ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३८१ ध्वन्यालोकः अत्र हि श्लोके भूयसा सर्वेषामप्येषां स्फुटमेव व्यञ्जकत्वं दृश्य- ते । तत्र 'मे यदरयः' इत्यनेन सुप्सम्बन्धवचनानामभिव्यञ्जकत्वम् । 'तत्राप्यसौ तापस' इत्यत्र तद्धितनिपातयोः । 'सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः' इत्यत्र तिङ्कारक शक्तीनाम् । 'धिग्वि- क्छक्रजितम्' इत्यादौ श्लोकार्धे कृत्तद्धितसमासोपसर्गाणाम् । एवंवि- इस श्लोक में बहुशः इन सभी का व्यञ्जकत्व दिखाई देता है। उनमें से 'कि मेरे शत्रु हैं' इससे सुप्, सम्बन्ध और वचन का अभिव्यञ्जकत्व है। 'उनमें भी वह तापस है' यहां तद्धित और निपात का । 'वह भी यहीं पर राक्षसकुल का हनन कर रहा है, अहो रावण जी रहा है !' यहां तिङ् और कारक-शक्तियों का। 'इन्द्रजित् (मेघनाद) को धिक्कार है' इत्यादि श्लोकार्ध में कृत्, तद्धित, समास और उपसर्ग लोचनम् नतया राक्षसबलं च कर्मेति तदिदमसंभाव्यमानमुपनतमिति पुरुषकारासम्प- त्तिर्ध्वन्यते तिङ्कारकशक्तिप्रतिपादकैश्च शब्दैः । रावण इति त्वर्थान्तरसङ्क्रमि- तवाच्यत्वं पूर्वमेव व्याख्यातम् । धिग्धिगिति निपातस्य शक्रं जितवानित्याख्या- यिकेयमिति उपपदसमासेन सहकृतः स्वर्गेत्यादिसमासस्य स्वपौरुषानुस्मरणं प्रति व्यञ्जकत्वम् । ग्रामटिकेति स्वार्थिकतद्धितप्रयोगस्य स्त्रीप्रत्ययसहितस्या- बहुमानास्पदत्वं प्रति, विलुण्ठनशब्दे विशब्दस्य निर्दयावस्कन्दनं प्रति व्यञ्जक- त्वम् । वृथाशब्दस्य निपातस्य स्वात्मपौरुषनिन्दां प्रति व्यञ्जकता । भुजैरिति बहुवचनेन प्रत्युत भारमात्रमेतदिति व्यज्यते । तेन तिलशस्तिलशोऽपि विभ- ज्यमानेऽत्र श्लोके सर्व एवांशो व्यञ्जकत्वेन आतीति किमन्यत् । एतदर्थप्रदर्श- नस्य फलं दर्शयति-एवमिति । एकस्य पदस्येति यदुक्तं तदुदाहरति-यथात्रेति । (राक्षसकुल) कर्म, यह सम्भव नहीं होकर सम्भव हो रहा है, इस प्रकार पौरुष का अभाव तिङ् और कारकशक्ति के प्रतिपादक शब्दों से ध्वनित हो रहा है। 'रावण' (कम्पित कर देने वाला) यह अर्थान्तर सङ्क्रमितवाच्यत्व पहले ही व्याख्यान किया जा चुका है। 'शक्र को जीता है' यह आख्यायिका है, इस उपपद समास का साथ देने वाला 'धिक्, धिक्' इस निपात (व्यञ्जक है), स्वर्ग० इत्यादि समास अपने पौरुष के अनुस्मरण के प्रति व्यञ्जक है। 'ग्रामटिका (गउंटिया) इस स्त्री प्रत्यय सहित स्वार्थिक तद्धित प्रयोग का अबहुमानास्पदत्व के प्रति और 'विलुण्ठन' शब्द में 'वि' शब्द का निर्दयतापूर्वक अवस्कन्दन (आक्रमण) के प्रति व्यञ्जकत्व है। निपात 'वृथा' शब्द की अपने पौरुष की निन्दा के प्रति व्यञ्जकता है। 'भुजाओं से' इस बहुवचन से 'प्रत्युत यह भार मात्र है' यह व्यक्त होता है। इस प्रकार तिल-तिल विभाग करने पर इस श्लोक में सभी अंश व्यञ्जक रूप में प्रतीत होता है, और क्या ? इस अर्थ के प्रदर्शन का फल दिखाते हैं—इस प्रकार—। 'एक पद का' जो कहा है उसका उदाहरण देते