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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 465

तृतीय उद्योतः ४०५

ध्वन्यालोकः
तत्र लब्धप्रतिष्ठे तु विवक्षिते रसे विरोधिग्साङ्गानां वाध्यत्वेनोक्ता-
वदोषो यथा—
क्काकार्यं शशलक्ष्मणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं पास्यति ॥
यथा वा पुण्डरीकस्य महाश्वेतां प्रति प्रवृत्तनिर्भरानुरागस्य द्वितीय-
मुनिकुमारोपदेशवर्णने । स्वाभाविक्यामङ्गभावप्राप्तावदोषो यथा—
उनमें से विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ होने पर बाध्यरूप से विरोधी रसाङ्गों के
कथन में दोष का अभाव, जैसे—
यह अकार्य ( अनुचित कार्य ) कहां और चन्द्रवंश कहां ? फिर वह नजर आ
जाती ! मैंने ( शास्त्रों का ) श्रवण दोषों ( काम आदि विकारों ) के शमन के लिए
किया है, अहो; क्रोध में भी ( उसका ) मुख सुन्दर. लगता था ! पापरहित विद्वान्
क्या कहेंगे ? वह स्वप्न में भी दुर्लभ हो गई । अरे चित्त स्वस्थ हो जा, कौन धन्य
युवक (उसका) अधरपान करेगा ?
अथवा जैसे महाश्वेता के प्रति पुण्डरीक के अधिक अनुरक्त हो जाने पर दूसरे
मुनिकुमार ( कपिञ्जल ) के उपदेश के वर्णन में । स्वाभाविक अङ्गभाव-प्राप्ति में दोष
का अभाव, जैसे—
लोचनम्
रेण बहुना । तस्माद् दीर्घकालतात्र पदबन्धलाभ एवेति मन्तव्यम् । एवं नैस-
र्गिकाङ्गतो व्याख्याता । समारोपितत्वे तद्विपरीतेत्यर्थलब्धत्वात्स्वकण्ठेन न
व्याख्याता ।
एवं प्रकारत्रयं व्याख्याय क्रमेणोदाहरति — तत्रेत्यादिना । क्काकार्यमिति ।
वितर्क औत्सुक्येन मतिः स्मृत्या शङ्का दैन्येन धृतिश्चिन्तया च बाध्यते । एत-
च्च द्वितीयोद्द्योतारम्भ एवोक्तमस्माभिः । द्वितीयेति । विपक्षीभूतवैराग्यविभा-
चर्चा व्यर्थ है। इसलिए यहाँ दीर्घकालता पदबन्ध के लाभ में ही (अर्थात् सहृदयों की
प्रतीतिविश्रान्ति के पदबन्ध में ही ) है यह मानना चाहिए। इस प्रकार नैसर्गिक अङ्गता
का व्याख्यान किया। समारोपित अवस्था में उसके ( नैसर्गिक ) के विपरीत, यह
अर्थ लब्ध हो जाने से स्वकण्ठतः व्याख्यान नहीं किया है।
इस प्रकार प्रकारत्रय का व्याख्यान करके क्रम से उदाहरण देते हैं — उनमें से
इत्यादि द्वारा । यह अकार्य कहाँ—। (यहाँ) वितर्क औत्सुक्य से, मति स्मृति से,
शङ्का दैन्य से और धृति चिन्ता से बाधित होती है। इसे द्वितीय उद्योत के आरम्भ में