भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 445

तृतीय उद्योतः ३८५ ध्वन्यालोकः सम्बन्धस्य यथा— अण्णत्त वच्च बालअ हा अन्ति किं मं पुलोएसिएअम् । भो जाआभीरुआणं तडं विअण होई ॥ कृतकप्रयोगेषु प्राकृतेषु तद्धितविषये व्यञ्जकत्वमावेद्यत एव । अवज्ञातिशये कः । समासानां च वृत्त्यौचित्येन विनियोजने । निपा- तानां व्यञ्जकत्वं यथा— अयमेकपदे तया वियोगः प्रियया चोपनतः सुदुःसहो मे । नववारिधरोदयादहोभिर्भवितव्यं च निरातपार्द्धरम्यैः ॥ सम्बन्ध का जैसे— नासमझ, यहां से हट जा, स्नान करती हुई मुझे क्यों गुरेर कर देखता है, अरे, पत्नी से डरने वालों का यह तट नहीं है ! प्राकृतों में 'क' ( प्रत्यय ) के प्रयोग किए जाने पर तद्धित के विषय में व्यञ्जकत्व प्रतीत किया ही जाता है । ( यहां ) अवज्ञातिशय में 'क' ( प्रयुक्त है ) । और वृत्ति के औचित्य के अनुसार योजना करने पर समासों का ( व्यञ्जकत्व होता है ) । निपातों का व्यञ्जकत्व, जैसे— यह एक साथ ही प्रिया के साथ असह्य मेरा वियोग उपस्थित हो गया और नये बादलों के उमड़ पड़ने से दिन भी आतपरहित, छोटे और रम्य होने लगे । लोचनम् भीरवस्तेषामेतत्स्थानमिति दूरापेतः सम्बन्ध इत्यनेन सम्बन्धेनेर्ष्यातिशयः प्रच्छन्नकामिन्याभिव्यक्तः । कृतकेति कग्रहणं तद्धितोपलक्षणार्थम् । कृतः कप्रत्य- यप्रयोगो येषु काव्यवाक्येषु यथा जायाभीरुकाणामिति । ये ह्यरसज्ञा धर्म- पत्नीषु प्रेमपरतन्त्रास्तेभ्यः कोऽन्यो जगति कुत्सितः स्यादिति कप्रत्ययोऽव- ज्ञातिशयद्योतकः । समासानां चेति । केवलानामेव व्यञ्जकत्वमावेद्यत इति सम्बन्धः । वाले हैं उनका यह स्थान है, यह सम्बन्ध दूरापेत ( अर्थात् बिलकुल नहीं ) है, इस ( षष्ठ्यर्थ ) सम्बन्ध से प्रच्छन्न कामिनी ने ईर्ष्यातिशय अभिव्यक्त किया । 'क' के प्रयोग—। 'क' ग्रहण तद्धित के उपलक्षणार्थ है, किया गया है 'क' प्रत्यय का प्रयोग जिन काव्यवाक्यों में, जैसे 'जायाभीरुकाणाम्' जो अरसज्ञ अपनी धर्मपत्नियों में ही प्रेम- परतन्त्र होते हैं, उनसे ( बढ़कर ) कौन दूसरा संसार में कुत्सित होगा ? इस अवज्ञा- तिशय का 'क' प्रत्यय द्योतक है । समासों का—। सम्बन्ध यह है कि केवल ( समासों ) का ही व्यञ्जकत्व सूचित किया जाता है । २५ ध्व०