ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा— एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौनं समाचर । एवमाशायहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ इत्यादौ । अत्र हि विधिप्रतिषेधयोरनूद्यमानत्वेन समावेशे न विरोधस्तथेहापि भविष्यति । श्लोके ह्यस्मिन्नीर्ष्याविप्रलम्भशृङ्गारकरुण- वस्तुनोर्न विधीयमानत्वम् । त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वा- त्तदङ्गत्वेन च तयोर्व्यवस्थानात् । न च रसेषु विध्यनुवादव्यवहारो नास्तीति शक्यं वक्तुम् , तेषां जैसे—आओ, जाओ, बैठो, उठो, बोलो, चुप हो जाओ, इस प्रकार धनी लोग आशा के ग्रह से ग्रस्त याचकों के साथ खिलवाड़ करते हैं। इत्यादि में । यहां विधि और प्रतिषेध के अनूद्यमान रूप में समावेश करने पर विरोध (दोष) नहीं है, उस प्रकार यहां ('क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में) भी होगा। इस श्लोक में ईर्ष्याविप्रलम्भ और करुण विधीयमान नहीं हैं, क्योंकि त्रिपुरारि (शिव जी) का प्रभावातिशय वाक्यार्थ है और उसके अङ्ग के रूप से वे दोनों व्यवस्थित हैं। नहीं कह सकते यह कि रसों में विधि-अनुवाद का व्यवहार नहीं है, क्योंकि लोचनम् विरुद्धानामर्थानामभिधानमिति राजनकटव्यवस्थिताततायिद्वयन्यायेन विरुद्धा- नामप्यन्यमुखप्रेक्षितापरतन्त्रीकृतानां श्रौतेन क्रमेण स्वात्मपरामर्शेऽप्यविश्राम्य- ताम्, का कथा परस्पररूपचिन्तायां येन विरोधः स्यात् । केवलं विरुद्धत्वा- दरुणाधिकरणस्थित्या यो वाक्यीय एषां पाश्चात्त्यः सम्बन्धः सम्भाव्यते स विघटताम् । ननु प्रधानतया यद्वाच्यं तत्र विधिः । अप्रधानत्वेन तु वाच्येऽनुवादः । न च रसस्य वाच्यत्वं त्वयैव सोढमित्याशङ्कमानः परिहरति—न चेति । प्रधाना- निकट खड़े दो आततायी हैं' इस न्याय के अनुसार अन्यमुखप्रेक्षिता से परतन्त्र (अर्थात् उपसर्जनीकृत) हुए, सुने क्रम के अनुसार अपने परामर्श में भी विश्रान्ति न प्राप्त करते हुए विरुद्धों के भी परस्पर रूप की चिन्ता की कोई बात ही नहीं, जिससे विरोध होगा। विरुद्ध होने के कारण 'अरुणाधिकरण' न्याय के अनुसार जो वाक्य- प्रतिपाद्य इनका सम्बन्ध सम्भावित होगा वह केवल विघटित होगा। प्रधान रूप से जो वाच्य है वहां विधि है, अप्रधान रूप से वाच्य में अनुवाद है, और रस का वाच्यत्व तुमने ही सहन नहीं किया है, यह आशङ्का करते हुए परिहार