भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 680 में से

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पृष्ठ 433

तृतीय उद्योतः ३७३ ध्वन्यालोकः इदं चापरं प्रबन्धस्य रसव्यञ्जकत्वे निमित्तं यदुद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा रसस्य, यथा रत्नावल्यामेव । पुनरारब्धविश्रान्ते रस- स्याङ्गिनोऽनुसन्धिश्च । यथा तापसवत्सराजे । प्रबन्धविशेषस्य नाट- और यह प्रबन्ध के रसव्यञ्जक होने में अपर निमित्त है कि बीच में यथावसर रस का उद्दीपन और प्रशमन करना । जैसे 'रत्नावली' में ही । और आरम्भ किए हुए के विश्रान्त होने लगने पर फिर से अङ्गी (प्रधान) रस का अनुसन्धान कर लेना । जैसे, 'तापसवत्सराज' में । प्रबन्धविशेष नाटक आदि की रसव्यञ्जना का यह और लोचनम् प्रकृतो ह्यत्र वीररसः । उद्दीपन इति । उद्दीपनं विभावादिपरिपूरणया । यथा— 'अयं स राजा उदयणो त्ति' इत्यादि सागरिकायाः । प्रशमनं वासवदत्तातः पलायने । पुनरुद्दीपनं चित्रफलकोल्लेखे । प्रशमनं सुसङ्गताप्रवेशे इत्यादि । गाढं ह्यनवरतपरिमृदितो रसः सुकुमारमालतीकुसुमवद्भटित्येव म्लानिमवलम्बे- त । विशेषतस्तु शृङ्गारः । यदाह मुनिः— यद्वामाभिनिवेशित्वं यतश्च विनिवार्यते । दुर्लभत्वं यतो नार्या कामिनः सा परा रतिः ॥ इति । वीररसादावपि यथावसरमुद्दीपनप्रशमनाभ्यां विना झटित्येवाद्भुतफल- कल्पे साध्ये लब्धे प्रकटीचिकीर्षित उपायोपेयभावो न प्रदर्शित एव स्यात् । पुनरिति । इतिवृत्तवशादारब्धाशङ्क्यमानप्राया न तु सर्वथैवोपनता विश्रान्ति- र्विच्छेदो यस्य स तथा । रसस्येति । रसाङ्गभूतस्य कस्यापीति यावत् । तापस- वत्सराजे हि वासवदत्ताविषयो जीवितसर्वस्वाभिमानात्मा प्रेमबन्धस्तद्दिभावा- वेणीसंहार के रचयिता ने) तत्त्वार्थ को नहीं समझा । यहां (वेणीसंहार में) प्रकृत वीररस है । उद्दीपन—। विभावादि के परिपूरण द्वारा । जैसे—'यह वह राजा उदयन है' सागरिका का । प्रशमन वासवदत्ता से भागने में । पुनः उद्दीपन चित्रफलक के निर्माण में । प्रशमन सुसङ्गता के प्रवेश में, इत्यादि । खूब निरन्तर चर्वणा किया गया रस सुकुमार मालती के पुष्प की भांति झटिति म्लान हो जाता है । विशेष करके शृङ्गार । क्योंकि मुनि कहते हैं— जिस कारण कि प्रतिकूल आचरण की इच्छा, जिस कारण (सम्भोग) निवारण किया जाता है, जिस कारण नारी दुर्लभ होती है, वह कामी की गाढ़ रति है । वीररस आदि में भी यथावसर उद्दीपन और प्रशमन के बिना शीघ्र ही अद्भुत (चमत्कार) फलरूप साध्य के प्राप्त हो जाने पर प्रकटनार्थ अभिलषित उपायोपेयभाव प्रदर्शित नहीं हो पाता । फिर से—। इतिवृत्त के कारण आरम्भ हुए की आशङ्क्यमान- प्राय, न कि सर्वथा ही प्राप्त विश्रान्ति अर्थात् विच्छेद है जिसका वह । रस का—। रस के अङ्गभूत किसी का भी । 'तापसवत्सराज' में वासवदत्ता में जीवितसर्वस्व के