भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 680 में से

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पृष्ठ 437

तृतीय उद्योतः ३७७ ध्वन्यालोकः प्रभेद उदाहतो द्विप्रकारः सोऽपि प्रबन्धेषु केषुचिद्द्योतते । तद्यथा मधुमथनविजये पाञ्चजन्योक्तिषु । यथा वा ममैव कामदेवस्य सह- कहा गया है वह भी किन्हीं प्रबन्धों में द्योतित होता है। वह जैसे, 'मधुमथनविजय' में पाञ्चजन्य की उक्तियों में। अथवा जैसे मेरा ही 'विषमबाणलीला' में, कामदेव के लोचनम् एतदुक्तं भवति—प्रबन्धेन कदाचिदनुरणनरूपव्यङ्ग्यो ध्वनिः साक्षाद्व्य- ज्यते स तु रसादिध्वनौ पर्यवस्यतीति। यदि तु स्पष्टमेव व्याख्यायते तदा ग्रन्थस्य पूर्वोत्तरस्यालक्ष्यक्रमविषयस्य मध्ये ग्रन्थोऽयमसङ्गतः स्यात्, नीरसत्वं च पाञ्चजन्योक्त्यादीनामुक्तं स्यादित्यलम्। लीलादाढा शुध्युड्ढासअलमहिमण्डलसञ्चिअ अज्ज। कीसमृणालाहरतुज्जआइ अङ्गम्मि ॥ इत्यादयः पाञ्चजन्योक्तयो रुक्मिणीविप्रलब्धवासुदेवाशयप्रतिषेधनाभि- प्रायमभिव्यञ्जयन्ति। सोऽभिव्यक्तः प्रकृतरसस्वरूपपर्यवसायी। सहचराः वसन्तयौवनमलयानिलादयस्तैः सह समागमे। मिअवहण्डिअरोरोणिइड्ढसो अविवेअरहिओ वि। सविण वि तुमम्मि पुणोवन्ति अ अतन्ति पंमुसिम्मि ॥ बात यह कही गई—प्रबन्ध से कहीं पर अनुरणन-रूपव्यङ्ग्य ध्वनि साक्षात् व्यञ्जित होती है, वह रसादि ध्वनि में पर्यवसित होती है। परन्तु यदि स्पष्ट ही (यथावस्थित ही) व्याख्यान करते हैं तब पूर्वोत्तर अलक्ष्यक्रमविषयक ग्रन्थ के बीच में यह ग्रन्थ असङ्गत होगा और पाञ्चजन्य की उक्ति आदि का नीरसत्व कहा जाने लगेगा। इत्यलम्। लीलादाढा शुध्युड्ढा·················································अङ्गम्मि ॥ [ लीलादाढग्गुद्धरिअसलमहीमण्डलस्सविअअस्स । कीसमृणालहरणं वि तुझ गुरु आइ अङ्गम्मि ॥ ] ( इति पाठः बालप्रियायाम् ) 'लीला से दंष्ट्रा के अग्रभाग पर सारी पृथ्वी को उठा लेने वाले तुम्हारे अङ्ग में मृणाल का आभरण भी कैसे भारी हो रहा है ? इत्यादि पाञ्चजन्य की उक्तियां रुक्मिणी के विरही वासुदेव ( श्रीकृष्ण ) के अभिलाष के आविष्करण का अभिप्राय व्यञ्जित कर रही हैं। प्रकृत रस ( विप्रलम्भ शृङ्गार ) के स्वरूप में पर्यवसन्न होने वाला वह ( अभिप्राय ) अभिव्यक्त है। सहचर अर्थात् वसन्त यौवन, मलयानिल आदि, उनके साथ समागम में। मिअवहण्डिअरोरो·························अतन्ति पंमुसिम्मि ॥ [ हुम्मि अवहत्थिअरे होणिरङ्कुसो अह विवेअरहिओ वि । सविणे वि तुमम्मि पुणो भन्ति णपसुमरामि ॥ ] ( इति पाठः बालप्रियायाम् )