ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अलक्ष्यक्रमो ध्वनेरात्मा रसादिः सुब्विशेषैस्तिङ्विशेषैर्वचनविशे- षैः सम्बन्धविशेषैः कारकशक्तिभिः कृद्विशेषैस्तद्धितविशेषैः समासैश्चेति । चशब्दान्निपातोपसर्गकालादिभिः प्रयुक्तैरभिव्यज्यमानो दृश्यते । यथा— न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः । धिग्धिग्छक्रजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच्छूनैः किमेभिर्भुजैः ॥ अलक्ष्यक्रम ध्वनि का आत्मा रसादि प्रयुक्त सुब्विशेष, तिङ्विशेष, वचनविशेष, सम्बन्धविशेष, कारक-शक्ति, कृद्विशेष, तद्धितविशेष और समासों से, ‘और’ ( च ) शब्द से, निपात, उपसर्ग, काल आदि से अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है । जैसे— यही मेरा न्यक्कार ( अपमान ) है, कि मेरे शत्रु हैं, उसमें भी वह तापस है, वह भी यहीं पर राक्षसकुल का हनन कर रहा है, अहो ! रावण भी जी रहा है । इन्द्रजित् मेघनाद को धिक्कार है, धिक्कार है, जगाए गए कुम्भकर्ण से क्या लाभ और स्वर्ग की गांटिया को विलुण्ठन के कारण वृथा ही ( अभिमान से ) फूली इन मेरी भुजाओं से क्या लाभ ? लोचनम् च वाक्यशेषोऽध्याहार्यः विभावादिव्यञ्जनद्वारतया पारम्पर्येणेत्येवंरूपः। ममारय इति। मम शत्रुसद्भावो नोचित इति सम्बन्धानौचित्यं क्रोधविभावं व्यनक्ति अरय इति बहुवचनम् । तपो विद्यते यस्येति पौरुषकथाहीनत्वं तद्धितेन मत्वर्थीयेना- भिव्यक्तम् । तत्रापिशब्देन निपातसमुदायेनात्यन्तासम्भावनीयत्वम् । मत्कर्तृका यदि जीवनक्रिया तदा हननक्रिया तावदनुचिता। तस्यां च स कर्ता अपिशब्दे- न मनुष्यमात्रकम् । अत्रैवेति-मदधिष्ठितो देशोऽधिकरणम् निःशेषेण हन्यमा- ‘व्यञ्जकत्व दिखाई देता है’ इत्यादि में ‘विभावादि के व्यञ्जन के द्वारा परम्परा से’ इस प्रकार का वाक्यशेष अध्याहार कर लेना चाहिए। मेरे शत्रु—। ‘शत्रु’ यह बहुवचन ‘मेरे शत्रु का होना उचित नहीं’ यह सम्बन्धानौचित्य रूप क्रोध के विभाव को व्यञ्जित करता है । ‘तप विद्यमान है जिसका’ इस यत्वर्थीय तद्धित से पुरुषार्थ का अभाव अभि- व्यक्त होता है । निपातसमुदाय रूप ‘तत्रापि’ ( उसमें भी ) शब्द से अत्यन्त असम्भव- नीयता ( अभिव्यक्त होती है )। यदि मैं जी रहा हूं तब हननकार्य अनुचित है । और उस ( क्रिया ) में वह कर्ता, ‘भी’ ( अपि ) शब्द कुत्सित मनुष्यमात्र । यहीं पर—। मेरे द्वारा अधिष्ठित देश अधिकरण, निःशेष रूप से हन्यमान होने से और राक्षसबल