ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः धस्य व्यञ्जकभूयस्त्वे च घटमाने काव्यस्य सर्वातिशायिनी बन्ध- च्छाया समुन्मीलति । यत्र हि व्यङ्ग्यावभासिनः पदस्यैकस्यैव ताव- दाविर्भावस्तत्रापि काव्ये कापि बन्धच्छाया किमुत यत्र तेषां बहूनां समवायः । यथात्रानन्तरोदितश्लोके । अत्र हि रावण इत्यस्मिन् पदे- ऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्येन ध्वनिप्रभेदेनालङ्कृतेऽपि पुनरनन्तरोक्तानां का। इस प्रकार के (प्रयोग का) बहुशः व्यञ्जकत्व के घटित होने से काव्य की सर्वातिशायिनी बन्धच्छाया समुन्मीलित होती है। जहां कि व्यङ्ग्य को अवभासित करने वाले एक ही पद का आविर्भाव है वहाँ भी काव्य में बन्धच्छाया है, जहां उन बहुतों का समवाय है (वहां) क्या कहना ? जैसा कि अभी उदाहृत श्लोक में। यहां ‘रावण’ इस पद के ध्वनि के प्रभेद अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य के द्वारा अलंकृत होने पर लोचनम् अतिक्रान्तं न तु कदाचन वर्तमानतामवलम्बमानं सुखं येषु ते काला इति, सर्व एव न तु सुखं प्रति वर्तमानः स कोऽपि काललेश इत्यर्थः । प्रतीपान्युप- स्थितानि वृत्तानि प्रत्यावर्तमानमनानि तथा दूरभावीन्यपि प्रत्युपस्थितानि निक- टतया वर्तमानानि भवन्ति दारुणानि दुःखानि येषु ते । दुःखं बहुप्रकारमेव प्रतिवर्तमानाः सर्वे कालांशा इत्यनेन कालस्य तावन्निर्वेदमभिव्यञ्जयतः शान्त- रसव्यञ्जकत्वम् । देशस्याप्याह-पृथिवी श्वः श्वः प्रातः प्रातर्दिनादिनं पापीय- दिवसाः पापानां सम्बन्धिनः पापिष्ठजनस्वामिका दिवसा यस्यां सा तथो- क्ता । स्वभावत एव तावत्कालो दुःखमयः तत्रापि पापिष्ठजनस्वामिकपृथिवी- लक्षणदेशदौरात्म्याद्विशेषतो दुःखमय इत्यर्थः । तथा हि श्वः श्व इति दिनादिनं गतयौवना वृद्धस्त्रीवदसंभाव्यमानसंभोगा गतयौवनतया हि यो यो दिवस आगच्छति स स पूर्वपूर्वापेक्षया पापीयान् निकृष्टत्वात् । यदि वेयसुनन्तोऽयं हैं—जैसे यहां—। वे समय जिनमें सुख अतिक्रान्त हो गया है, न कि वर्तमानता को अवलम्बन कर रहा है, अर्थात् सभी, न कि सुख के प्रति वर्तमान वह कोई भी काललेश। जिन (समयों) में प्रतिकूल दारुण दुःख गये भी पुनः लौटे हुए और दूर काल में होने- वाले भी निकट रूप से वर्तमान मालूम होते हैं। बहुत प्रकार के ही दुःख को प्रवर्तित करते हुए सभी कालांश हैं, इस प्रकार निर्वेद की व्यञ्जना करते हुए काल का शान्त- रसव्यञ्जकत्व है। देश का भी कहते हैं—पृथिवी हर सुबह, दिन-दिन पापीयदिवसा है अर्थात् पापों के सम्बन्धी, पापिष्ठ जन स्वामी हैं जिनमें ऐसे दिवसों वाली है। अर्थात् स्वभावतः ही दुःखमय है, उसमें भी स्वामी के रूप में पापिष्ठ जनों वाले पृथ्वि के रूप में देश के दौरात्म्य के कारण विशेष रूप से दुःखमय है। जैसा कि दिन-दिन गतयौवना स्त्री की भांति असम्भाव्यमान सम्भोग वाली। यौवन के चले जाने पर जो-जो दिन आता है वह-वह पूर्व-पूर्व की अपेक्षा पापीयान् होता है, क्योंकि निकृष्ट होता है।