ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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तृतीय उद्योतः ३७५
ध्वन्यालोकः
क्षिप्ततयैवानपेक्षितरसबन्धः प्रबन्धमारभते तदुपदेशार्थमिदमुक्तम् ।
( अलङ्काररचना ) में मग्न होकर रसबन्ध की अपेक्षा न करके प्रबन्ध रचना करने
लगता है, उसके उपदेश के लिए यह कहा है ।
लोचनम्
सर्वत्र ज्वलितेषु वेश्मसु भयादालीजने विद्रुते
श्वासोत्कम्पविहस्तया प्रतिपदं देव्या पतन्त्या तथा ।
हा नाथेति मुहुः प्रलापपरया दग्धं वराक्या तया
शान्तेनापि वयं तु तेन दहनेनाद्यापि दह्यामहे ॥
इत्यादिना । चतुर्थेऽपि
देवीस्वीकृतमानसस्य नियतं स्वप्नायमानस्य मे
तद्गोत्रग्रहणादियं सुवदना यायात्कथं न व्यथाम् ।
इत्थं यन्त्रणया कथंकथमपि क्षीणा निशा जाग्रते
दाक्षिण्योपहतेन सा प्रियतमा स्वप्नेऽपि नासादिता ॥
इत्यादिना । पञ्चमेऽपि समागमप्रत्याशया करुणे निवृत्ते विप्रलम्भेऽङ्कुरिते
तथाभूते तस्मिन्मुनिवचसि जातागसि मयि
प्रयत्नान्तर्गूढां रुषमुपगता मे प्रियतमा ।
प्रसीदेति प्रोक्ता न खलु कुपितेत्युक्तिमधुरं
समुद्भिन्ना पीतैर्नयनसलिलैः स्थास्यति पुनः ॥
इत्यादिना । षष्ठेऽपि 'त्वत्सम्प्राप्तिविलोभितेन सचिवैः प्राणा मया धारिताः'
सभी जगह भवनों के जल उठने पर, ( जल जाने के ) डर से सखियों के भाग जाने
पर हांफ से व्याकुल, उस प्रकार पग-पग पर गिरती-पड़ती बेचारी वह देवी 'हा नाथ'
यह बार-बार प्रलाप करती जल गई, परन्तु हम तो उस शान्त हुए भी अग्नि से आज भी
जलाए जा रहे हैं ।
इत्यादि से । चौथे ( अङ्क ) में भी—
देवी ( वासवदत्ता ) में रमे मन वाले, सपनाते हुए मेरे ( मुंह से ) उसके नाम
ग्रहण किए जाने पर यह सुमुखी ( पद्मावती ) कैसे नहीं व्यथित होगी ? इस प्रकार
कशमकश में जागते हुए किसी-किसी प्रकार रात बीती, और ( पद्मावती के प्रति )
दाक्षिण्य ( आनुकूल्य ) के कारण उपहत मैंने स्वप्न में भी उस प्रियतमा को नहीं पाया ।
इत्यादि से । पांचवें ( अङ्क ) में भी समागम की प्रत्याशा से करुण के निवृत्त और
विप्रलम्भ के अङ्कुरित होने पर—
मुनिवचन के उस प्रकार होने पर, मेरे अपराधी होने पर मेरी प्रियतमा प्रयत्न-
पूर्वक भीतर ही भीतर कुपित हो गई । 'प्रसन्न हो' यह कहने पर 'कुपित नहीं हूँ' यह
मीठे ढङ्ग से कह कर अन्तःस्तम्भित आंसुओं को धारण करेगी ।
इत्यादि से । छठे ( अङ्क ) में भी 'सचिवों ने तुम्हारी प्राप्ति के लोभ में डाल कर