ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तिङन्तस्य यथा— अवसर रोउं चिअ णिम्मिआईं मा पुंस मे हअच्छीईं । दंसणमेत्तुम्मुत्तेहिं जहिं हिअअं तुह ण णाअम् ॥ यथा वा— मा पन्थं रुन्धीओ अवेहि बालअ अहोसि अहिरीओ । अम्हेअ णिरिच्छाओ सुण्णघरं रक्खिदव्वं णो ॥ तिङन्त का, जैसे— हटो, मेरी हत आंखें रोने के लिए ही बनी हैं, ( इन्हें ) मत बढ़ावो, दर्शनमात्र से उन्मत्त जिन्होंने तुम्हारे इस प्रकार के हृदय को नहीं जाना । अथवा जैसे— नासमझ रास्ता मत रोको, हटो, अहो, तुम तो निर्लज्ज हो । हम परतन्त्र हैं, क्योंकि हमें अपने सूने घर की रखवाली करनी है । लोचनम् अपसर रोदितुमेव निर्मिते मा पुंसय हते अक्षिणी मे । दर्शनमात्रोन्मत्ताभ्यां याभ्यां तव हृदयमेवंरूपं न ज्ञातम् ॥ उन्मत्तो हि न किञ्चिज्जानातीति न कस्याप्यत्रापराधः दैवेनेत्थमेव निर्माणं कृतमिति । अपसर मा वृथा प्रयास कार्षीः दैवस्य विपरिवर्तयितुमशक्यत्वा-दिति तिङन्तो व्यञ्जकः तदनुगृहीतानि पदान्तराण्यपीति भावः । मा पन्थानं रुधः अपेहि बालक अप्रौढ अहो असि अह्रीकः । वयं परतन्त्रा यतः शून्यगृहं मामकं रक्षणीयं वर्तते ॥ इत्यत्रापेहीति तिङन्तमिदं ध्वनति—त्वं तावदप्रौढो लोकमध्ये यदेवं प्रकाश-यसि । अस्ति तु सङ्केतस्थानं शून्यगृहं तत्रैवागन्तव्यमिति । 'अन्यत्र व्रज बालक' अप्रौढ बुद्धे स्नान्तीं मां कि प्रकर्षेणालोकयेत्येतत् । भो इति सोल्लुण्ठ-माह्वानम् । जायाभीरुकाणां सम्बन्धितटमेव न भवति । अत्र जायातो ये क्योंकि उन्मत्त कुछ नहीं समझता, इसलिए यहां किसी का अपराध नहीं, दैव ने ऐसा ही निर्माण किया है । भाव यह कि हटो, व्यर्थ प्रयास मत करो, दैव का परिवर्तन नहीं किया जा सकता, इस प्रकार तिङन्त व्यञ्जक है और उसके द्वारा अनुगृहीत पदान्तर भी ( व्यञ्जक ) हैं । यहां 'हटो' यह तिङन्त यह ध्वनित करता है—तुम अप्रौढ़ हो, लोगों के बीच इसे खोल दोगे, सङ्केतस्थान शून्य गृह है, वहीं आना । हे अप्रौढ़ बुद्धि वाले बाल अन्यत्र चले जाओ, स्नान करती हुई मुझे क्यों गुरेर कर देखता है 'अरे' ( भो ), यह सपरिहास आह्वान है । पत्नी से डरने वालों का यह तट ही नहीं होता । यहां पत्नी से जो डरने