भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 434

३७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः कादे रसव्यक्तिनिमित्तमिदं चापरमवगन्तव्यं यदलंकृतीनां शक्तावप्या- नुरूप्येण योजनम्। शक्तो हि कविः कदाचिदलङ्कारनिबन्धने तदा- निमित्त समझना चाहिए कि शक्ति (सामर्थ्य) होने पर भी अलङ्कारों का अनुरूपता से जोड़ना। क्योंकि शक्त (समर्थ) कवि कभी अलङ्कारों के निबन्धन में उस

लोचनम् द्यौचित्यात्करुणविप्रलम्भादिभूमिका गृह्णन्समस्तेतिवृत्तव्यापी। राज्यप्रत्यापत्त्या हि सचिवनीतिमहिमोपनतया तदङ्गभूतपद्मावतीलाभानुगतयानुप्राण्यमानरूपा परमामभिलषणीयतमतां प्राप्ता वासवदत्ताधिगतिरेव तत्र फलम्। निर्वहणे हि ‘प्राप्ता देवी भूतधात्री च भूयः संबन्धोऽभूद्दर्शकेन’ इत्येवं देवीलाभप्राधान्यं निर्वार्हितम्। इयति चेतिवृत्तवैचित्र्यचित्रे भित्तिस्थानीयो वासवदत्ताप्रेमबन्धः प्रथममन्त्रारम्भात्प्रभृति पद्मावतीविवाहादौ, तस्यैव व्यापारात्। तेन स एव वासवदत्ताविषयः प्रेमबन्धः कथावशादाशङ्क्यमानविच्छेदोऽप्यनुसंहितः। तथा हि—प्रथमे तावदङ्के स्फुटं स एवोपनिबद्धः ‘तद्वक्त्रेन्दुविलोचनेन दिवसो नीतः प्रदोषस्तथा तद्गोष्ठ्यैव’ इत्यादिना, ‘बद्धोत्कण्ठमिदं मनः किमथवा प्रेमाऽस- माप्तोत्सवम्’ इत्यन्तेन। द्वितीयेऽपि ‘दृष्टिर्नामृतवर्षिणी स्मितमधुप्रस्यन्दि वक्त्रं न किम्’ इत्यादिना स एव विच्छिन्नोऽप्यनुसंहितः। तृतीयेऽपि—

अभिमान रूप (वत्सराज का) प्रेमबन्ध उसके विभावादि के औचित्य से करुण, विप्र- लम्भ आदि की भूमिकाओं को ग्रहण करता हुआ समस्त इतिवृत्त (कथानक) में व्याप्त है। सचिव की नीति की महिमा से प्राप्त एवं उसके अङ्गभूत पद्मावती के लाभ से अनुगत राज्य की प्राप्ति द्वारा अनुप्राण्यमान एवं परम अभिलषणीयतम भाव को प्राप्त वासवदत्ता की प्राप्ति ही वहां फल है। क्योंकि 'निर्वहण' (सन्धि) में 'देवी और पृथ्वी दोनों प्राप्त हो गईं और फिर से दर्शक के साथ सम्बन्ध हो गया' इस प्रकार देवी के लाभ का प्राधान्य निर्वाह किया गया है। कथानक के वैचित्र्य के इतने प्रथम मंत्र से लेकर पद्मावती के विवाह आदि चित्र में वासवदत्ता का प्रेमबन्ध भित्तिस्थानीय है, क्योंकि उसका ही व्यापार (व्याप्ति) है। इस कारण वही वासवदत्ता में प्रेमबन्ध कथा के वश विच्छेद की आशङ्का होने पर अनुसन्धान किया गया है। जैसा कि प्रथम अङ्क में स्पष्ट वही (प्रेमबन्ध) 'उसके मुखचन्द्र को देखते दिन व्यतीत किया, उस प्रकार सायंकाल भी, उसके साथ गोष्ठी से ही इत्यादि से लेकर 'यह मन उत्कण्ठा से भरा है, प्रेम में उत्सव समाप्त नहीं होता' तक रचा गया है। दूसरे (अङ्क) में भी 'क्या निगाह अमृत वर्षा करने वाली नहीं है, क्या मुख स्मित के मधु प्रवाहित करने वाला नहीं है?' इत्यादि द्वारा वही विच्छिन्न होकर भी अनुसन्धान किया गया है। तीसरे (अङ्क) में भी—