भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 680 में से

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पृष्ठ 448

३८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः निपातानामपि तथैव। यथा—‘अहो बतासि स्पृहणीयवीर्यः’ इत्यादौ। यथा वा— ये जीवन्ति न मान्ति ये स्म वपुषि प्रीत्या प्रनृत्यन्ति च प्रस्यन्दिप्रमदाश्रवः पुलकिता दृष्टे गुणिन्यूर्जिते। हा धिक्कष्टमहो क्व यामि शरणं तेषां जनानां कृते नीतानां प्रलयं शठेन विधिना साधुद्विषः पुष्यता॥ इत्यादौ। पदपौनरुक्त्यं च व्यञ्जकत्वापेक्षयैव कदाचित्प्रयुज्यमानं शोभा- मावहति। यथा— यद्वञ्चनाहितमतिर्बहुचाटुगर्भं कार्योन्मुखः खलजनः कृतकं ब्रवीति। निपातों का भी उसी प्रकार। जैसे—'अहो तुम स्पृहणीय पराक्रम वाले हो!' इत्यादि में। अथवा, जैसे— गुणीजन की वृद्धि देख कर आनन्द के अश्रु प्रवाहित करने वाले एवं पुलकित होने वाले जो व्यक्ति जीवित हैं, (खुशी के मारे) जो अपने शरीर में अंट नहीं पाते, प्रीति से नृत्य करने लग जाते हैं, उन जनों के लिए, जिन्हें दुष्टों को प्रश्रय देने वाले शठ विधाता ने समाप्त कर डाला है, किसकी शरण में जाऊं? हा धिक् कष्टम्! इत्यादि में। पदपौनरुक्त्य भी व्यञ्जकत्व की अपेक्षा से ही कदाचित् प्रयुज्यमान होकर शोभा प्राप्त करता है। जैसे— जो कि धोखा देने में लगी बुद्धि वाला, काम निकालने वाला दुष्ट जन बहुत लोचनम् तथैवेति। रसव्याञ्जकत्वेन द्वित्राणामपि प्रयोगो निर्दोष इत्यर्थः। श्लाघा- तिशयो निर्वेदातिशयश्च अहो बतेति हा धिगिति च ध्वन्यते। प्रसङ्गात्पौन- रुक्त्यान्तरमपि व्यञ्जकमित्याह—पदपौनरुक्त्यमिति। पदग्रहणं वाक्यादेरपि उसी प्रकार—। अर्थात् रसके व्यञ्जक रूप से दो-तीन (निपातों) का प्रयोग निर्दोष है। 'अहो' 'बत' 'हा' 'धिक्' से श्लाघातिशय और निर्वेदातिशय ध्वनित होते हैं। प्रसङ्ग से 'पौनरुक्त्यान्तर भी व्यञ्जक है, यह कहते हैं—पदपौनरुक्त्य—। 'पद' ग्रहण वाक्यादि का भी यथासम्भव उपलक्षण है। समझते हैं—। 'वे ही सब कुछ