ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३८३ ध्वन्यालोकः व्यञ्जकप्रकाराणामुद्भासनम् । दृश्यन्ते च महात्मनां प्रतिभाविशेषभा- जां बाहुल्येनैवंविधा बन्धप्रकाराः । यथा महर्षेर्व्यासस्य— अतिक्रान्तसुखाः कालाः प्रत्युपस्थितदारुणाः । श्वः श्वः पापीयदिवसा पृथिवी गतयौवना ॥ अत्र हि कृत्तद्धितवचनैरलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः, 'पृथिवी गतयौवना' इत्यनेन चात्यन्ततिरस्कृतवाच्यो ध्वनिः प्रकाशितः । एषां च सुबादीनामेकैकशः समुदितानां च व्यञ्जकत्वं महाकवी- नां प्रबन्धेषु प्रायेण दृश्यते । सुबन्तस्य व्यञ्जकत्वं यथा— तालैः शिञ्जललयसुभगैः कान्तया नर्तितो मे यामध्यास्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः सुहृद्वः ॥ भी अभी कहे गए व्यञ्जक प्रकारों का उद्भासन है । प्रतिभाविशेष वाले महात्माओं के बहुशः इस प्रकार के बन्धप्रकार देखे गए हैं । जैसे, महर्षि व्यास का—सुख के समय समाप्त हो गए और दुःख के समय उपस्थित हैं, गतयौवना पृथिवी के उत्तरोत्तर बुरे दिन आ रहे हैं । यहां कृत्, तद्धित और वचन से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य और 'गतयौवना पृथिवी' से अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनि प्रकाशित है । इन सुप् आदि का अलग-अलग और मिल कर व्यञ्जकत्व महाकवियों के प्रबन्धों में प्रायः देखा जाता है । सुबन्त का व्यञ्जकत्व, जैसे— मेरी प्रियतमा द्वारा वलय के झंकारों से सुन्दर तालियां बजा कर नचाया गया तुम्हारा सुहृद मयूर सन्ध्याकाल में जिस ( वासयष्टि ) पर बैठता है । लोचनम् शब्दो मुनिनैव प्रयुक्तो णिजन्तो वा । अत्यन्तेति । सोऽपि प्रकारोऽस्यैवाङ्गता- मेतीति भावः । सुबन्तस्येति । समुदितत्वे तूदाहरणं दत्तं व्यस्तत्वे चोच्यत इति भावः । तालैरिति बहुवचनमनेकविधं वैदग्ध्यं ध्वनत् विप्रलम्भोद्दीपकतामेति । अथवा इयसुन्त शब्द का मुनि ने ही प्रयोग किया है ( यह आर्ष प्रयोग है ), या णिजन्त है । अत्यन्त—। भाव यह कि वह भी प्रकार इसी का अङ्ग हो जाता है । सुबन्त का—। भाव यह कि मिल कर ( व्यञ्जकत्व ) में तो उदाहरण दे दिया, अब अलग-अलग ( व्यञ्जकत्व ) में कहते हैं । तालियां—यह बहुवचन अनेक विध वैदग्ध्य को ध्वनित करता हुआ विप्रलम्भ का उद्दीपक हो रहा है ।