ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३८९ ध्वन्यालोकः तत्साधवो न न विदन्ति विदन्ति किन्तु कर्तुं वृथाप्रणयमसय न पारयन्ति ॥ इत्यादौ । कालस्य व्यञ्जकत्वं यथा— समविसमर्णिविसेसा समन्तओ मन्दमन्दसंआरा । अइरा होहिन्ति पहा मणोरहाणं पि दुल्लंघा ॥ [ समविषमनिर्विशेषाः समन्ततो मन्दमन्दसञ्चाराः । अचिराद्भविष्यन्ति पन्थानो मनोरथानामपि दुर्लङ्घ्याः ॥ इति छाया ] खुशामद से भरी बनावटी बात करता है उसे साधुजन नहीं समझते हैं यह नहीं, समझते हैं, किन्तु वे लोग उसके आग्रह को व्यर्थ करने में समर्थ नहीं हो पाते । इत्यादि में । काल का व्यञ्जकत्व, जैसे— शीघ्र ही चारों ओर ( वर्षाकाल में पानी भर जाने के कारण ) मार्ग सम और विषम के भेद से रहित, अत्यन्त मन्द सञ्चार योग्य एवं मनोरथों के भी दुर्लङ्घ्य हो जायेंगे । लोचनम् यथासम्भवमुपलक्षणम् । विदन्तीति । त एव हि सर्वं विदन्ति सुतरामिति ध्वन्यते । वाक्यपौनरुक्त्यं यथा—'पश्य द्वीपादन्यस्मादपि' इति वचनानन्तरं 'कः सन्देहः ? द्वीपादन्यस्मादपि' इत्यनेनेप्सितप्राप्तिरविघ्नितैव ध्वन्यते । 'किं किम् ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इत्यनेनामर्षातिशयः । 'सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' इत्युन्मादातिशयः । कालस्येति । तिङन्तपदानुप्रविष्टस्याप्यर्थकलापस्य कारककालसंख्योपग्रह- रूपस्य मध्येऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सूक्ष्मदृशा भागगतमपि व्यञ्जकत्वं विचार्य- ठीक-ठीक समझते हैं, यह ध्वनित होता है । वाक्यपौनरुक्त्य, जैसे—( 'रत्नावली' में ) 'द्वीपादन्यस्मादपि' इस वचन के बाद 'कः सन्देहः द्वीपादन्यस्मादपि' इससे ईप्सित वस्तु की प्राप्ति विघ्नरहित ही है यह ध्वनित होता है । 'किं किं ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इससे अमर्षातिशय ( ध्वनित होता है ) । सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' यह ( वक्ता का ) उन्मादातिशय ध्वनित होता है । काल का—। भाव यह कि कारक, काल, संख्या, उपग्रह रूप तिङन्त पद में अनुप्रविष्ट अर्थसमूह के बीच अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सूक्ष्म दृष्टि से भागगत ( अर्थात् कारक आदि चारों के एकदेश भूत कालगत ) भी व्यञ्जकत्व का विचार करना चाहिए ।