ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्च्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदभुजगर्जं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम् ॥ इत्यादौ। समारोपितायामप्यविरोधी यथा---'पाण्डुक्षामम्'इत्यादौ । यथा वा—'कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादौ । इयं चाङ्गभावप्राप्तिरन्या यदाधिकारिकत्वात्प्रधान एकस्मिन्वाक्यार्थे रस- योर्भावयोर्वा परस्परविरोधिनोर्द्वयोरङ्गभावगमनं तस्यामपि न दोषः । मेघरूपी भुजंग से उत्पन्न विष वियोगिनियों के चक्कर, अरति, आलस्य, प्रलय (चेष्टानाश), मूर्च्छा, मोह, शरीर में दर्द और मरण हठात् उत्पन्न कर देता है। इत्यादि में । समारोपित (अङ्गभाव-प्राप्ति) में भी विरोध का अभाव, जैसे— 'पाण्डुक्षामं०' इत्यादि में । अथवा जैसे—'कोपात् कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादि में । और यह अन्य अङ्गभाव की प्राप्ति है कि आधिकारिक होने के कारण प्रधानभूत एक वाक्यार्थ में परस्पर विरोधी दो रसों अथवा भावों का अङ्गभाव प्राप्त होना, उसमें भी दोष नहीं। लोचनम् वाद्यवधारणेऽपि ह्यशक्यविच्छेदत्वेन दाढर्यमेवानुरागस्योक्तं भवतीति भावः । समारोपितायामिति । अङ्गभावप्राप्ताविति शेषः । पाण्डुक्षामं वक्त्रं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः । आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि हृदन्तः ॥ अत्र करुणोचितो व्याधिःश्लेषभङ्ग्या स्थापितः। कोपादिति बद्ध्वेति हन्य- त इति च रौद्रानुभावानां रूपकबलादारोपितानां तदनिर्वाहादेवाङ्गत्वम् । तच्च पूर्वमेवोक्तं 'नातिनिर्वहणैषिता' इत्यत्रान्तरे। अन्येति। चतुर्थोऽयं प्रकार इत्यर्थः। ही हमने कह दिया है। दूसरे—। भाव यह कि विपक्षीभूत वैराग्य के विभाव आदि का अवधारण होने पर भी विच्छेद के अशक्य होने के कारण अनुराग का दाढर्द्य ही उक्त होता है । समारोपित—। 'अङ्गप्राप्ति में' यह शेष है। हे सखी,, तेरा पीला और झुलसा हुआ मुख, सरस हृदय, आलस्य भरा शरीर हृदय के भीतर नितान्त क्षेत्रिय रोग (अर्थात् इस शरीर से भी साध्य न होने वाले रोग) को सूचित करते हैं । यहाँ करुण के उचित व्याधि श्लेष की भङ्गी से स्थापित है । 'कोप से', 'बाँध कर', और 'पीटा जाता है' रूपक के बल से आरोपित इन रौद्र के अनुभावों का उसके (रूपक के) निर्वाह न होने से ही अङ्गत्व है। और उसे पहले ही कह चुके हैं 'अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा नहीं' इसके बीच । अन्य—। अर्थात् यह चौथा प्रकार है ।