटनम् ।
गर्भ, अवमर्श, निर्वहण नामक सन्धियों और उपक्षेप आदि उनके अङ्गों का रसाभि-
व्यक्ति की अपेक्षा से जोड़ना, जैसे 'रत्नावली' (नाटिका) में; न कि केवल शास्त्र की
मर्यादा के सम्पादन की इच्छा से। जैसे 'वेणीसंहार' में 'विलास' नामक प्रतिमुख-
सन्धि के अङ्ग का प्रकृत रस के निबन्धन के प्रतिकूल भी दूसरे अङ्क में केवल भरत के
मत के अनुसरण की इच्छा से घटन है।
लोचनम्
तस्योदाहरणमाह—न त्विति । केवलशब्दमिच्छाशब्दं च प्रयुञ्जानस्याय-
माशयः—भरतमुनिना सन्ध्यङ्गानां रसाङ्गभूतमितिवृत्तप्राशस्त्योत्पादनमेव
प्रयोजनमुक्तम् । न तु पूर्वरङ्गाङ्गवददृष्टसम्पादनं विघ्नादिवारणं वा । यथोक्तम्—
इष्टस्यार्थस्य रचना वृत्तान्तस्यानपक्षयः ।
रागप्राप्तिः प्रयोगस्य गुह्यानां चैव गूहनम् ॥
आश्चर्यवदभिख्यानं प्रकाश्यानां प्रकाशनम् ।
अङ्गानां षड्विधं ह्येतद् दृष्टं शास्त्रे प्रयोजनम्॥ इति ।
ततश्च—
समीहा रतिभोगार्था विलासः परिकीर्तितः ।
इति प्रतिमुखसन्ध्यङ्गविलासलक्षणे । रतिभोगशब्द आधिकारिकरसस्था-
यिभावोपव्यञ्जकविभावाद्युपलक्षणार्थत्वेन प्रयुक्तः, यथा तत्त्वं नाधिगतार्थ इति,
शब्द और 'इच्छा' शब्द का प्रयोग करते हुए (कारिकाकार) का यह आशय है—
भरतमुनि ने रसाङ्गभूत इतिवृत्त के प्राशस्त्य के उत्पादन को ही सन्ध्यङ्गों का प्रयोजन
कहा है 'पूर्वरङ्ग' के अङ्ग की भांति अदृष्टसम्पादन अथवा विघ्नादिवारण को (कहा
है)। जैसे, कहा है—
'शास्त्र में यह छ प्रकार का अङ्गों का प्रयोजन देखा गया है—इष्ट वस्तु की
रचना, वृत्तान्त का न टूटना, अभिनय का मनोरञ्जक होना, गुप्त बातों को प्रकट न
करना, आश्चर्यकारी बातें कहना और प्रकाशनीय का प्रकाशन करना।
इस कारण—
रतिभोग की इच्छा को 'विलास' कहा गया है।
यह प्रतिमुखसन्धि के अङ्ग 'विलास' के लक्षण में। 'रतिभोग' शब्द आधिकारिक
रस के स्थायी भाव के उपव्यञ्जक विभावादि के उपलक्षक रूप से प्रयुक्त है, (परन्तु

तृतीय उद्योतः ३७३ ध्वन्यालोकः इदं चापरं प्रबन्धस्य रसव्यञ्जकत्वे निमित्तं यदुद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा रसस्य, यथा रत्नावल्यामेव । पुनरारब्धविश्रान्ते रस- स्याङ्गिनोऽनुसन्धिश्च । यथा तापसवत्सराजे । प्रबन्धविशेषस्य नाट- और यह प्रबन्ध के रसव्यञ्जक होने में अपर निमित्त है कि बीच में यथावसर रस का उद्दीपन और प्रशमन करना । जैसे 'रत्नावली' में ही । और आरम्भ किए हुए के विश्रान्त होने लगने पर फिर से अङ्गी (प्रधान) रस का अनुसन्धान कर लेना । जैसे, 'तापसवत्सराज' में । प्रबन्धविशेष नाटक आदि की रसव्यञ्जना का यह और लोचनम् प्रकृतो ह्यत्र वीररसः । उद्दीपन इति । उद्दीपनं विभावादिपरिपूरणया । यथा— 'अयं स राजा उदयणो त्ति' इत्यादि सागरिकायाः । प्रशमनं वासवदत्तातः पलायने । पुनरुद्दीपनं चित्रफलकोल्लेखे । प्रशमनं सुसङ्गताप्रवेशे इत्यादि । गाढं ह्यनवरतपरिमृदितो रसः सुकुमारमालतीकुसुमवद्भटित्येव म्लानिमवलम्बे- त । विशेषतस्तु शृङ्गारः । यदाह मुनिः— यद्वामाभिनिवेशित्वं यतश्च विनिवार्यते । दुर्लभत्वं यतो नार्या कामिनः सा परा रतिः ॥ इति । वीररसादावपि यथावसरमुद्दीपनप्रशमनाभ्यां विना झटित्येवाद्भुतफल- कल्पे साध्ये लब्धे प्रकटीचिकीर्षित उपायोपेयभावो न प्रदर्शित एव स्यात् । पुनरिति । इतिवृत्तवशादारब्धाशङ्क्यमानप्राया न तु सर्वथैवोपनता विश्रान्ति- र्विच्छेदो यस्य स तथा । रसस्येति । रसाङ्गभूतस्य कस्यापीति यावत् । तापस- वत्सराजे हि वासवदत्ताविषयो जीवितसर्वस्वाभिमानात्मा प्रेमबन्धस्तद्दिभावा- वेणीसंहार के रचयिता ने) तत्त्वार्थ को नहीं समझा । यहां (वेणीसंहार में) प्रकृत वीररस है । उद्दीपन—। विभावादि के परिपूरण द्वारा । जैसे—'यह वह राजा उदयन है' सागरिका का । प्रशमन वासवदत्ता से भागने में । पुनः उद्दीपन चित्रफलक के निर्माण में । प्रशमन सुसङ्गता के प्रवेश में, इत्यादि । खूब निरन्तर चर्वणा किया गया रस सुकुमार मालती के पुष्प की भांति झटिति म्लान हो जाता है । विशेष करके शृङ्गार । क्योंकि मुनि कहते हैं— जिस कारण कि प्रतिकूल आचरण की इच्छा, जिस कारण (सम्भोग) निवारण किया जाता है, जिस कारण नारी दुर्लभ होती है, वह कामी की गाढ़ रति है । वीररस आदि में भी यथावसर उद्दीपन और प्रशमन के बिना शीघ्र ही अद्भुत (चमत्कार) फलरूप साध्य के प्राप्त हो जाने पर प्रकटनार्थ अभिलषित उपायोपेयभाव प्रदर्शित नहीं हो पाता । फिर से—। इतिवृत्त के कारण आरम्भ हुए की आशङ्क्यमान- प्राय, न कि सर्वथा ही प्राप्त विश्रान्ति अर्थात् विच्छेद है जिसका वह । रस का—। रस के अङ्गभूत किसी का भी । 'तापसवत्सराज' में वासवदत्ता में जीवितसर्वस्व के

३७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः कादे रसव्यक्तिनिमित्तमिदं चापरमवगन्तव्यं यदलंकृतीनां शक्तावप्या- नुरूप्येण योजनम्। शक्तो हि कविः कदाचिदलङ्कारनिबन्धने तदा- निमित्त समझना चाहिए कि शक्ति (सामर्थ्य) होने पर भी अलङ्कारों का अनुरूपता से जोड़ना। क्योंकि शक्त (समर्थ) कवि कभी अलङ्कारों के निबन्धन में उस

लोचनम् द्यौचित्यात्करुणविप्रलम्भादिभूमिका गृह्णन्समस्तेतिवृत्तव्यापी। राज्यप्रत्यापत्त्या हि सचिवनीतिमहिमोपनतया तदङ्गभूतपद्मावतीलाभानुगतयानुप्राण्यमानरूपा परमामभिलषणीयतमतां प्राप्ता वासवदत्ताधिगतिरेव तत्र फलम्। निर्वहणे हि ‘प्राप्ता देवी भूतधात्री च भूयः संबन्धोऽभूद्दर्शकेन’ इत्येवं देवीलाभप्राधान्यं निर्वार्हितम्। इयति चेतिवृत्तवैचित्र्यचित्रे भित्तिस्थानीयो वासवदत्ताप्रेमबन्धः प्रथममन्त्रारम्भात्प्रभृति पद्मावतीविवाहादौ, तस्यैव व्यापारात्। तेन स एव वासवदत्ताविषयः प्रेमबन्धः कथावशादाशङ्क्यमानविच्छेदोऽप्यनुसंहितः। तथा हि—प्रथमे तावदङ्के स्फुटं स एवोपनिबद्धः ‘तद्वक्त्रेन्दुविलोचनेन दिवसो नीतः प्रदोषस्तथा तद्गोष्ठ्यैव’ इत्यादिना, ‘बद्धोत्कण्ठमिदं मनः किमथवा प्रेमाऽस- माप्तोत्सवम्’ इत्यन्तेन। द्वितीयेऽपि ‘दृष्टिर्नामृतवर्षिणी स्मितमधुप्रस्यन्दि वक्त्रं न किम्’ इत्यादिना स एव विच्छिन्नोऽप्यनुसंहितः। तृतीयेऽपि—

अभिमान रूप (वत्सराज का) प्रेमबन्ध उसके विभावादि के औचित्य से करुण, विप्र- लम्भ आदि की भूमिकाओं को ग्रहण करता हुआ समस्त इतिवृत्त (कथानक) में व्याप्त है। सचिव की नीति की महिमा से प्राप्त एवं उसके अङ्गभूत पद्मावती के लाभ से अनुगत राज्य की प्राप्ति द्वारा अनुप्राण्यमान एवं परम अभिलषणीयतम भाव को प्राप्त वासवदत्ता की प्राप्ति ही वहां फल है। क्योंकि 'निर्वहण' (सन्धि) में 'देवी और पृथ्वी दोनों प्राप्त हो गईं और फिर से दर्शक के साथ सम्बन्ध हो गया' इस प्रकार देवी के लाभ का प्राधान्य निर्वाह किया गया है। कथानक के वैचित्र्य के इतने प्रथम मंत्र से लेकर पद्मावती के विवाह आदि चित्र में वासवदत्ता का प्रेमबन्ध भित्तिस्थानीय है, क्योंकि उसका ही व्यापार (व्याप्ति) है। इस कारण वही वासवदत्ता में प्रेमबन्ध कथा के वश विच्छेद की आशङ्का होने पर अनुसन्धान किया गया है। जैसा कि प्रथम अङ्क में स्पष्ट वही (प्रेमबन्ध) 'उसके मुखचन्द्र को देखते दिन व्यतीत किया, उस प्रकार सायंकाल भी, उसके साथ गोष्ठी से ही इत्यादि से लेकर 'यह मन उत्कण्ठा से भरा है, प्रेम में उत्सव समाप्त नहीं होता' तक रचा गया है। दूसरे (अङ्क) में भी 'क्या निगाह अमृत वर्षा करने वाली नहीं है, क्या मुख स्मित के मधु प्रवाहित करने वाला नहीं है?' इत्यादि द्वारा वही विच्छिन्न होकर भी अनुसन्धान किया गया है। तीसरे (अङ्क) में भी—

तृतीय उद्योतः ३७५

ध्वन्यालोकः
क्षिप्ततयैवानपेक्षितरसबन्धः प्रबन्धमारभते तदुपदेशार्थमिदमुक्तम् ।
( अलङ्काररचना ) में मग्न होकर रसबन्ध की अपेक्षा न करके प्रबन्ध रचना करने
लगता है, उसके उपदेश के लिए यह कहा है ।
लोचनम्
सर्वत्र ज्वलितेषु वेश्मसु भयादालीजने विद्रुते
श्वासोत्कम्पविहस्तया प्रतिपदं देव्या पतन्त्या तथा ।
हा नाथेति मुहुः प्रलापपरया दग्धं वराक्या तया
शान्तेनापि वयं तु तेन दहनेनाद्यापि दह्यामहे ॥
इत्यादिना । चतुर्थेऽपि
देवीस्वीकृतमानसस्य नियतं स्वप्नायमानस्य मे
तद्गोत्रग्रहणादियं सुवदना यायात्कथं न व्यथाम् ।
इत्थं यन्त्रणया कथंकथमपि क्षीणा निशा जाग्रते
दाक्षिण्योपहतेन सा प्रियतमा स्वप्नेऽपि नासादिता ॥
इत्यादिना । पञ्चमेऽपि समागमप्रत्याशया करुणे निवृत्ते विप्रलम्भेऽङ्कुरिते
तथाभूते तस्मिन्मुनिवचसि जातागसि मयि
प्रयत्नान्तर्गूढां रुषमुपगता मे प्रियतमा ।
प्रसीदेति प्रोक्ता न खलु कुपितेत्युक्तिमधुरं
समुद्भिन्ना पीतैर्नयनसलिलैः स्थास्यति पुनः ॥
इत्यादिना । षष्ठेऽपि 'त्वत्सम्प्राप्तिविलोभितेन सचिवैः प्राणा मया धारिताः'
सभी जगह भवनों के जल उठने पर, ( जल जाने के ) डर से सखियों के भाग जाने
पर हांफ से व्याकुल, उस प्रकार पग-पग पर गिरती-पड़ती बेचारी वह देवी 'हा नाथ'
यह बार-बार प्रलाप करती जल गई, परन्तु हम तो उस शान्त हुए भी अग्नि से आज भी
जलाए जा रहे हैं ।
इत्यादि से । चौथे ( अङ्क ) में भी—
देवी ( वासवदत्ता ) में रमे मन वाले, सपनाते हुए मेरे ( मुंह से ) उसके नाम
ग्रहण किए जाने पर यह सुमुखी ( पद्मावती ) कैसे नहीं व्यथित होगी ? इस प्रकार
कशमकश में जागते हुए किसी-किसी प्रकार रात बीती, और ( पद्मावती के प्रति )
दाक्षिण्य ( आनुकूल्य ) के कारण उपहत मैंने स्वप्न में भी उस प्रियतमा को नहीं पाया ।
इत्यादि से । पांचवें ( अङ्क ) में भी समागम की प्रत्याशा से करुण के निवृत्त और
विप्रलम्भ के अङ्कुरित होने पर—
मुनिवचन के उस प्रकार होने पर, मेरे अपराधी होने पर मेरी प्रियतमा प्रयत्न-
पूर्वक भीतर ही भीतर कुपित हो गई । 'प्रसन्न हो' यह कहने पर 'कुपित नहीं हूँ' यह
मीठे ढङ्ग से कह कर अन्तःस्तम्भित आंसुओं को धारण करेगी ।
इत्यादि से । छठे ( अङ्क ) में भी 'सचिवों ने तुम्हारी प्राप्ति के लोभ में डाल कर

३७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः दृश्यन्ते च कवयोऽलङ्कारनिबन्धनैकरसा अनपेक्षितरसाः प्रबन्धेषु । किञ्च— अनुस्वानोपमात्मापि प्रभेदो य उदाहृतः । ध्वनेरस्य प्रबन्धेषु भासते सोऽपि केषुचित् ॥ १५ ॥ अस्य विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेरणुरणनरूपव्यङ्ग्योऽपि यः देखा जाता है कि कवि प्रबन्धों में रसापेक्षी न होकर अलङ्कारों के निबन्धन में ही लग जाते हैं ॥ १४ ॥ और भी—इस ध्वनि का अनुस्वानसदृश जो प्रभेद कहा गया है वह भी किन्हीं प्रबन्धों में भासित होता है ॥ १५ ॥ इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का अनुकरणरूपव्यङ्ग्य भी जो प्रभेद दो प्रकार का लोचनम् इत्यादिना । अलङ्कृतीनामिति योजनापेक्षया कर्मणि षष्ठी । दृश्यन्ते चेति । यथा स्वप्नवासवदत्ताख्ये नाटके— 'स्वञ्चितपक्ष्मकपाटं नयनद्वारं स्वरूपताडेन । उद्घाट्य सा प्रविष्टा हृदयगृहं मे नृपतनूजा ॥' इति ॥ १४ ॥ न केवलं प्रबन्धेन साक्षाद्व्यङ्ग्यो रसो यावत्पारम्पर्येणापीति दर्शयितु- मुपक्रमते-किञ्चेति । अनुस्वानोपमः-शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्च, यो ध्वनेः प्रभेद उदाहृतः सः केषुचित्प्रबन्धेषु निमित्तभूतेषु व्यञ्जकेषु सत्सु व्यङ्ग्यतया स्थितः सन् । अस्येति । रसादिध्वनेः प्रकृतस्य भासते व्यञ्जकतयेति शेषः । वृत्तिग्रन्थोऽप्येवमेव योज्यः । अथ वानुस्वानोपमः प्रभेद उदाहृतो यः प्रबन्धेषु भासते अस्यापि 'द्योत्योऽलक्ष्यक्रमः क्वचित्' इत्युत्तरश्लोकेन कारिकावृत्त्योः सङ्गतिः । मुझसे प्राणों को धारण करवाया' इत्यादि से । 'अलङ्कारों का' यहां 'भोजन' की अपेक्षा से कर्म में षष्ठी है। देखे जाते हैं—। जैसे, 'स्वप्नवासवदत्त' नामक नाटक में— बन्द पक्ष्म के कवाट वाले नयन के द्वार को अपने रूप के धक्के से खोल कर वह राजकुमारी मेरे हृदय के घर में प्रवेश कर गई ॥ १४ ॥ न केवल प्रबन्ध से साक्षात् व्यङ्ग्य रस ही होता है, अपितु पारम्पर्य से भी ( व्यङ्ग्य होता है), यह दिखाने के लिए उपक्रम करते हैं—और भी—। अनुस्वान- सदृश—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल, जो ध्वनि का प्रभेद कहा गया है, वह किन्हीं प्रबन्धों के निमित्तभूत व्यञ्जक होने पर व्यङ्ग्य रूप से स्थित होता हुआ। इसका— प्रकृत रसादि ध्वनि का व्यञ्जक रूप से भासित होता है, यह शेष है। वृत्तिग्रन्थ को भी इसी प्रकार लगाना चाहिए। अथवा, अनुस्वानसदृश कहा गया जो प्रभेद प्रबन्धों में भासित होता है इसका भी 'कहीं पर अलक्ष्यक्रम द्योत्य होता है' इस उत्तरश्लोक से कारिका और वृत्ति की सङ्गति होती है।

तृतीय उद्योतः ३७७ ध्वन्यालोकः प्रभेद उदाहतो द्विप्रकारः सोऽपि प्रबन्धेषु केषुचिद्द्योतते । तद्यथा मधुमथनविजये पाञ्चजन्योक्तिषु । यथा वा ममैव कामदेवस्य सह- कहा गया है वह भी किन्हीं प्रबन्धों में द्योतित होता है। वह जैसे, 'मधुमथनविजय' में पाञ्चजन्य की उक्तियों में। अथवा जैसे मेरा ही 'विषमबाणलीला' में, कामदेव के लोचनम् एतदुक्तं भवति—प्रबन्धेन कदाचिदनुरणनरूपव्यङ्ग्यो ध्वनिः साक्षाद्व्य- ज्यते स तु रसादिध्वनौ पर्यवस्यतीति। यदि तु स्पष्टमेव व्याख्यायते तदा ग्रन्थस्य पूर्वोत्तरस्यालक्ष्यक्रमविषयस्य मध्ये ग्रन्थोऽयमसङ्गतः स्यात्, नीरसत्वं च पाञ्चजन्योक्त्यादीनामुक्तं स्यादित्यलम्। लीलादाढा शुध्युड्ढासअलमहिमण्डलसञ्चिअ अज्ज। कीसमृणालाहरतुज्जआइ अङ्गम्मि ॥ इत्यादयः पाञ्चजन्योक्तयो रुक्मिणीविप्रलब्धवासुदेवाशयप्रतिषेधनाभि- प्रायमभिव्यञ्जयन्ति। सोऽभिव्यक्तः प्रकृतरसस्वरूपपर्यवसायी। सहचराः वसन्तयौवनमलयानिलादयस्तैः सह समागमे। मिअवहण्डिअरोरोणिइड्ढसो अविवेअरहिओ वि। सविण वि तुमम्मि पुणोवन्ति अ अतन्ति पंमुसिम्मि ॥ बात यह कही गई—प्रबन्ध से कहीं पर अनुरणन-रूपव्यङ्ग्य ध्वनि साक्षात् व्यञ्जित होती है, वह रसादि ध्वनि में पर्यवसित होती है। परन्तु यदि स्पष्ट ही (यथावस्थित ही) व्याख्यान करते हैं तब पूर्वोत्तर अलक्ष्यक्रमविषयक ग्रन्थ के बीच में यह ग्रन्थ असङ्गत होगा और पाञ्चजन्य की उक्ति आदि का नीरसत्व कहा जाने लगेगा। इत्यलम्। लीलादाढा शुध्युड्ढा·················································अङ्गम्मि ॥ [ लीलादाढग्गुद्धरिअसलमहीमण्डलस्सविअअस्स । कीसमृणालहरणं वि तुझ गुरु आइ अङ्गम्मि ॥ ] ( इति पाठः बालप्रियायाम् ) 'लीला से दंष्ट्रा के अग्रभाग पर सारी पृथ्वी को उठा लेने वाले तुम्हारे अङ्ग में मृणाल का आभरण भी कैसे भारी हो रहा है ? इत्यादि पाञ्चजन्य की उक्तियां रुक्मिणी के विरही वासुदेव ( श्रीकृष्ण ) के अभिलाष के आविष्करण का अभिप्राय व्यञ्जित कर रही हैं। प्रकृत रस ( विप्रलम्भ शृङ्गार ) के स्वरूप में पर्यवसन्न होने वाला वह ( अभिप्राय ) अभिव्यक्त है। सहचर अर्थात् वसन्त यौवन, मलयानिल आदि, उनके साथ समागम में। मिअवहण्डिअरोरो·························अतन्ति पंमुसिम्मि ॥ [ हुम्मि अवहत्थिअरे होणिरङ्कुसो अह विवेअरहिओ वि । सविणे वि तुमम्मि पुणो भन्ति णपसुमरामि ॥ ] ( इति पाठः बालप्रियायाम् )