ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यापत्तिसम्भवे कदाचिदुपनिबन्धो नात्यन्तविरोधी । दीर्घकाल- प्रत्यापत्तौ तु तस्यान्तरा प्रवाहविच्छेद एवेत्येवंविधेतिवृत्तोपनिबन्धनं रसबन्धप्रधानेन कविना परिहर्तव्यम् । सम्भव होने पर मरण का कदाचित् उपनिबन्ध अत्यन्त विरोधी नहीं। किन्तु दीर्घ काल पर मिलन होने पर उस (रस) का बीच में प्रवाह-विच्छेद ही हो जायगा, अतः इस प्रकार के इतिवृत्त का उपनिबन्धन रसबन्धप्रधान कवि को छोड़ देना चाहिए । लोचनम् विश्रान्तिपदबन्ध एव नोत्पद्यते तत्रास्य व्यभिचारित्वम् । कदाचिदिति । यदि तादृशीं भङ्गिं घटयितुं सुकवेः कौशलं भवति । यथा— तीर्थे तोयव्यतिकरभवे जह्नुकन्यासरय्वो- र्देहन्त्यासादमरगणनालेख्यमासाद्य सद्यः । पूर्वाकाराधिकचतुरया सङ्गतः कान्तयासौ लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यन्तरेषु ॥ अत्र स्फुटैव रत्यङ्गता मरणस्य । अत एव सुकविना मरणे पदबन्धमात्रं न कृतम्, अनूद्यमानत्वेनैवोपनिबन्धनात् । पदबन्धनिवेशे तु सर्वथा शोकोदय एवातिपरिमितकालप्रत्यापत्तिलाभेऽपि । अथ दूरपरामर्शकसहृदयसामाजिकाभिप्रायेण मरणस्यादीर्घकालप्रत्यापत्ते- रङ्गतोच्यते, हन्त तापसवत्सराजेऽपि यौगन्धरायणादिनीतिमार्गाकर्णनसंस्कृत- मतीनां वासवदत्तामरणबुद्धेरेवाभावात्करुणस्य नामापि न स्यादित्यलमवान्त- विश्रान्ति की प्रतिष्ठा ही नहीं उपपन्न होती वहाँ वह (मरण) व्यभिचारी होगा । कदाचित्—। यदि उस प्रकार की भङ्गी की घटना के लिए सुकवि का कौशल होता है । जैसे— 'गङ्गा और सरयू के जल-सङ्गम से बने तीर्थ में शरीरत्याग करके सद्यः देवताओं में गणना प्राप्त कर, पूर्व आकृति से अधिक चतुर (अर्थात् सुभग) प्रियतमा के साथ वह (अज) नन्दनवन के भीतरी लीलागारों में रमण करने लगा ।' (रघु० ८।९५) । यहाँ स्पष्ट ही मरण रति का अङ्ग है । अतएव सुकवि ने मरण में (प्रतीति की विश्रान्ति का) पदबन्ध मात्र नहीं किया है, क्योंकि अनूद्यमान रूप से ही (उसका) उपनिबन्धन है। पदबन्ध के निवेश में तो अतिपरिमित काल में प्रत्यापत्ति (अर्थात् समागम) लाभ होने पर भी सर्वथा शोक का उदय ही होता । यदि अदीर्घकाल में समागम हो जाने के कारण मरण को अङ्ग दूर परामर्शक सामाजिक के अभिप्राय से कहते हैं, खेद है, (तब तो) 'तापसवत्सराज' में भी यौगन्धरायण आदि के नीतिमार्ग के आकर्णन से संस्कृत बुद्धिवालों के वासवदत्ता के मरण बुद्धि के ही न होने के कारण करुण का नाम भी नहीं होगा । यह बहुत अवान्तर