ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 439, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३७९ ध्वन्यालोकः सुप्तिङ्वचनसम्बन्धैस्तथा कारकशक्तिभिः । कृत्तद्धितसमासैश्च द्योत्योऽलक्ष्यक्रमः क्वचित् ॥ १६ ॥ सुप्, तिङ्, वचन, सम्बन्ध, कारक-शक्ति, कृत्, तद्धित, और समास से कहीं पर असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि द्योत्य होता है ॥ १६ ॥ लोचनम् इत्यादि । स चाभिप्रायो व्यक्तः शान्तरस एव परिनिष्ठिततां प्राप्तः ॥ १५ ॥ एवमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य रसादिध्वनेर्यद्यपि वर्णेभ्यः प्रभृति प्रबन्धपर्यन्ते व्यञ्जकवर्गे निरूपिते न निरूपणीयान्तरमवशिष्यते, तथापि कविसहृदयानां शिक्षां दातुं पुनरपि सूक्ष्मदृष्ट्यान्वयव्यतिरेकावाश्रित्य व्यञ्जकवर्गमाह-सुप्तिङि- त्यादि । वयं त्वित्थमेतदनन्तरं सवृत्तिकं वाक्यं बुध्यामहे । सुबादिभिः योऽनु- स्वानोपमो भासते वक्त्रभिप्रायादिरूपः अस्यापि सुबादिभिर्व्यक्तस्यानुस्वानो- पमस्यालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो द्योत्यः । क्वचिदिति पूर्वकारिकया सह संमील्य सङ्गति- रिति । सर्वत्र हि सुबादीनामभिप्रायविशेषाभिव्यञ्जकत्वमेव । उदाहरणे स त्वभिव्यक्तोऽभिप्रायो यथास्वं विभावादिरूपताद्वारेण रसादीन्व्यनक्ति । एतदुक्तं भवति—वर्णादिभिः प्रबन्धान्तैः साक्षाद्वा रसोऽभिव्यज्यते विभा- वादिप्रतिपादनद्वारेण यदि वा विभावादिव्यञ्जनद्वारेण परम्परयेति तत्र बन्ध- स्यैतत्परम्परया व्यञ्जकत्वं प्रसङ्गादादावुक्तम् । अधुना तु वर्णपदादीनामुच्यत इति । तेन वृत्तावपि 'अभिव्यज्यमानो दृश्यते' इति । व्यञ्जकत्वं दृश्यत इत्यादौ इत्यादि । वह अभिप्राय व्यक्त होकर शान्त रस में ही परिनिष्ठितता प्राप्त है ॥१५॥ इस प्रकार अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रसादि ध्वनि के यद्यपि वर्णों से लेकर प्रबन्धपर्यन्त व्यञ्जकवर्ग के निरूपण हो जाने पर कोई दूसरा निरूपणीय बच नहीं जाता, तथापि कवि और सहृदयों को शिक्षा देने के लिए फिर भी सूक्ष्म दृष्टि से अन्वय-व्यतिरेक का आश्रयण करके व्यञ्जकवर्ग को कहते हैं—सुप् तिङ् इत्यादि । हम तो इस प्रकार इसके बाद के वृत्तिसहित वाक्य को समझते हैं—सुप् आदि से जो वक्ता के अभिप्राय आदि के रूप में अनुस्वानसदृश ( अनुरणनरूप ) भासित होता है, सुप् आदि से व्यक्त अनुस्वानसदृश इसका भी अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य द्योत्य होता है । 'कहीं पर' इसे पूर्व- कारिका के साथ मिला कर संगति है । सभी जगह सुप् आदि अभिप्रायविशेष के ही व्यञ्जक होते हैं । उदाहरण में वह अभिव्यक्त अभिप्राय यथानुसार विभावादिरूपता के प्रकार से रसादि को व्यञ्जित करता है । बात यह कही गई—वर्ण आदि से प्रबन्ध तक से साक्षात् रस अभिव्यक्त होता है विभावादि के प्रतिपादन के द्वारा, अथवा विभावादि के व्यञ्जन के द्वारा परम्परा से; उनमें बन्ध का इस परम्परा से व्यञ्जक पहले प्रसंगतः कहा है । अब तो वर्ण, पद आदि का कहते हैं । इसलिए वृत्ति में भी 'अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है' ।