ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः दृश्यन्ते च कवयोऽलङ्कारनिबन्धनैकरसा अनपेक्षितरसाः प्रबन्धेषु । किञ्च— अनुस्वानोपमात्मापि प्रभेदो य उदाहृतः । ध्वनेरस्य प्रबन्धेषु भासते सोऽपि केषुचित् ॥ १५ ॥ अस्य विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेरणुरणनरूपव्यङ्ग्योऽपि यः देखा जाता है कि कवि प्रबन्धों में रसापेक्षी न होकर अलङ्कारों के निबन्धन में ही लग जाते हैं ॥ १४ ॥ और भी—इस ध्वनि का अनुस्वानसदृश जो प्रभेद कहा गया है वह भी किन्हीं प्रबन्धों में भासित होता है ॥ १५ ॥ इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का अनुकरणरूपव्यङ्ग्य भी जो प्रभेद दो प्रकार का लोचनम् इत्यादिना । अलङ्कृतीनामिति योजनापेक्षया कर्मणि षष्ठी । दृश्यन्ते चेति । यथा स्वप्नवासवदत्ताख्ये नाटके— 'स्वञ्चितपक्ष्मकपाटं नयनद्वारं स्वरूपताडेन । उद्घाट्य सा प्रविष्टा हृदयगृहं मे नृपतनूजा ॥' इति ॥ १४ ॥ न केवलं प्रबन्धेन साक्षाद्व्यङ्ग्यो रसो यावत्पारम्पर्येणापीति दर्शयितु- मुपक्रमते-किञ्चेति । अनुस्वानोपमः-शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्च, यो ध्वनेः प्रभेद उदाहृतः सः केषुचित्प्रबन्धेषु निमित्तभूतेषु व्यञ्जकेषु सत्सु व्यङ्ग्यतया स्थितः सन् । अस्येति । रसादिध्वनेः प्रकृतस्य भासते व्यञ्जकतयेति शेषः । वृत्तिग्रन्थोऽप्येवमेव योज्यः । अथ वानुस्वानोपमः प्रभेद उदाहृतो यः प्रबन्धेषु भासते अस्यापि 'द्योत्योऽलक्ष्यक्रमः क्वचित्' इत्युत्तरश्लोकेन कारिकावृत्त्योः सङ्गतिः । मुझसे प्राणों को धारण करवाया' इत्यादि से । 'अलङ्कारों का' यहां 'भोजन' की अपेक्षा से कर्म में षष्ठी है। देखे जाते हैं—। जैसे, 'स्वप्नवासवदत्त' नामक नाटक में— बन्द पक्ष्म के कवाट वाले नयन के द्वार को अपने रूप के धक्के से खोल कर वह राजकुमारी मेरे हृदय के घर में प्रवेश कर गई ॥ १४ ॥ न केवल प्रबन्ध से साक्षात् व्यङ्ग्य रस ही होता है, अपितु पारम्पर्य से भी ( व्यङ्ग्य होता है), यह दिखाने के लिए उपक्रम करते हैं—और भी—। अनुस्वान- सदृश—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल, जो ध्वनि का प्रभेद कहा गया है, वह किन्हीं प्रबन्धों के निमित्तभूत व्यञ्जक होने पर व्यङ्ग्य रूप से स्थित होता हुआ। इसका— प्रकृत रसादि ध्वनि का व्यञ्जक रूप से भासित होता है, यह शेष है। वृत्तिग्रन्थ को भी इसी प्रकार लगाना चाहिए। अथवा, अनुस्वानसदृश कहा गया जो प्रभेद प्रबन्धों में भासित होता है इसका भी 'कहीं पर अलक्ष्यक्रम द्योत्य होता है' इस उत्तरश्लोक से कारिका और वृत्ति की सङ्गति होती है।