भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 680 में से

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पृष्ठ 446

३८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यत्र चशब्दः । यथा वा — मुहुराङ्गुलिसंवृताधरोष्ठं प्रतिषेधाक्षरविक्लवाभिरामम् । मुखमंसविवर्ति पक्ष्मलाक्ष्याः कथमप्युन्नमितं न चुम्बितं तु ॥ अत्र तुशब्दः । निपातानां प्रसिद्धमपीह द्योतकत्वं रसापेक्षयोक्त- मिति द्रष्टव्यम् । उपसर्गाणां व्यञ्जकत्वं यथा— नीवाराः शुकगर्भकोटरमुखभ्रष्टास्तरूणामधः प्रस्निग्धाः क्वचिदिङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः । विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा- स्तोयाधारपथाश्च वल्कलशिखानिष्यन्दलेखाङ्किताः ॥ यहां 'और' शब्द । अथवा, जैसे— बार-बार अङ्गुलियों से ढंके गए अधरोष्ठ वाले, निषेध के अक्षर ( 'नहीं' आदि ) और व्याकुलता से अभिराम ( उस ) पक्ष्मल आँखों वाली ( शकुन्तला ) के कंधे पर मुड़े हुए मुख को किसी प्रकार ऊपर उठा लिया, परन्तु चूम नहीं सका । यहां 'तु' शब्द । यद्यपि निपातों का द्योतकत्व प्रसिद्ध है तथापि यहां ( उनका द्योतकत्व ) रस की अपेक्षा से समझना चाहिए । उपसर्गों का व्यञ्जकत्व, जैसे— नीवार सुग्गों के खोड़लों के अग्रभाग से गिर कर वृक्षों के नीचे पड़े हैं । कहीं पर चिकने पत्थर सूचित करते हैं कि इनसे इंगुदी के फलों का भेदन किया जाता है । हिरण विश्वस्त हो जाने से अभिन्नगति होकर शब्द को सहन करते हैं और जल के बहाव के मार्ग वल्कलों ( वृक्ष की छालों ) के अग्रभाग से टपकती हुई बूंदों की रेखा से अंकित हैं । लोचनम् चशब्द इति जातावेकवचनम् । द्वौ चशब्दावेवमाहतुः काकतालीयन्यायेन गण्डस्योपरि स्फोट इतिवत्तद्वियोगश्च वर्षासमयश्च सममुपगतौ एतदलं प्राणहर- णाय । अत एव रम्यपदेन सुतरामुद्दीपनविभावत्वमुक्तम् । तुशब्द इति । पश्चा- त्तापसूचकस्सन् तावन्मात्रपरिचुम्बनलाभेनापि कृतकृत्यता स्यादिति ध्वनतीति भावः । प्रसिद्धमपीति। वैयाकरणादिगृहेषु हि प्राक्प्रयोगस्वातन्त्र्यप्रयोगाभावात्- 'और' शब्द जाति में एकवचन है । दो 'और' ( 'च' ) शब्द इस प्रकार कहते हैं—काकतालीयन्याय से गण्ड के ऊपर फोड़े की भांति उसका वियोग और वर्षाकाल दोनों साथ ही प्राप्त हो गए हैं, यह प्राणहरण के लिए काफी है । अतएव 'रम्य' पद से सुतरां उद्दीपन विभाव को कहा है । 'तु' शब्द—। भाव यह कि पश्चात्ताप का सूचक होता हुआ उतने मात्र परिचुम्बन के लाभ से भी कृतकृत्यता ही यह ध्वनित करता है । प्रसिद्ध है तथापि—। भाव यह कि वैयाकरण आदि के घरों में ( धातु के ) पहले