ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
पृष्ठ 467, कुल 680 में से
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तृतीय उद्योतः ४०७
ध्वन्यालोकः
यथोक्तं 'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादौ । कथं तत्राविरोध इति चेत्,
द्वयोरपि तयोरन्यपरत्वेन व्यवस्थानात् । अन्यपरत्वेऽपि विरोधिनोः
कथं विरोधनिवृत्तिरिति चेत्, उच्यते—विधौ विरुद्धसमावेशस्य
दुष्टत्वं नानुवादे ।
जैसे कहा है—'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में । वहां विरोध कैसे नहीं है यदि
कहें_ता ( समाधान है कि ) वे दोनों अन्यपर रूप से ( अर्थात् अङ्गरूप से )
व्यवस्थित होते हैं । यदि कहो कि अन्यपर होने पर भी दो विरोधियों के विरोध की
निवृत्ति कैसे होगी, तो कहते हैं—विधि में ( दो ) विरोधियों के समावेश का दोष है,
अनुवाद में नहीं ।
लोचनम्
पूर्वं हि विरोधिनः प्रस्तुततरसान्तरेऽङ्गतोक्ता, अधुना तु द्वयोर्विरोधिनोर्वस्त्वन्त-
रेऽङ्गभाव इति शेषः । क्षिप्त इति । व्याख्यातमेतत् 'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे'
इत्यत्र । नन्वन्यपरत्वेऽपि स्वभावो न निवर्तते, स्वभावकृत एव च विरोध इत्य-
भिप्रायेणाह—अन्यपरत्वेऽपीति। विरोधिनोरिति। तत्स्वभावयोरिति हेतुत्वाभिप्रा-
येण विशेषणम् । उच्यत इति । अयं भावः-सामग्रीविशेषपतितत्वेन भावानां
विरोधाविरोधौ न स्वभावमात्रनिबन्धनौ शीतोष्णयोरपि विरोधाभावात् । विधा-
विति । तदेव कुरु मा कार्षीरिति यथा । विधिशब्देनात्रैकदा प्राधान्यमुच्यते ।
अत एवातिरात्रे षोडशिनं गृह्णन्ति न गृह्णन्तीति विरुद्धविधिर्विकल्पपर्यवसायी-
ति वाक्यविदः । अनुवाद इति । अन्याङ्गतायामित्यर्थः । क्रीडाङ्गत्वेन ह्यत्र
शेष यह कि विरोधी (रसाङ्ग) की प्रस्तुत रसान्तर में अङ्गता कही, अब दो विरोधी
( रसाङ्गों ) की ( प्रस्तुत ) वस्त्वन्तर में अङ्गभाव ( कहते हैं ) । 'क्षिप्तः'—। यह
'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे' इस ( कारिका ) में व्याख्यात है । अन्यपर ( अर्थात् अङ्ग रूप )
होने पर भी स्वभाव निवृत्त नहीं होता, और विरोध स्वभावकृत ही होता है, इस
अभिप्राय से कहते हैं—अन्यपर होने पर भी—। दो विरोधियों का—। उस ( अर्थात्
विरोध ) के स्वभाव वाले' यह हेतुत्व के अभिप्राय से विशेषण है । कहते हैं—। भाव
यह है—सामग्री-विशेष में अनुप्रवेश के कारण भावों के विरोध-अविरोध होते हैं, न कि
स्वभावमात्र के कारण, क्योंकि ( सामग्रीविशेष के अनुप्रवेश के कारण ) शीत और
उष्ण में भी विरोध नहीं होता । विधि में—। जैसे 'वही करो, मत करो' । 'विधि'
शब्द से यहाँ एक समय प्राधान्य कहते कहा गया है । अतएव 'अतिरात्र में षोडशी
( पात्र ) को ग्रहण करते हैं, नहीं ग्रहण करते हैं' यह विरुद्ध विधि विकल्प में पर्यवसन्न
होती है यह मीमांसकों ( वाक्यविदों ) का कथन है । अनुवाद में—। अर्थात् अन्य की
अङ्गता में । यहाँ क्रीड़ा ( खिलवाड़ ) का अङ्ग रूप से अभिधान है, इस कारण 'राजा के