ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
तृतीय उद्योतः ३८९ ध्वन्यालोकः तत्साधवो न न विदन्ति विदन्ति किन्तु कर्तुं वृथाप्रणयमसय न पारयन्ति ॥ इत्यादौ । कालस्य व्यञ्जकत्वं यथा— समविसमर्णिविसेसा समन्तओ मन्दमन्दसंआरा । अइरा होहिन्ति पहा मणोरहाणं पि दुल्लंघा ॥ [ समविषमनिर्विशेषाः समन्ततो मन्दमन्दसञ्चाराः । अचिराद्भविष्यन्ति पन्थानो मनोरथानामपि दुर्लङ्घ्याः ॥ इति छाया ] खुशामद से भरी बनावटी बात करता है उसे साधुजन नहीं समझते हैं यह नहीं, समझते हैं, किन्तु वे लोग उसके आग्रह को व्यर्थ करने में समर्थ नहीं हो पाते । इत्यादि में । काल का व्यञ्जकत्व, जैसे— शीघ्र ही चारों ओर ( वर्षाकाल में पानी भर जाने के कारण ) मार्ग सम और विषम के भेद से रहित, अत्यन्त मन्द सञ्चार योग्य एवं मनोरथों के भी दुर्लङ्घ्य हो जायेंगे । लोचनम् यथासम्भवमुपलक्षणम् । विदन्तीति । त एव हि सर्वं विदन्ति सुतरामिति ध्वन्यते । वाक्यपौनरुक्त्यं यथा—'पश्य द्वीपादन्यस्मादपि' इति वचनानन्तरं 'कः सन्देहः ? द्वीपादन्यस्मादपि' इत्यनेनेप्सितप्राप्तिरविघ्नितैव ध्वन्यते । 'किं किम् ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इत्यनेनामर्षातिशयः । 'सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' इत्युन्मादातिशयः । कालस्येति । तिङन्तपदानुप्रविष्टस्याप्यर्थकलापस्य कारककालसंख्योपग्रह- रूपस्य मध्येऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सूक्ष्मदृशा भागगतमपि व्यञ्जकत्वं विचार्य- ठीक-ठीक समझते हैं, यह ध्वनित होता है । वाक्यपौनरुक्त्य, जैसे—( 'रत्नावली' में ) 'द्वीपादन्यस्मादपि' इस वचन के बाद 'कः सन्देहः द्वीपादन्यस्मादपि' इससे ईप्सित वस्तु की प्राप्ति विघ्नरहित ही है यह ध्वनित होता है । 'किं किं ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इससे अमर्षातिशय ( ध्वनित होता है ) । सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' यह ( वक्ता का ) उन्मादातिशय ध्वनित होता है । काल का—। भाव यह कि कारक, काल, संख्या, उपग्रह रूप तिङन्त पद में अनुप्रविष्ट अर्थसमूह के बीच अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सूक्ष्म दृष्टि से भागगत ( अर्थात् कारक आदि चारों के एकदेश भूत कालगत ) भी व्यञ्जकत्व का विचार करना चाहिए ।
३९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र ह्यचिराद्भविष्यन्ति पन्थान इत्यत्र भविष्यन्तीत्यस्मिन् पदे प्रत्ययः कालविशेषाभिधायी रसपरिपोषहेतुः प्रकाशते । अयं हि गाथार्थः प्रवासविप्रलम्भशृङ्गारविभावतया विभाव्यमानो रसवान् । यथात्र प्रत्ययांशो व्यञ्जकस्तथा क्वचित्प्रकृत्यंशोऽपि दृश्यते । यथा— तद्गेहं नतभित्ति मन्दिरमिदं लब्धावगाहं दिवः सा धेनुर्जरती चरन्ति करिणामेता घनाभा घटाः । स क्षुद्रो मुसलध्वनिः कलमिदं सङ्गीतकं योषिता- माश्चर्यं दिवसैर्द्विजोऽयमीयतीं भूमिं समारोपितः ॥ अत्र श्लोके दिवसैरित्यस्मिन् पदे प्रकृत्यंशोऽपि द्योतकः । सर्व- नाम्नां च व्यञ्जकत्वं यथानन्तरोक्ते श्लोके । अत्र च सर्वनाम्नामेव यहां 'शीघ्र ही मार्ग हो जायेंगे' इसमें 'हो जायेंगे' इस पद में प्रत्यय कालविशेष का अभिधान करने वाला एवं रसपरिपोष का हेतु प्रकाशित होता है । यह गाथार्थ प्रवास विप्रलम्भ शृङ्गार के विभाव के रूप में विभाव्यमान होकर रसवान् हो जाता है । जैसे यहां प्रत्ययांश व्यञ्जक है वैसे कहीं पर प्रकृत्यंश भी देखा जाता है । जैसे— झुकी भीतों वाला वह घर (और कहां) यह आकाश का अवगाहन करने वाला (आलीशान) भवन; वह बूढ़ी गाय (और कहां) यह हाथियों का झुण्ड घूम रहा है; वह मूसल की क्षुद्र आवाज (और कहां) यह महिलाओं का अव्यक्त-मधुर सङ्गीत; आश्चर्य है कि (कुछ ही) दिनों में यह ब्राह्मण इस अवस्था तक पहुंचा दिया गया ! इस श्लोक में 'दिनों में' ('दिवसैः') इस पद में प्रकृत्यंश भी द्योतक है । सर्व- नामों का व्यञ्जकत्व जैसे अभी कहे गए (इस) श्लोक में । यहां सर्वनामों के ही व्यञ्जकत्व को कवि ने मन में रख कर 'क्व' इत्यादि शब्द का प्रयोग नहीं किया है । लोचनम् मिति भावः । रसपरिपोषेति । उत्प्रेक्ष्यमाणो वर्षासमयः कम्पकारी किमुत वर्तमान इति ध्वन्यते । अंशांशिकप्रसङ्गादेवाह—यथात्रेति । दिवसार्थो ह्यत्रात्यन्तासम्भाव्यमानतामस्यार्थस्य ध्वनति । सर्वनाम्नां चेति । प्रकृत्यंशस्य चेत्यर्थः । तेन प्रकृत्यंशेन सम्भूय सर्वनामव्यञ्जकं दृश्यत इत्युक्तं रसपरिपोष—। उत्प्रेक्ष्यमाण कम्पकारी वर्षा समय क्या वर्तमान है ? यह ध्वनित होता है । अंशांशिक प्रसंग से ही कहते हैं—जैसे यहाँ—। यहाँ 'दिवस' का अर्थ इस अर्थ की अत्यन्त असम्भाव्यमानता ध्वनित करता है । सर्वनामों का—। अर्थात् प्रकृत्यंश का । उस प्रकृत्यंश के साथ मिलकर सर्वनाम व्यञ्जक
तृतीय उद्योतः ३९१ ध्वन्यालोकः व्यञ्जकत्वं हृदि व्यवस्थाप्य कविना क्लेत्यादिशब्दप्रयोगो न कृतः । अनया दिशा सहृदयैरन्येऽपि व्यञ्जकविशेषाः स्वयमुत्प्रेक्षणीयाः । एत- च्च सर्वं पदवाक्यरचनाद्योतननोक्त्यैव गतार्थमपि वैचित्र्येण व्युत्पत्तये पुनरुक्तम् । इस ढङ्ग से सहृदयों को अन्य भी व्यञ्जक विशेषों की उत्प्रेक्षा स्वयं करनी चाहिए । यह सब पद, वाक्य और रचना के द्योतन के कथन से ही गतार्थ था तब भी वैचित्र्य से व्युत्पत्ति के लिए फिर से कहा है । लोचनम् भवतीति न पौनरुक्त्यम् । तथा हि तदिति पदं नतभित्तीत्येतत्प्रकृत्यंशसहायं समस्तामङ्गलनिधानभूतां मूषकाद्याकीर्णतां ध्वनति । तदिति हि केवलमुच्य- माने समुत्कर्षातिशयोऽपि संभाव्येत । न च नतभित्तिशब्देनाप्येते दौर्भाग्याय- तनत्वसूचका विशेषा उक्ताः । एवं सा धेनुरित्यादावपि योज्यम् । एवंविधे च विषये स्मरणाकारद्योतकता तच्छब्दस्य । न तु यच्छब्दसंबद्धतेत्युक्तं प्राक् । अत एवात्र तदिदंशब्दादिना स्मृत्यनुभवयोरत्यन्तविरुद्धविषयतासूचनेनाश्चर्य- विभावता योजिता । तदिदंशब्दाद्यभावे तु सर्वमसङ्गतं स्यादिति तदिदमंश- योरेव प्राणत्वं योज्यम् । एतच्च द्विशः सामस्त्यं त्रिशः सामस्त्यमिति व्यञ्जक- मित्युपलक्षणपरम् । तेन लोष्टप्रस्तारन्यायेनानन्तवैचित्र्यमुक्तम् । यद्वक्ष्यत्य- न्येऽपीति । अतिविक्षिप्ततया शिष्यबुद्धिसमाधानं न भवेदित्यभिप्रायेण संक्षिपति—एतच्चेति । वितत्याभिधानेऽपि प्रयोजनं स्मारयति—वैचित्र्येणेति । देखा जाता है, अतः पौनरुक्त्य नहीं है । जैसा कि 'वह' यह पद 'झुकी भीतोंवाला' ('नतभित्ति') इस प्रकृत्यंश की सहायता से समस्त अमङ्गलों का निधानभूत मूषक आदि द्वारा आकीर्णता को ध्वनित करता है। केवल 'वह' ('तत्') कहते तो अतिशय समुत्कर्ष भी सम्भावित होने लगता । न कि (केवल) 'नतभित्ति' शब्द से भी दौर्भाग्य के आयतनत्व के सूचक ये विशेष कहे गए हैं। इस प्रकार 'वह गाय' इत्यादि में भी लगाना चाहिए। इस प्रकार के विषय में 'वह' ('तत्') शब्द स्मरण के आकार का द्योतन करता है, न कि 'जो' ('यत्') शब्द के साथ सम्बद्ध है यह पहले कह चुके हैं। अत एव यहाँ 'तत्' और 'इदं' ('वह' और 'यह') शब्द आदि से स्मृति और अनुभव की अत्यन्त विरुद्धविषयता के सूचन द्वारा आश्चर्य की विभावता योजित की है। 'तत्' और 'इदं' शब्द आदि के अभाव में सब असङ्गत हो जाता, इसलिए 'तत्' और 'इदं' (अर्थात् 'वह' और 'यह') इस अंशों को प्राण (चमत्कारकारी) समझना चाहिए । और यह दो का सामस्त्य और तीन का सामस्त्य व्यञ्जक है, यह उपलक्षण में तात्पर्य रखता है । इस लिए 'लोष्टप्रस्तारन्याय' से अनन्त वैचित्र्य कहा गया । अत्यन्त प्रसृत होने के कारण शिष्य की बुद्धि का समाधान नहीं होगा, इस अभिप्राय से संक्षेप करते हैं—यह सब—। विस्तार करके कथन में भी प्रयोजन की याद दिलाते हैं—वैचित्र्य—।
३९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः ननु चार्थसामर्थ्याक्षेप्या रसादय इत्युक्तम्, तथा च सुबादीनां व्यञ्जकत्ववैचित्र्यकथनमनन्वितमेव । उक्तमत्र पदानां व्यञ्जकत्वो- क्त्यवसरे । किञ्चार्थविशेषाक्षेप्यत्वेऽपि रसादीनां तेषामर्थविशेषाणां व्य- ञ्जकशब्दाविनाभावित्वादयथाप्रदर्शितं व्यञ्जकस्वरूपपरिज्ञानं विभज्यो- पयुज्यत एव । शब्दविशेषाणां चान्यत्र च चारुत्वं यद्विभागेनोपदर्शितं तदपि तेषां व्यञ्जकत्वेनैवावस्थितमित्यवगन्तव्यम् । ( शङ्का ) अर्थ की सामर्थ्य से रसादि आक्षिप्त होते हैं यह कहा गया है, फिर सुप् आदि का व्यञ्जकत्व-वैचित्र्य कहना असम्बद्ध ही है ! ( समाधान ) पदों के व्यञ्ज- कत्व के अवसर में इस सम्बन्ध में कह चुके हैं । और भी, रसादि का अर्थविशेष द्वारा आक्षेप स्वीकार करने पर भी उनकी अर्थविशेषों के व्यञ्जक शब्दों के बिना प्रतीति न होने के कारण जैसा कि दिखाया गया है ( उस प्रकार ) व्यञ्जक के स्वरूप का परिज्ञान विभाग करके उपयोगी है ही । यह जानना चाहिए कि अन्यत्र शब्द- विशेषों का जो चारुत्व अलग-अलग दिखाया गया है वह भी उनके व्यञ्जकत्व से ही व्यवस्थित है । लोचनम् नन्विति । पूर्वं निर्णीतमप्येतदविस्मरणार्थमधिकामिधानार्थं चाक्षिप्तम् । उक्तमत्रेति । न वाचकत्वं ध्वनिव्यवहारोपयोगि येनावाचकस्य व्यञ्जकत्वं न स्यात् इति प्रागेवोक्तम् । ननु न गीतादिवद्रसाभिव्यञ्जकत्वेऽपि शब्दस्य तत्र व्यापारोऽस्त्येव; स च व्यञ्जनात्मकैवेति भावः । एतच्चास्माभिः प्रथमोद्द्योते निर्णीतचरम् । न चेदमस्माभिरपूर्वमुक्तमित्याह—शब्दविशेषाणां चेति । अन्यत्रेति । भामहविवरणे । विभागेनेति । स्रक्चन्दनादयः शब्दाः शृङ्गारे चारवो बीभत्से त्वचारव इति रसकृत एव विभागः । रसं प्रति च शब्दस्य व्यञ्जकत्वमेवेत्युक्तं प्राक् । ( शङ्का )—। पहले निर्णीत होने पर भी भूल न जाय इसके लिए और अधिक बात कहने के लिए आक्षेप किया है । इस सम्बन्ध में कह चुके हैं—। यह पहले ही कह चुके हैं कि वाचकत्व ध्वनि के व्यवहार में उपयोगी नहीं है, जिससे अवाचक का व्यञ्जकत्व नहीं होता । भाव यह कि गीतादि की भाँति रसाभिव्यञ्जक होने पर भी शब्द का उसमें व्यापार नहीं है और वह ( शब्द ) व्यञ्जनरूप ही है । इसे हम प्रथम उद्योत में निर्णय कर चुके हैं । न कि यह बिलकुल अपूर्व बात कही है, यह कहते हैं— शब्दविशेषों का—। अन्यत्र—भामह के विवरण में । अलग-अलग— माला, चन्दन आदि शब्द शृङ्गार में सुन्दर और बीभत्स में असुन्दर हैं, इस प्रकार विभाग रसकृत ही है । यह पहले कह चुके हैं कि रस के प्रति शब्द का व्यञ्जकत्व ही है ।
तृतीय उद्योतः ३९३ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः यत्रापि तत्सम्प्रति न प्रतिभासते तत्रापि व्यञ्जके रचनान्तरे यद् दृष्टं सौष्ठवं तेषां प्रवाहपतितानां तदेवाभ्यासादपोद्धृतानामप्यव- भासत इत्यवसातव्यम् । कोऽन्यथा तुल्ये वाचकत्वे शब्दानां चारुत्व- विषयो विशेषः स्यात् । जहां भी वह इस समय नहीं मालूम पड़ता वहां भी व्यञ्जक दूसरी रचना में जो सौष्ठव देखा गया है, प्रवाह में पड़े हुए उनका वही (चारुत्व) अभ्यासवश प्रतीत होता है, यह समझना चाहिए। अन्यथा समानवाचकत्व के होने पर शब्दों के चारुत्व का विशेष कौन होता ? लोचनम् यत्रापीति । स्रक्चन्दनादिशब्दानां तदानीं शृङ्गारादिव्यञ्जकत्वाभावेऽपि व्यञ्जकत्वशक्तेर्भूयसा दर्शनात्तदधिवाससुन्दरीभूतमर्थं प्रतिपादयितुं सामर्थ्य- मस्ति । तथाहि—'तटी तारं ताम्यति' इत्यत्र तटशब्दस्य पुंस्त्वनपुंसकत्वे अनादृत्य स्त्रीत्वमेवाश्रितं सहृदयैः 'स्त्रीति नामापि मधुरम्' इति कृत्वा । यथा वास्मदुपाध्यायस्य विद्वत्कविसहृदयचक्रवर्तिनो भट्टेन्दुराजस्य— इन्दीवरद्युति यदा बिभृयान्न लक्ष्म स्युर्विस्मयैकसुहृदोऽस्य यदा विलासाः । स्यान्नाम पुण्यपरिणामवशात्तथापि किं किं कपोलतलकोमलकान्तिरिन्दुः ॥ अत्र हीन्दीवरलक्ष्मविस्मयसुहृद्विलासनामपरिणामकोमलादयः शब्दाः शृङ्गाराभिव्यञ्जनदृष्टशक्तयोऽत्र परं सौन्दर्यमावहन्ति । अवश्यं चैतदभ्युपगन्त- जहाँ भी—। माला, चन्दन आदि शब्दों का उस समय (अर्थात् शृङ्गार के अतिरिक्त स्थल में) शृङ्गारादि के व्यञ्जक न होने पर भी (उनकी) व्यञ्जकत्वशक्ति के बार-बार देखे जाने के कारण उनके रहने से सुन्दर हुए अर्थ को प्रतिपादन करने की सामर्थ्य है। जैसा कि 'तटी तारं ताम्यति' ( 'तटी जोर से क्लान्त हो रही है' ) यहाँ सहृदयों ने 'तट' शब्द के पुंस्त्व और नपुंसकत्व का अनादर करके स्त्रीत्व का ही आश्रयण किया है यह समझ कर 'स्त्री' यह नाम भी मधुर है। अथवा, जैसे विद्वानों, कवियों और सहृदयों के चक्रवर्ती हमारे उपाध्याय भट्ट इन्दुराज का— पुण्यों के परिणामवश यदि चन्द्रमा नील चिह्न धारण नहीं करता, यदि इसके विलास विस्मय के एकमात्र सुहृद् होते, तथापि (सुन्दरी के) कपोलतल की भांति कोमल कान्तिवाला, क्या-क्या हो सकता था ? यहाँ शृङ्गार के अभिव्यञ्जन में दृष्टशक्ति वाले नीलकमल (इन्दीवर), चिह्न, विस्मय, सुहृद्, विलास, (नाम), परिणाम, कोमल आदि शब्द अधिक सौन्दर्य धारण
३९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अन्य एवासौ सहृदयसंवेद्य इति चेत्, किमिदं सहृदयत्वं नाम ? किं रसभावानपेक्षकाव्याश्रितसमयविशेषाभिज्ञत्वम्, उत रसभावादिमयकाव्यस्वरूपपरिज्ञाननैपुण्यम् । पूर्वस्मिन् पक्षे तथा- विधसहृदयव्यवस्थापितानां शब्दविशेषाणां चारुत्वनियमो न स्यात् । पुनः समयान्तरेणान्यथापि व्यवस्थापनसम्भवात् । द्वितीयस्मिंस्तु पक्षे रसज्ञतैव सहृदयत्वमिति । तथाविधैः सहृदयैः संवेद्यो रसादिसमर्पण- सामर्थ्यमेव नैसर्गिकं शब्दानां विशेष इति व्यञ्जकत्वाश्रयमेव तेषां मुख्यं चारुत्वम् । वाचकत्वाश्रयाणान्तु प्रसाद एवार्थापेक्षायां तेषां विशेषः । अर्थानपेक्षायां त्वनुप्रासादिरेव ॥ १५-१६ ॥ अन्य ही वह कोई सहृदयसंवेद्य है यदि यह कहो (तो प्रश्न है कि) यह सहृदयत्व क्या है ? क्या रस, भाव की अपेक्षा न करके काव्य के आश्रित समय (संकेत) विशेष की जानकारी रखना (सहृदयत्व) है, अथवा रस, भाव आदि से युक्त काव्य के स्वरूप के परिज्ञान का नैपुण्य (सहृदयत्व) है ? पहले पक्ष में उस प्रकार के सहृदय द्वारा व्यवस्थापित शब्दविशेषों के चारुत्व का नियम नहीं होगा, क्योंकि पुनः दूसरे समय (संकेत) के अनुसार अन्यथा भी व्यवस्थापन सम्भव होगा । किन्तु दूसरे पक्ष में रसज्ञता ही सहृदयत्व है । उस प्रकार के सहृदयों द्वारा संवेद्य शब्दों का विशेष रसादि के समर्पण की नैसर्गिक सामर्थ्य ही है, इस प्रकार व्यञ्जकत्व के आश्रित रहने वाला ही उनका मुख्य चारुत्व है । परन्तु वाचकत्व के आश्रित (उन शब्दों का) विशेष अर्थ की अपेक्षा होने पर प्रसाद ही है । अर्थ की अपेक्षा न होने पर अनुप्रास आदि ही । लोचनम् व्यमित्याह—कोऽन्यथेति । असंवेद्यस्तावदसौ न युक्त इत्याशयेनाह— सहृदयेति । पुनरिति । अनियन्त्रितपुरुषेच्छाऽऽयत्तो हि समयः कथं नियतः स्यात् । मुख्यं चारुत्वमिति । विशेष इति पूर्वेण सम्बन्धः । अर्थापेक्षायामिति । वाच्यापेक्षायामित्यर्थः । अनुप्रासादिरेवेति । शब्दान्तरेण सह या रचना करते हैं । और इसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए, यह कहते हैं—अन्यथा—। वह असंवेद्य होकर ठीक न होगा, इस आशय से कहते हैं—सहृदय—। पुनः—। क्योंकि पुरुष की अनियन्त्रित इच्छा के अधीन समय (सङ्केत) कैसे नियत होगा ? मुख्य- चारुत्त्व—। 'विशेष' यह पूर्व से सम्बन्ध है । अर्थ की अपेक्षा होने पर—। अर्थात् वाच्य की अपेक्षा होने पर । अनुप्रास आदि ही—। अर्थात् दूसरे शब्द के साथ जो रचना है उसकी अपेक्षावाला वह विशेष । आदि ग्रहण से शब्दगुण और शब्दालङ्कारों का
तृतीय उद्योतः ३९५ ध्वन्यालोकः एवं रसादीनां व्यञ्जकस्वरूपमभिधाय तेषामेव विरोधिरूपं लक्ष- यितुमिदमुपक्रम्यते— प्रबन्धे मुक्तके वापि रसादीन्बन्धुमिच्छता । यत्नः कार्यः सुमतिना परिहारे विरोधिनाम् ॥ १७ ॥ प्रबन्धे मुक्तके वापि रसभावनिबन्धनं प्रत्यादृतमनाः कविर्विरो- धिपरिहारे परं यत्नमादधीत । अन्यथा त्वस्य रसमयः श्लोक एकोऽपि सम्यङ् न सम्पद्यते ॥ १७ ॥ इस प्रकार रस आदि के व्यञ्जक के स्वरूप का अभिधान करके उन्हीं के (रसादि के) विरोधी रूप को लक्षित करने के लिए यह उपक्रम करते हैं— प्रबन्ध में अथवा मुक्तक में भी रस आदि का निबन्धन करना चाहते हुए सुमति (कवि) को विरोधियों के परिहार में यत्न करना चाहिए ॥ १७ ॥ प्रबन्ध में अथवा मुक्तक में भी रसभाव के निबन्धन के प्रति आदरयुक्त मन वाला कवि विरोधियों के परिहार में अधिक यत्न करे । अन्यथा, इसका एक भी श्लोक सम्यक् रसमय सम्पन्न नहीं होगा । लोचनम् तदपेक्षोऽसौ विशेष इत्यर्थः । आदिग्रहणाच्छन्दोगुणालङ्काराणां सङ्ग्रहः । अत एव रचनया प्रसादेन चारुत्वेन चोपबृंहिता एव शब्दाः काव्ये योज्या इति तात्पर्यम् ॥ १५–१६ ॥ रसादीनां यद्व्यञ्जकं वर्णपदादिप्रबन्धान्तं तस्य स्वरूपमभिधायेति सम्बन्धः । उपक्रम्यत इति । विरोधिनामपि लक्षणकरणे प्रयोजनमुच्यते शक्य- हानत्वं नाम अनया कारिकया । लक्षणं तु विरोधि रससम्बन्धीत्यादिना भविष्यतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ ननु 'विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः' इति यदुक्तं तत एव व्यति- सङ्ग्रह है । अतएव रचना से, प्रसाद से और चारुत्व से उपबृंहित ही शब्दों की काव्य में योजना करनी चाहिए, यह तात्पर्य है ॥ १५–१६ ॥ 'वर्ण, पद से लेकर प्रबन्ध पर्यन्त जो रसादि का व्यञ्जक है उसके स्वरूप का अभिधान करके' यह सम्बन्ध है । उपक्रम करते हैं—। इस कारिका से विरोधियों के भी लक्षण करने में 'शक्यहानत्व' (अर्थात् उन विरोधियों के लक्षण ज्ञात होने पर उनका परिहार किया जा सकेगा, यही) प्रयोजन कहते हैं । किन्तु लक्षण तो 'विरोधि रस- सम्बन्धि०' इत्यादि होगा ॥ १७ ॥ (शङ्का) जो कि 'विभाव, भाव, अनुभाव, सञ्चारी के औचित्य से चारु' यह कह
३९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कानि पुनस्तानि विरोधीनि यानि यत्नतः कवेः परिहर्तव्यानीत्युच्यते— विरोधीरससम्बन्धिविभावादिपरिग्रहः। विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ॥ १८ ॥ अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशनम् । परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् । रसस्य स्याद्विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ॥ १९ ॥ फिर वे विरोधी कौन हैं जिन्हें यत्नपूर्वक कवि को परिहार करना चाहिए ? इस पर कहते हैं— विरोधी रस से सम्बन्ध रखने वाले विभाव आदि का परिग्रह (रस से) सम्बद्ध होने पर भी अन्य वस्तु का विस्तार से वर्णन, असमय में ही (रस का) विच्छेद और असमय में प्रकाशन, (रस के) परिपोष प्राप्त कर लेने पर भी बार बार (उसका ही) उद्दीपन और वृत्ति (व्यवहार) का अनौचित्य, (ये पांच) रस के विरोधी हैं ॥ १८-१९ ॥ लोचनम् रेकमुखेनैतदप्यवगंस्यते । मैवम् ; व्यतिरेकेण हि तदभावमात्रं प्रतीयते न तु तद्विरुद्धम् । तदभावमात्रं च न तथा दूषकं यथा तद्विरुद्धम् । पथ्यानुपयोगो हि न तथा व्याधिं जनयति यद्वदपथ्योपयोगः । तदाह-यत्नत इति । 'विभावे' त्यादिना श्लोकेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विरोधीत्यादिनार्धश्लोकेनाह । 'इतिवृत्ते'त्या- दिना श्लोकद्वयेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विस्तरेणेत्यर्धश्लोकेनाह । 'उद्दीपने'त्यर्धश्लो- कोक्तस्य विरुद्धम् अकाण्ड इत्यर्धश्लोकेन । 'रसस्ये' त्यर्धश्लोकोक्तस्य विरुद्धं परिपोषं गतस्येत्यर्धश्लोकेन । 'अलङ्कृतीनामि' त्यनेन यदुक्तं तद्विरुद्धमन्य- चुके हैं, उसीसे व्यतिरेक के प्रकार से यह भी मालूम हो जायगा । (समाधान) ऐसा नहीं; व्यतिरेक से उसका अभाव मात्र प्रतीत होता है, न कि उससे विरुद्ध । उसका अभाव मात्र उस प्रकार दूषक नहीं है जिस प्रकार उसका विरुद्ध । क्योंकि पथ्य का अनुप्रयोग उस प्रकार व्याधि उत्पन्न नहीं करता जिस प्रकार अपथ्य का उपयोग (व्याधि उत्पन्न करता है)। उसे कहते हैं—यत्नपूर्वक—। 'विभाव०' इत्यादि श्लोक से जो कहा है उसके विरुद्ध 'विरोधि०' इत्यादि आधे श्लोक से कहते हैं । 'इतिवृत्त०' इत्यादि दो श्लोकों से जो कहा है उसके विरुद्ध 'विस्तरेण०' इत्यादि श्लोकार्ध से कहते हैं । 'उद्दीपन०' इत्यादि आधे श्लोक में कहे हुए के विरुद्ध 'अकाण्ड०' इस आधे श्लोक से । 'रसस्य०' इस अर्धश्लोक के विरुद्ध 'परिपोषं गतस्य०' इस अर्ध श्लोक से । अलङ्कृतीनां०' इससे जो कहा गया है उसके विरुद्ध और दूसरा भी
तृतीय उद्योतः ३९७ ध्वन्यालोकः प्रस्तुतरसापेक्षया विरोधी यो रसस्तस्य सम्बन्धिनां विभावभावा- नुभावानां परिग्रहो रसविरोधहेतुकः सम्भवनीयः । तत्र विरोधि रस- विभावपरिग्रहो यथा शान्तरसविभावेषु तद्विभावतयैव निरूपितेष्वनन्त- रमेव शृङ्गारादिविभाववर्णने । विरोधि रसभावपरिग्रहो यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपितासु कामिनीषु वैराग्यकथाभिरनुनये । विरोधि रसानु- भावपरिग्रहो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य को- पावेशविवशस्य रौद्रानुभाववर्णने । अयं चान्यो रसभङ्गहेतुर्यत्प्रस्तुतरसापेक्षया वस्तुनोऽन्यस्य कथ- प्रस्तुत रस की अपेक्षा से विरोधी जो रस है उससे सम्बन्ध रखने वाले विभाव, भाव और अनुभाव का परिग्रह रस के विरोध का हेतु हो सकता है । उनमें विरोधी रस के विभाव का परिग्रह, जैसे शान्त रस के विभावों में उसके विभाव रूप से ही निरूपित होने के बाद ही शृङ्गार आदि के विभाव के वर्णन में । विरोधी रस के भाव का परिग्रह, जैसे प्रिय के प्रति कामिनियों के प्रणयकलह से कुपित होने पर वैराग्य की कथाओं द्वारा अनुनय करने पर । विरोधी रस के अनुभाव का परिग्रह, जैसे प्रणयकुपित होने पर प्रिया के प्रसन्न न होने की स्थिति में कोप के आवेश से विवश नायक के रौद्र के अनुभावों के वर्णन में । और यह दूसरा रसभङ्ग का हेतु है कि प्रस्तुत रस की अपेक्षा किसी प्रकार सम्बद्ध लोचनम् दपि च विरुद्धं वृत्त्यनौचित्यमित्यनेन । एतत्क्रमेण व्याचष्टे—प्रस्तुतरसापेक्षये- त्यादिना । हास्यशृङ्गारयोर्वीराद्भुतयो रौद्रकरुणयोर्भयानकभीभत्सयोर्न विभाव- विरोध इत्यभिप्रायेण शान्तशृङ्गारानुपन्धस्तौ, प्रशमरागयोर्विरोधात् । विरो- धिनो रसस्य यो भावो व्यभिचारी तस्य परिग्रहः, विरोधिनस्तु यः स्थायी स्थायितया तत्परिग्रहोऽसम्भवनीय एव तदनुत्थानप्रसङ्गात् । व्यभिचारितया तु परिग्रहो भवत्येव । अत एव सामान्येन भावग्रहणम् । वैराग्यकथाभिरिति वैराग्यशब्देन निर्वेदः शान्तस्य यः स्थायी स उक्तः । यथा—‘प्रसादे वर्तस्व विरुद्ध ‘वृत्त्यनौचित्य०’ इससे (कहते हैं) । इस क्रम से व्याख्यान करते हैं । प्रस्तुत रस की अपेक्षा से० इत्यादि से । हास्य-शृङ्गार का, वीर-अद्भुत का, भयानक-बीभत्स का विभाव विरोध नहीं, इस अभिप्राय से शान्त-शृङ्गार का उपन्यास किया है, क्योंकि प्रशम और राग का विरोध है । विरोधी रस का जो भाव अर्थात् व्यभिचारी है उसका परिग्रह । परन्तु विरोधी का जो स्थायी है, स्थायी रूप से उसका परिग्रह असम्भव ही है, क्योंकि (स्थायी रूप से) उनके उत्थान का प्रसङ्ग नहीं है । परन्तु व्यभिचारी रूप से परिग्रह होगा ही । अतएव सामान्य रूप से ‘भाव’ का ग्रहण है । ‘वैराग्य की कथाओं द्वारा’ इसमें ‘वैराग्य’ शब्द से ‘निर्वेद’ शान्त रस का जो स्थायी है, वह कहा गया है । जैसे—‘प्रसन्न हो जाओ, खुशी प्रकट करो, रोष छोड़ो’ इत्यादि
३९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्चिदन्वितस्यापि विस्तरेण कथनम् । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे नायकस्य कस्यचिद्वर्णयितुमुपक्रान्ते कवेर्यमकाद्यलङ्कारनिबन्धनरसिकतया महता प्रबन्धेन पर्वतादिवर्णने । अयं चापरो रसभङ्गहेतुरवगन्तव्यो यदकाण्ड एव विच्छित्तिः रसस्याकाण्ड एव च प्रकाशनम् । तत्रानवसरे विरामो रसस्य यथा नायकस्य कस्यचित्स्पृहणीयसमागमया नायिकया कया- चित्परां परिपोषपदवीं प्राप्ते शृङ्गारे विदिते च परस्परानुरागे समाग- मोपायचिन्तोचितं व्यवहारमुत्सृज्य स्वतन्त्रतया व्यापारान्तरवर्णने । भी अन्य वस्तु का विस्तार से वर्णन करना । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में किसी नायक के वर्णन का उपक्रम करने पर कवि की यमक आदि अलङ्कारों के निबन्धन में रसिकता के कारण बड़ा-चढ़ा कर पर्वत आदि के वर्णन में । और यह दूसरा रसभङ्ग का हेतु समझना चाहिए, जो असमय में ही रस का विच्छेद और असमय में ही प्रकाशन है । उनमें से असमय में रस का विराम, जैसे किसी नायक का स्पृहणीय समागम वाली किसी नायिका के साथ शृङ्गार के परम परिपोष की अवस्था तक पहुँचने पर और परस्परानुराग के विदित होने पर समागम के उपाय की चिन्ता के उचित व्यवहार को छोड़कर स्वतन्त्र रूप से दूसरे व्यापार का वर्णन करने पर । और असमय में लोचनम् प्रकटय मुदं सन्त्यज रुषम्' इत्याद्युपक्रम्यार्थान्तरन्यासो 'न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः' इति । मनागपि निर्वेदानुप्रवेशे सति रतेर्विच्छेदः । ज्ञातविषयसतत्त्वो हि जीवितसर्वस्वाभिमानं कथं भजेत । न हि ज्ञातशुक्तिका- रजततत्त्वस्तदुपादेयधियं भजते ऋते संवृतिमात्रात् । कथाभिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृति मतिप्रभृतीन् सङ्गृह्णाति । नन्वन्यदनुन्मत्तः कथं वर्णयेत्, किमुत विस्तरत इत्याह-कथञ्चिदन्वितस्ये- ति । व्यापारान्तरेति । यथा वत्सराजचरिते चतुर्थेऽङ्के-रत्नावलीनामधेयमप्य- उपक्रम करके अर्थान्तरन्यास है 'री मुग्धे ( नासमझ ), काल का हिरन जाकर लौटने का नहीं' । थोड़ा भी निर्वेद का अनुप्रवेश होने पर रति का विच्छेद हो जाता है । क्योंकि विषय का तत्त्व समझ चुकने वाला कैसे ( किसी रमणी के प्रति ) 'जीवित- सर्वस्व' का अभिमान करेगा ? क्योंकि शुक्तिकारजत ( अर्थात् शुक्ति में भासमान रजत ) को तत्त्वतः समझ चुकने वाला व्यक्ति ( उसमें ) उपादेय बुद्धि नहीं करता, भ्रम मात्र के बिना । 'कथाओं द्वारा' यह बहुवचन शान्तरस के धृति, मति प्रभृति व्यभिचारियों को सङ्गृहीत करता है । अनुन्मत्त व्यक्ति कैसे अन्य का वर्णन करेगा, अथवा क्यों विस्तार से ( करेगा ) ?, इस पर कहते हैं-किसी प्रकार सम्बद्ध भी-। दूसरे व्यापार-। जैसे 'वत्सराजचरित' में
तृतीय उद्योतः ३९९ ध्वन्यालोकः अनवसरे च प्रकाशनं रसस्य यथा प्रवृत्ते प्रवृत्तविविधवीरसङ्क्षये कल्प- सङ्क्षयकल्पे सङ्ग्रामे रामदेवप्रायस्यापि तावन्नायकस्यानुपक्रान्तविप्रल- म्भशृङ्गारस्य निमित्तमुचितमन्तरेणैव शृङ्गारकथायामवतारवर्णने । न चैवंविधे विषये दैवव्यामोहितत्वं कथापुरुषस्य परिहारो यतो रसबन्ध एव कवेः प्राधान्येन प्रवृत्तिनिबन्धनं युक्तम् । इतिवृत्तवर्णनं तदुपाय एवेत्युक्तं प्राक् ‘आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवाञ्जनः’ इत्यादिना । अत एव चेतिवृत्तमात्रवर्णनप्राधान्येऽङ्गाङ्गिभावरहितरसभावनिब- न्धेन च कवीनामेवंविधानि स्खलितानि भवन्तीति रसादिरूपव्यङ्ग्य- रस का प्रकाशन, जैसे—प्रलयकाल के सदृश हो रहे विविध वीरों के नाश वाले संग्राम में विप्रलम्भ शृङ्गार के उपक्रम के बिना और बिना उचित कारण के राम जैसे देवता का भी शृङ्गारकथा में पड़ जाने का वर्णन करने में। इस प्रकार के विषय में कथा के नायक का दैववश व्यामोहित हो जाना (उसके दोष का) परिहार नहीं है, क्योंकि प्राधान्यतः कवि की प्रवृत्ति का निबन्धन रसबन्ध में ही होना चाहिए। इतिवृत्त का वर्णन उसका उपाय ही है यह पहले कह चुके हैं ‘आलोक चाहने वाला व्यक्ति जैसे दीपशिखा में यत्नवान् होता है, इत्यादि द्वारा और इसी लिए इतिवृत्त मात्र के वर्णन का प्राधान्य होने पर अङ्गाङ्गिभाव से रहित रसभाव के निबन्धन से कवियों के इस प्रकार के स्खलन होते हैं, इस प्रकार लोचनम् गृहीतो विजयवर्मवृत्तान्तवर्णने । अपि-तावदितिशब्दाभ्यां दुर्योधनादेस्तद्वर्णनं दूरापास्तमिति वेणीसंहारे द्वितीयाङ्कमेवोदाहरणत्वेन ध्वनति । अत एव वक्ष्य- ति-‘दैवव्यामोहितत्वम्’ इति । पूर्वं तु सन्ध्यङ्गाभिप्रायेण प्रत्युदाहरणमुक्तम् । कथापुरुषस्येति प्रतिनायकस्येति यावत् । अत एव चेति । यतो रसबन्ध एव मुख्यः कविव्यापारविषयः इतिवृत्तमात्र- वर्णनप्राधान्ये सति यदङ्गाङ्गिभावरहितानामविचारितगुणप्रधानभावानां रसभा- चतुर्थ अङ्क में—रत्नावली का नाम भी न लेते हुए का विजयवर्मा के वृत्तान्त के वर्णन में । (मूलग्रन्थ में ‘अपि तावत्’ इन) शब्दों से दुर्योधनादि का वह वर्णन छोड़ा जा चुका है, इसलिए वेणीसंहार में दूसरे अङ्क को ही उदाहरण रूप में ध्वनित करता है। अतएव कहेंगे—‘दैववश व्यामोहित हो जाना’। किन्तु पहले सन्धि के अङ्ग के अभिप्राय से प्रत्युदाहरण कहा गया है। कथा के नायक का अर्थात् प्रतिनायक का। और इसी लिए—। अर्थात् क्योंकि रसबन्ध ही मुख्य कवि-व्यापार का विषय है, इतिवृत्त मात्र के वर्णन का प्राधान्य होने पर अङ्गाङ्गिभाव से रहित एवं अविचारित
४०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तात्पर्यमेवैषां युक्तमिति यत्नोऽस्माभिरारब्धो न ध्वनिप्रतिपादन- मात्राभिनिवेशेन । पुनश्चायमन्यो रसभङ्गहेतुरवधारणीयो यत्परिपोषं गतस्यापि रसस्य पौनःपुन्येन दीपनम् । उपभुक्तो हि रसः स्वसामग्री- लब्धपरिपोषः पुनः पुनः परामृश्यमानः परिम्लानकुसुमकल्पः कल्पते । तथा वृत्तेर्व्यवहारस्य यदनौचित्यं तदपि रसभङ्गहेतुरेव । यथा नायकं प्रति नायिकायाः कस्याश्चिदुचितां भङ्गिमन्तरेण स्वयं सम्भोगाभिला- षकथने । यदि वा वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां काव्या- रसादि रूप व्यङ्ग्य का तात्पर्य ही इनका ठीक है, यह यत्न हमने आरम्भ किया है न कि ध्वनि के प्रतिपादन मात्र के अभिनिवेश से । और यह फिर अन्य रसभङ्ग का हेतु अवधारण करना चाहिए जो परिपोष को प्राप्त भी रसका बार-बार उद्दीपन है । क्योंकि अपनी सामग्री से परिपोष-प्राप्त और उपयुक्त रस बार-बार परामर्श किए जाने पर परिम्लान पुरुष की भांति हो जाता है । तथा वृत्ति अर्थात् व्यवहार का जो अनौ- चित्य है वह भी रसभङ्ग का हेतु ही है । जैसे नायक के प्रति किसी नायिका के द्वारा उचित भङ्गी के बिना स्वयं सम्भोग की अभिलाषा कहने में । अथवा भरत की प्रसिद्ध कैशिकी आदि वृत्तियों का अथवा 'काव्यालङ्कार' में प्रसिद्ध उपनागरिका आदि वृत्तियों का लोचनम् वानां निवन्धनं तन्निमित्तानि स्खलितानि सर्वे दोषा इत्यर्थः । न ध्वनिप्रतिपा- दनमात्रेति । व्यङ्ग्योऽर्थो भवतु मा वा भूत् कस्तत्राभिनिवेशः ? काकदन्तपरी- क्षाप्रायमेव तत्स्यादिति भावः । वृत्त्यनौचित्यमेव चेति बहुधा व्याचष्टे, तदपी- त्यनेन चशब्दं कारिकागतं व्याचष्टे । रसभङ्गहेतुरेव इत्यनेनैवकारस्य कारिका- गतस्य भिन्नक्रमत्वमुक्तम् । रसस्य विरोधायाैवेत्यर्थः । नायकं प्रतीति । नायक- स्य हि धीरोदात्तादिभेदभिन्नस्य सर्वथा वीररसानुवेधेन भवितव्यमिति तं गुणप्रधान-भाव वाले रस-भावों का जो निबन्धन है उसके कारण स्खलित अर्थात् सारे दोष होते हैं । न कि ध्वनि के प्रतिपादन मात्र—। व्यङ्ग्य अर्थ हो अथवा मत हो, उसमें कौन अभिनिवेश है ? भाव यह कि वह कौवे के दाँत की परीक्षा के समान ही होगा । वृत्त्यनौचित्य को भी बहुधा व्याख्यान करते हैं । 'वह भी' इससे कारिका में प्रयुक्त 'और' ('च') शब्द का व्याख्यान करते हैं । 'रसभङ्ग का हेतु ही है' इससे कारिका में प्रयुक्त 'ही' (अर्थात् एवकार) का भिन्नक्रमत्व कहा है । अर्थात् रसके विरोध के लिए ही । नायक के प्रति—। धीरोदात्त आदि भेद से भिन्न नायक के सर्वथा वीररस का अनुवेध (संसर्ग) होना चाहिए, इसलिए उसके प्रति कातर पुरुषोचित अधैर्य का योजन दोषयुक्त ही है । उनका अर्थात् रसादि का । उन्हें अर्थात् सुकवियों को ।
तृतीय उद्योतः ४०१ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः लङ्कारान्तरप्रसिद्धानामुपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यमविषये निवन्धनं तदपि रसभङ्गहेतुः। एवमेषां रसविरोधिनामन्येषां चानया दिशा स्वयमु- त्प्रेक्षितानां परिहारे सत्कविभिरवहितैर्भवितव्यम् । परिकरश्लोकाश्चात्र— मुख्या व्यापारविषयाः सुकवीनां रसादयः । तेषां निबन्धने भव्ये तैः सदैवप्रमादिभिः ॥ नीरसस्तु प्रबन्धो यः सोऽपशब्दो महान् कवेः । स तेनाकविरेव स्यादन्येनास्मृतलक्षणः ॥ पूर्वे विशृङ्खलगिरः कवयः प्राप्तकीर्तयः । तान्समाश्रित्य न त्याज्या नीतिरेषा मनीषिणा ॥ जो अनौचित्य अर्थात् अविषय में निवन्धन है वह भी रसभङ्ग का हेतु है। इस प्रकार इनका और इस ढंग से स्वयं उत्प्रेक्षित रसविरोधियों के परिहार में सत्कवियों को अवहित होना चाहिए । यहाँ परिकरश्लोक भी हैं— सुकवियों के व्यापार के मुख्य विषय रसादि हैं, (इसलिए) उन्हें उनके निवन्धन में सदैव अप्रमादी होना चाहिए । जो प्रबन्ध नीरस है वह कवि का महान् अपशब्द है । उस कारण वह अकवि ही रहे कि दूसरा उसे याद न करे । प्राचीन कवि स्वतन्त्र वाणी वाले और कीर्ति को प्राप्त हो चुके हैं, उनको आश्रयण करके मनीषी को यह नीति नहीं छोड़ देनी चाहिए । लोचनम् प्रति कातरपुरुषोचितमधैर्ययोजनं दुष्टमेव । तेषामिति रसादीनाम् । तैरिति सुकविभिः । सोऽपशब्द इति दुर्यश इत्यर्थः । ननु कालिदासः परिपोषं गतस्या- पि करुणस्य रतिविलापेषु पौनःपुन्येन दीपनमकार्षीत्, तत्कोऽयं रसविरोधिनां परिहारनिर्वन्ध इत्याशङ्कयाह—पूर्वे इति । न हि वसिष्ठादिभिः कथञ्चिदपि स्मृतिमार्गस्त्यक्तस्तद्वयमपि तथा त्यजामः । अचिन्त्यहेतुकत्वादुपरिचरिताना- मिति भावः । इति शब्देन परिकरश्लोकसमाप्तिं सूचयति ॥ १६ ॥ वह अपशब्द अर्थात् दुर्यश है । कालिदास ने परिपोष को प्राप्त भी करुण का रति के विलापों में बार-बार उद्दीपन किया है, तो रस के विरोधियों का यह कौन सा परिहार का निर्बन्ध (आग्रह) है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—प्राचीन—। यदि किसी प्रकार वसिष्ठ आदि ने स्मृतिमार्ग को छोड़ दिया तो हम उस प्रकार नहीं छोड़ दें । ऊपर उठे महान् लोगों के सम्बन्ध में कारण नहीं सोचा जाता । 'इति' शब्द से परिकर श्लोक की समाप्ति सूचित करते हैं ॥ १९ ॥ २६ ध्व०
४०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाल्मीकिव्यासमुख्याश्च ये प्रख्याताः कवीश्वराः । तदभिप्रायबाह्योऽयं नास्माभिर्दर्शितो नयः ॥ इति ॥ १६ ॥ विवक्षिते रसे लब्धप्रतिष्ठे तु विरोधिनाम् । बाध्यानामङ्गभावं वा प्राप्तानामुक्तिरच्छला ॥ २० ॥ स्वसामग्र्या लब्धपरिपोषे तु विवक्षिते रसे विरोधिनां विरोधि- रसाङ्गानां बाध्यानामङ्गभावं वा प्राप्तानां सतामुक्तिरदोषा । बाध्यत्वं हि विरोधिनां शक्याभिभवत्वे सति नान्यथा । तथा च तेषामुक्तिः प्रस्तुत- रसपरिपोषायैव सम्पद्यते । अङ्गभावं प्राप्तानां च तेषां विरोधित्वमेव निवर्तते । अङ्गभावप्राप्तिर्हि तेषां स्वाभाविकी समारोपकृता वा । तत्र येषां नैसर्गिकी तेषां तावदुक्तावविरोध एव । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे तद्- और वाल्मीकि, व्यास प्रमुख जो प्रख्यात कवीश्वर हैं, उनके अभिप्राय से बाह्य नय ( मार्ग ) हमने नहीं दिखाया है । इति ॥ १९ ॥ विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ हो जाने पर बाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरो- धियों का कथन छलरहित है ॥ २० ॥ अपनी सामग्री से विवक्षित रस के परिपोष प्राप्त होने पर बाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरोधियों अर्थात् विरोधी रसाङ्गों का कथन दोषरहित है । विरोधियों का बाध्यत्व ( उनका ) अभिभव सम्भव होने पर हो सकता है अन्यथा नहीं । इसलिए उनका कथन प्रस्तुत रस के परिपोष के लिए ही सम्पन्न होगा । और उनके अङ्गभाव प्राप्त होने पर ( उनका ) विरोधित्व ही निवृत्त हो जाता है । उनके अङ्गभाव की प्राप्ति स्वाभाविक अथवा समारोपकृत होती है । उनमें से जिनकी ( प्राप्ति ) नैसर्गिक है उनके कथन में तो कोई विरोध ही नहीं । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में उसके अङ्गभूत लोचनम् एवं विरोधिनां परिहारे सामान्येनोक्ते प्रतिप्रसवं नियतविषयमाह—विव- क्षित इति । बाध्यानामिति । बाध्यत्वाभिप्रायेणाङ्गत्वाभिप्रायेण वेत्यर्थः । अच्छला निर्दोषेत्यर्थः । बाध्यत्वाभिप्रायं व्याचष्टे-बाध्यत्वं हीति । अङ्गभावाभि- इस प्रकार विरोधियों के परिहार के सामान्यतः कहे जाने पर नियतविषयक प्रतिप्रसव को कहते हैं—विवक्षित—। बाध्य—। अर्थात् बाध्यत्व के अभिप्राय से अथवा अङ्गत्व के अभिप्राय से । छलरहित अर्थात् निर्दोष । बाध्यत्व के अभिप्राय की व्याख्या करते हैं—बाध्यत्व—। अङ्गभाव के अभिप्राय की उभय प्रकार से व्याख्या करते हैं, उनमें से प्रथम स्वाभाविक प्रकार का निरूपण करते हैं—
तृतीय उद्योतः ४०३ ध्वन्यालोकः ङ्गानां व्याध्यादीनां तेषाञ्च तदङ्गानामेवादोषो नातदङ्गानाम् । तदङ्गत्वे च सम्भवत्यपि मरणस्योपन्यासो न ज्यायान् । आश्रयविच्छेदे रसस्या- त्यन्तविच्छेदप्राप्तेः । करुणस्य तु तथाविधे विषये परिपोषो भविष्य- तीति चेत् न ; तस्याप्रस्तुतत्वात् प्रस्तुतस्य च विच्छेदात् । यत्र तु करुणरसस्यैव काव्यार्थत्वं तत्राविरोधः । शृङ्गारे वा मरणस्यादीर्घकाल- व्याधि आदि का, और उनके अङ्गों का ही दोष नहीं है, न कि जो उनके अङ्ग नहीं हैं उनका । और उनका अङ्ग सम्भव होने पर भी मरण का उपन्यास ठीक नहीं है, क्योंकि आश्रय के विच्छेद हो जाने पर रस का अत्यन्त विच्छेद प्राप्त हो जाता है । उस प्रकार के विषय में करुण का परिपोष तो होगा ? ऐसा नहीं; क्योंकि वह (करुण रस) प्रस्तुत नहीं है और (जो) प्रस्तुत है (उसका) विच्छेद हो जाता है । परन्तु जहां करुणरस का ही काव्यार्थत्व है वहां विरोध नहीं । अथवा शृङ्गार में शीघ्र मिलन लोचनम् प्रायमुभयथा व्याचष्टे, तत्र प्रथमं स्वाभाविकप्रकारं निरूपयति-तदङ्गानामिति । निरपेक्षभावतया सापेक्षभावविप्रलम्भशृङ्गारविरोधिन्यपि करुणे ये व्याध्याद- यस्सर्वथाऽङ्गत्वेन दृष्टाः तेषामिति । ते हि करुणे भवन्त्येव त एव च भवन्ती- ति । शृङ्गारे तु भवन्त्येव नापि त एवेति । अतदङ्गानामिति । यथालस्यौग्र्यजु- गुप्सानामित्यर्थः । तदङ्गत्वे चेति । 'सर्व एव शृङ्गारे व्यभिचारिण इत्युक्तत्वादि' ति भावः । आश्रयस्य स्त्रीपुरुषान्यतरस्याधिष्ठानस्यापाये रतिरेवोच्छिद्येत तस्या जीवितसर्वस्वाभिमानरूपत्वेनोभयाधिष्ठानत्वात् । प्रस्तुतस्येति । विप्रलम्भस्येत्यर्थः । काव्यार्थत्वमिति । प्रस्तुतत्वमित्यर्थः । नन्वेवं सर्व एव व्य- भिचारिण इति विघटितमित्याशङ्क्याह-शृङ्गारे वेति । अदीर्घकाले यत्र मरणे उनके अङ्गों का—। निरपेक्ष भाव वाला होने के कारण सापेक्ष भाव वाले विप्रलम्भ शृङ्गार के विरोधी भी करुण में जो व्याधि आदि सर्वथा अङ्ग के रूप में देखे गए हैं उनका । वे करुण में होते हैं ही और वे ही करुण में होते हैं । शृङ्गार में होते हैं ही, किन्तु वेही नहीं होते । जो उनके अङ्ग नहीं हैं—। अर्थात् जैसे आलस्य, औग्र्य, जुगुप्सा । और उनका अङ्ग होने पर—। भाव यह कि क्योंकि 'शृङ्गार में सभी व्यभिचारी हैं यह कहा गया है' । स्त्री-पुरुष के अन्यतर अधिष्ठान रूप आश्रय के नाश होने पर रति ही उच्छिन्न हो जायगी, क्योंकि जीवितसर्वस्वाभिमान रूप होने के कारण वह उभयाधिष्ठान है । प्रस्तुत का—। अर्थात् विप्रलम्भ का । काव्यार्थत्व—। अर्थात् प्रस्तुतत्व । तब तो इस प्रकार सभी व्यभिचारी हो जायेंगे, इसलिए विघटन होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—अथवा शृङ्गार में—। अदीर्घकाल में जिस मरण में प्रतीति की
प्रत्यापत्तिसम्भवे कदाचिदुपनिबन्धो नात्यन्तविरोधी । दीर्घकाल- प्रत्यापत्तौ तु तस्यान्तरा प्रवाहविच्छेद एवेत्येवंविधेतिवृत्तोपनिबन्धनं रसबन्धप्रधानेन कविना परिहर्तव्यम् । सम्भव होने पर मरण का कदाचित् उपनिबन्ध अत्यन्त विरोधी नहीं। किन्तु दीर्घ काल पर मिलन होने पर उस (रस) का बीच में प्रवाह-विच्छेद ही हो जायगा, अतः इस प्रकार के इतिवृत्त का उपनिबन्धन रसबन्धप्रधान कवि को छोड़ देना चाहिए । लोचनम् विश्रान्तिपदबन्ध एव नोत्पद्यते तत्रास्य व्यभिचारित्वम् । कदाचिदिति । यदि तादृशीं भङ्गिं घटयितुं सुकवेः कौशलं भवति । यथा— तीर्थे तोयव्यतिकरभवे जह्नुकन्यासरय्वो- र्देहन्त्यासादमरगणनालेख्यमासाद्य सद्यः । पूर्वाकाराधिकचतुरया सङ्गतः कान्तयासौ लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यन्तरेषु ॥ अत्र स्फुटैव रत्यङ्गता मरणस्य । अत एव सुकविना मरणे पदबन्धमात्रं न कृतम्, अनूद्यमानत्वेनैवोपनिबन्धनात् । पदबन्धनिवेशे तु सर्वथा शोकोदय एवातिपरिमितकालप्रत्यापत्तिलाभेऽपि । अथ दूरपरामर्शकसहृदयसामाजिकाभिप्रायेण मरणस्यादीर्घकालप्रत्यापत्ते- रङ्गतोच्यते, हन्त तापसवत्सराजेऽपि यौगन्धरायणादिनीतिमार्गाकर्णनसंस्कृत- मतीनां वासवदत्तामरणबुद्धेरेवाभावात्करुणस्य नामापि न स्यादित्यलमवान्त- विश्रान्ति की प्रतिष्ठा ही नहीं उपपन्न होती वहाँ वह (मरण) व्यभिचारी होगा । कदाचित्—। यदि उस प्रकार की भङ्गी की घटना के लिए सुकवि का कौशल होता है । जैसे— 'गङ्गा और सरयू के जल-सङ्गम से बने तीर्थ में शरीरत्याग करके सद्यः देवताओं में गणना प्राप्त कर, पूर्व आकृति से अधिक चतुर (अर्थात् सुभग) प्रियतमा के साथ वह (अज) नन्दनवन के भीतरी लीलागारों में रमण करने लगा ।' (रघु० ८।९५) । यहाँ स्पष्ट ही मरण रति का अङ्ग है । अतएव सुकवि ने मरण में (प्रतीति की विश्रान्ति का) पदबन्ध मात्र नहीं किया है, क्योंकि अनूद्यमान रूप से ही (उसका) उपनिबन्धन है। पदबन्ध के निवेश में तो अतिपरिमित काल में प्रत्यापत्ति (अर्थात् समागम) लाभ होने पर भी सर्वथा शोक का उदय ही होता । यदि अदीर्घकाल में समागम हो जाने के कारण मरण को अङ्ग दूर परामर्शक सामाजिक के अभिप्राय से कहते हैं, खेद है, (तब तो) 'तापसवत्सराज' में भी यौगन्धरायण आदि के नीतिमार्ग के आकर्णन से संस्कृत बुद्धिवालों के वासवदत्ता के मरण बुद्धि के ही न होने के कारण करुण का नाम भी नहीं होगा । यह बहुत अवान्तर
तृतीय उद्योतः ४०५
ध्वन्यालोकः
तत्र लब्धप्रतिष्ठे तु विवक्षिते रसे विरोधिग्साङ्गानां वाध्यत्वेनोक्ता-
वदोषो यथा—
क्काकार्यं शशलक्ष्मणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं पास्यति ॥
यथा वा पुण्डरीकस्य महाश्वेतां प्रति प्रवृत्तनिर्भरानुरागस्य द्वितीय-
मुनिकुमारोपदेशवर्णने । स्वाभाविक्यामङ्गभावप्राप्तावदोषो यथा—
उनमें से विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ होने पर बाध्यरूप से विरोधी रसाङ्गों के
कथन में दोष का अभाव, जैसे—
यह अकार्य ( अनुचित कार्य ) कहां और चन्द्रवंश कहां ? फिर वह नजर आ
जाती ! मैंने ( शास्त्रों का ) श्रवण दोषों ( काम आदि विकारों ) के शमन के लिए
किया है, अहो; क्रोध में भी ( उसका ) मुख सुन्दर. लगता था ! पापरहित विद्वान्
क्या कहेंगे ? वह स्वप्न में भी दुर्लभ हो गई । अरे चित्त स्वस्थ हो जा, कौन धन्य
युवक (उसका) अधरपान करेगा ?
अथवा जैसे महाश्वेता के प्रति पुण्डरीक के अधिक अनुरक्त हो जाने पर दूसरे
मुनिकुमार ( कपिञ्जल ) के उपदेश के वर्णन में । स्वाभाविक अङ्गभाव-प्राप्ति में दोष
का अभाव, जैसे—
लोचनम्
रेण बहुना । तस्माद् दीर्घकालतात्र पदबन्धलाभ एवेति मन्तव्यम् । एवं नैस-
र्गिकाङ्गतो व्याख्याता । समारोपितत्वे तद्विपरीतेत्यर्थलब्धत्वात्स्वकण्ठेन न
व्याख्याता ।
एवं प्रकारत्रयं व्याख्याय क्रमेणोदाहरति — तत्रेत्यादिना । क्काकार्यमिति ।
वितर्क औत्सुक्येन मतिः स्मृत्या शङ्का दैन्येन धृतिश्चिन्तया च बाध्यते । एत-
च्च द्वितीयोद्द्योतारम्भ एवोक्तमस्माभिः । द्वितीयेति । विपक्षीभूतवैराग्यविभा-
चर्चा व्यर्थ है। इसलिए यहाँ दीर्घकालता पदबन्ध के लाभ में ही (अर्थात् सहृदयों की
प्रतीतिविश्रान्ति के पदबन्ध में ही ) है यह मानना चाहिए। इस प्रकार नैसर्गिक अङ्गता
का व्याख्यान किया। समारोपित अवस्था में उसके ( नैसर्गिक ) के विपरीत, यह
अर्थ लब्ध हो जाने से स्वकण्ठतः व्याख्यान नहीं किया है।
इस प्रकार प्रकारत्रय का व्याख्यान करके क्रम से उदाहरण देते हैं — उनमें से
इत्यादि द्वारा । यह अकार्य कहाँ—। (यहाँ) वितर्क औत्सुक्य से, मति स्मृति से,
शङ्का दैन्य से और धृति चिन्ता से बाधित होती है। इसे द्वितीय उद्योत के आरम्भ में
४०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्च्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदभुजगर्जं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम् ॥ इत्यादौ। समारोपितायामप्यविरोधी यथा---'पाण्डुक्षामम्'इत्यादौ । यथा वा—'कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादौ । इयं चाङ्गभावप्राप्तिरन्या यदाधिकारिकत्वात्प्रधान एकस्मिन्वाक्यार्थे रस- योर्भावयोर्वा परस्परविरोधिनोर्द्वयोरङ्गभावगमनं तस्यामपि न दोषः । मेघरूपी भुजंग से उत्पन्न विष वियोगिनियों के चक्कर, अरति, आलस्य, प्रलय (चेष्टानाश), मूर्च्छा, मोह, शरीर में दर्द और मरण हठात् उत्पन्न कर देता है। इत्यादि में । समारोपित (अङ्गभाव-प्राप्ति) में भी विरोध का अभाव, जैसे— 'पाण्डुक्षामं०' इत्यादि में । अथवा जैसे—'कोपात् कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादि में । और यह अन्य अङ्गभाव की प्राप्ति है कि आधिकारिक होने के कारण प्रधानभूत एक वाक्यार्थ में परस्पर विरोधी दो रसों अथवा भावों का अङ्गभाव प्राप्त होना, उसमें भी दोष नहीं। लोचनम् वाद्यवधारणेऽपि ह्यशक्यविच्छेदत्वेन दाढर्यमेवानुरागस्योक्तं भवतीति भावः । समारोपितायामिति । अङ्गभावप्राप्ताविति शेषः । पाण्डुक्षामं वक्त्रं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः । आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि हृदन्तः ॥ अत्र करुणोचितो व्याधिःश्लेषभङ्ग्या स्थापितः। कोपादिति बद्ध्वेति हन्य- त इति च रौद्रानुभावानां रूपकबलादारोपितानां तदनिर्वाहादेवाङ्गत्वम् । तच्च पूर्वमेवोक्तं 'नातिनिर्वहणैषिता' इत्यत्रान्तरे। अन्येति। चतुर्थोऽयं प्रकार इत्यर्थः। ही हमने कह दिया है। दूसरे—। भाव यह कि विपक्षीभूत वैराग्य के विभाव आदि का अवधारण होने पर भी विच्छेद के अशक्य होने के कारण अनुराग का दाढर्द्य ही उक्त होता है । समारोपित—। 'अङ्गप्राप्ति में' यह शेष है। हे सखी,, तेरा पीला और झुलसा हुआ मुख, सरस हृदय, आलस्य भरा शरीर हृदय के भीतर नितान्त क्षेत्रिय रोग (अर्थात् इस शरीर से भी साध्य न होने वाले रोग) को सूचित करते हैं । यहाँ करुण के उचित व्याधि श्लेष की भङ्गी से स्थापित है । 'कोप से', 'बाँध कर', और 'पीटा जाता है' रूपक के बल से आरोपित इन रौद्र के अनुभावों का उसके (रूपक के) निर्वाह न होने से ही अङ्गत्व है। और उसे पहले ही कह चुके हैं 'अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा नहीं' इसके बीच । अन्य—। अर्थात् यह चौथा प्रकार है ।
तृतीय उद्योतः ४०७
ध्वन्यालोकः
यथोक्तं 'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादौ । कथं तत्राविरोध इति चेत्,
द्वयोरपि तयोरन्यपरत्वेन व्यवस्थानात् । अन्यपरत्वेऽपि विरोधिनोः
कथं विरोधनिवृत्तिरिति चेत्, उच्यते—विधौ विरुद्धसमावेशस्य
दुष्टत्वं नानुवादे ।
जैसे कहा है—'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में । वहां विरोध कैसे नहीं है यदि
कहें_ता ( समाधान है कि ) वे दोनों अन्यपर रूप से ( अर्थात् अङ्गरूप से )
व्यवस्थित होते हैं । यदि कहो कि अन्यपर होने पर भी दो विरोधियों के विरोध की
निवृत्ति कैसे होगी, तो कहते हैं—विधि में ( दो ) विरोधियों के समावेश का दोष है,
अनुवाद में नहीं ।
लोचनम्
पूर्वं हि विरोधिनः प्रस्तुततरसान्तरेऽङ्गतोक्ता, अधुना तु द्वयोर्विरोधिनोर्वस्त्वन्त-
रेऽङ्गभाव इति शेषः । क्षिप्त इति । व्याख्यातमेतत् 'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे'
इत्यत्र । नन्वन्यपरत्वेऽपि स्वभावो न निवर्तते, स्वभावकृत एव च विरोध इत्य-
भिप्रायेणाह—अन्यपरत्वेऽपीति। विरोधिनोरिति। तत्स्वभावयोरिति हेतुत्वाभिप्रा-
येण विशेषणम् । उच्यत इति । अयं भावः-सामग्रीविशेषपतितत्वेन भावानां
विरोधाविरोधौ न स्वभावमात्रनिबन्धनौ शीतोष्णयोरपि विरोधाभावात् । विधा-
विति । तदेव कुरु मा कार्षीरिति यथा । विधिशब्देनात्रैकदा प्राधान्यमुच्यते ।
अत एवातिरात्रे षोडशिनं गृह्णन्ति न गृह्णन्तीति विरुद्धविधिर्विकल्पपर्यवसायी-
ति वाक्यविदः । अनुवाद इति । अन्याङ्गतायामित्यर्थः । क्रीडाङ्गत्वेन ह्यत्र
शेष यह कि विरोधी (रसाङ्ग) की प्रस्तुत रसान्तर में अङ्गता कही, अब दो विरोधी
( रसाङ्गों ) की ( प्रस्तुत ) वस्त्वन्तर में अङ्गभाव ( कहते हैं ) । 'क्षिप्तः'—। यह
'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे' इस ( कारिका ) में व्याख्यात है । अन्यपर ( अर्थात् अङ्ग रूप )
होने पर भी स्वभाव निवृत्त नहीं होता, और विरोध स्वभावकृत ही होता है, इस
अभिप्राय से कहते हैं—अन्यपर होने पर भी—। दो विरोधियों का—। उस ( अर्थात्
विरोध ) के स्वभाव वाले' यह हेतुत्व के अभिप्राय से विशेषण है । कहते हैं—। भाव
यह है—सामग्री-विशेष में अनुप्रवेश के कारण भावों के विरोध-अविरोध होते हैं, न कि
स्वभावमात्र के कारण, क्योंकि ( सामग्रीविशेष के अनुप्रवेश के कारण ) शीत और
उष्ण में भी विरोध नहीं होता । विधि में—। जैसे 'वही करो, मत करो' । 'विधि'
शब्द से यहाँ एक समय प्राधान्य कहते कहा गया है । अतएव 'अतिरात्र में षोडशी
( पात्र ) को ग्रहण करते हैं, नहीं ग्रहण करते हैं' यह विरुद्ध विधि विकल्प में पर्यवसन्न
होती है यह मीमांसकों ( वाक्यविदों ) का कथन है । अनुवाद में—। अर्थात् अन्य की
अङ्गता में । यहाँ क्रीड़ा ( खिलवाड़ ) का अङ्ग रूप से अभिधान है, इस कारण 'राजा के
४०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा— एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौनं समाचर । एवमाशायहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ इत्यादौ । अत्र हि विधिप्रतिषेधयोरनूद्यमानत्वेन समावेशे न विरोधस्तथेहापि भविष्यति । श्लोके ह्यस्मिन्नीर्ष्याविप्रलम्भशृङ्गारकरुण- वस्तुनोर्न विधीयमानत्वम् । त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वा- त्तदङ्गत्वेन च तयोर्व्यवस्थानात् । न च रसेषु विध्यनुवादव्यवहारो नास्तीति शक्यं वक्तुम् , तेषां जैसे—आओ, जाओ, बैठो, उठो, बोलो, चुप हो जाओ, इस प्रकार धनी लोग आशा के ग्रह से ग्रस्त याचकों के साथ खिलवाड़ करते हैं। इत्यादि में । यहां विधि और प्रतिषेध के अनूद्यमान रूप में समावेश करने पर विरोध (दोष) नहीं है, उस प्रकार यहां ('क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में) भी होगा। इस श्लोक में ईर्ष्याविप्रलम्भ और करुण विधीयमान नहीं हैं, क्योंकि त्रिपुरारि (शिव जी) का प्रभावातिशय वाक्यार्थ है और उसके अङ्ग के रूप से वे दोनों व्यवस्थित हैं। नहीं कह सकते यह कि रसों में विधि-अनुवाद का व्यवहार नहीं है, क्योंकि लोचनम् विरुद्धानामर्थानामभिधानमिति राजनकटव्यवस्थिताततायिद्वयन्यायेन विरुद्धा- नामप्यन्यमुखप्रेक्षितापरतन्त्रीकृतानां श्रौतेन क्रमेण स्वात्मपरामर्शेऽप्यविश्राम्य- ताम्, का कथा परस्पररूपचिन्तायां येन विरोधः स्यात् । केवलं विरुद्धत्वा- दरुणाधिकरणस्थित्या यो वाक्यीय एषां पाश्चात्त्यः सम्बन्धः सम्भाव्यते स विघटताम् । ननु प्रधानतया यद्वाच्यं तत्र विधिः । अप्रधानत्वेन तु वाच्येऽनुवादः । न च रसस्य वाच्यत्वं त्वयैव सोढमित्याशङ्कमानः परिहरति—न चेति । प्रधाना- निकट खड़े दो आततायी हैं' इस न्याय के अनुसार अन्यमुखप्रेक्षिता से परतन्त्र (अर्थात् उपसर्जनीकृत) हुए, सुने क्रम के अनुसार अपने परामर्श में भी विश्रान्ति न प्राप्त करते हुए विरुद्धों के भी परस्पर रूप की चिन्ता की कोई बात ही नहीं, जिससे विरोध होगा। विरुद्ध होने के कारण 'अरुणाधिकरण' न्याय के अनुसार जो वाक्य- प्रतिपाद्य इनका सम्बन्ध सम्भावित होगा वह केवल विघटित होगा। प्रधान रूप से जो वाच्य है वहां विधि है, अप्रधान रूप से वाच्य में अनुवाद है, और रस का वाच्यत्व तुमने ही सहन नहीं किया है, यह आशङ्का करते हुए परिहार