भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 680 में से

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पृष्ठ 438

३७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः चरसमागेम विषमबाणलीलायाम् । यथा च गृध्रगोमायुसंवादादौ महा- भारते ॥ १५ ॥ सहचर के समागम के प्रसङ्ग में । और जैसे 'महाभारत' में गृध्रगोमायुसंवाद आदि प्रसंग में ॥ १५ ॥ लोचनम् इत्यादयो यौवनस्योक्तयस्तत्तन्निजस्वभावव्यञ्जिकाः, स स्वभावः प्रकृ- तरसपर्यवसायी । यथा चेति । श्मशानावतीर्णं पुत्रदाहार्थमुद्योगिनं जनं विप्रल- ब्धुं गृध्रो दिवा शवशरीरभक्षणार्थी शीघ्रमेवापसरत यूयमित्याह । अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन्गृध्रगोमायुसङ्कुले । कङ्कालबहुले घोरे सर्वप्राणिभयङ्करे ॥ न चेह जीवितः कश्चित्कालधर्ममुपागतः । प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ॥ इत्याद्यवोचत् । गोमायुस्तु निशोदयावधि अमी तिष्ठन्तु, ततो गृध्रादपहृ- त्याहं भक्षयिष्यामीत्यभिप्रायेणावोचत् । आदित्योऽयं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरुत साम्प्रतम् । बहुविघ्नो मुहूर्तोऽयं जीवेदपि कदाचन ॥ अमुं कनकवर्णाभं बालमप्राप्तयौवनम् । गृध्रवाक्यात्कथं बालास्त्यज्यध्वमविशङ्किताः ॥ 'मर्यादा को पार कर गया हूँ, निरङ्कुश हूँ और विवेकरहित भी हूँ, किन्तु स्वप्न में भी तुम्हारी भक्ति को नहीं याद कर पाता हूँ।' इत्यादि यौवन की उक्तियां उन-उन के अपने स्वभाव को व्यक्त करती हैं । वह स्वभाव प्रकृत रस में पर्यवसन्न होने वाला है । और जैसे—। श्मशान में पहुंचे, पुत्र को जलाने के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति को ठगने के लिए, गीध दिन में शव के शरीर को खाने की इच्छा से 'शीघ्र ही तुम लोग चले जाओ' यह कहता है— 'गीध और सियार से भरे, अस्थिपञ्जरों से व्याप्त, घोर एवं सभी प्राणियों के लिए भयङ्कर इस श्मशान में ठहरना बेकार है, काल के धर्म (मृत्यु) को प्राप्त कोई यहां जीवित नहीं रहा है, प्रिय हो अथवा शत्रु (द्वेष्य), प्राणियों की गति इसी प्रकार है।' इत्यादि बोला । किन्तु सियार ने इस अभिप्राय से कि ये लोग रात होने तक ठहरें, तब मैं गीध से छीन कर खाऊंगा, बोला— 'हे मूढ़ लोगो, यह सूर्य अस्त नहीं हुए, अभी स्नेह करो, यह मुहूर्त बहुत विघ्नों वाला है, (बाद में) कदाचित् जी जाय । सोने के समान कान्ति वाले, यौवन को नहीं प्राप्त हुए इस बालक को बिना विचारे गीध की बात से क्यों छोड़ रहे हो।'