ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३८७ ध्वन्यालोकः इत्यादौ। द्वित्राणां चोपसर्गाणामेकत्र पदे यः प्रयोगः सोऽपि रसव्यक्त्यनुगुणतयैव निर्दोषः। यथा—'प्रभ्रश्यत्युत्तरीयत्विषि तमसि समुद्वीक्ष्य वीतावृतीन्द्राग्जन्तून्' इत्यादौ। यथा वा—'मनुष्यवृत्त्या समुपाचरन्तम्' इत्यादौ। इत्यादि में। दो-तीन उपसर्गों का भी एक पद में जो प्रयोग है वह भी रस की व्यञ्जना के अनुगुण रूप से ही निर्दोष है। जैसे—उत्तरीय की भांति अन्धकार के विगलित हो जाने पर सद्यः जन्तुओं को आवरण से रहित देखकर०, इत्यादि में (समुद्वीक्ष्य = देखकर इस स्थल में)। अथवा, जैसे—मनुष्य के व्यापार से समुपा- चरण करते हुए को०, इत्यादि में। लोचनम् षष्ठ्याद्यश्रवणालिङ्गसंख्याविरहाच्च वाचकवैलक्षण्येन द्योतका निपाता इत्युद्धो- ष्यत एवेति भावः। प्रकर्षेण स्निग्धा इति प्रशब्दः प्रकर्षं द्योतयन्निङ्गुदीफलानां सरसत्वमाचक्षाण आश्रमस्य सौन्दर्यातिशयं ध्वनति। 'तापसस्य फलविशेष- विषयोऽभिलाषातिरेको ध्वन्यते' इति त्वसत्; अभिज्ञानशाकुन्तले हि राज्ञ इयमुक्तिर्न तापसस्येत्यलम्। द्वित्राणामित्यनेनाधिक्यं निरस्यति। सम्यगुच्चै- र्विशेषेणोेक्षितत्वे भगवतः कृपातिशयोऽभिव्यक्तः। मनुष्यवृत्त्या समुपाचरन्तं स्वबुद्धिसामान्यकृतानुमानाः। योगीश्वरैरप्यसुबोधमीश त्वां बोद्धुमिच्छन्त्यबुधाः स्वतकैः॥ सम्यग्भूतमुपांशुकृत्वा आ समन्ताच्चरन्तमित्यनेन लोकानुजिघृक्षातिशय- स्तत्तदाचरतः परमेश्वरस्य ध्वनितः। ही प्रयोग होने, स्वतन्त्र रूप से प्रयोग न होने, षष्ठी आदि के श्रवण न होने और लिङ्ग तथा संख्या के न होने के कारण निपात शब्द वाचक शब्द से विलक्षण रूप से द्योतक घोषित किए गए हैं। (प्रस्निग्धाः) अर्थात् 'प्रकर्षेण स्निग्धाः' इसमें 'प्र' शब्द प्रकर्ष द्योतित करता और इङ्गुदीफलों का सरसत्व कहता हुआ आश्रम के अतिशय सौन्दर्य को ध्वनित करता है। 'तापस का फलविशेष के सम्बन्ध में अभिलाषातिरेक ध्वनित होता है' यह (व्याख्यान) गलत है, क्योंकि 'अभिज्ञानशाकुन्तल' में यह राजा की उक्ति है, न कि तापस की, इत्यलम्। दो-तीन इस (कथन) से आधिक्य का निरास करते हैं। (समुद्वीक्ष्य = देखकर) सम्यक् अर्थात् उच्चैः, विशेष रूप से ईक्षित (दृष्ट) होने में भगवान् (सूर्य) का कृपातिशय अभिव्यक्त होता है। मनुष्य के व्यापार से समुपाचरण करते हुए, योगीश्वरों द्वारा भी दुर्बोध आपको हे ईश, अपनी सामान्य बुद्धिसे अनुमान करके अबुध जन अपने तर्कों से जानना चाहते हैं। 'सम्यक् भूतमुपांशुकृत्वा आ समन्तात् चरन्तं' इससे तत् तत् का आचरण करते हुए परमेश्वर का लोकानुग्रह का इच्छातिशय अभिव्यक्त किया।